दिल्ली हाई कोर्ट ने दुर्घटना की शिकार 74 वर्षीय महिला के मुआवज़े में बढ़ोतरी की

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 14-10-2026
Delhi HC enhances compensation for 74-year-old accident victim, says age cannot erase economic value of homemaker’s work
Delhi HC enhances compensation for 74-year-old accident victim, says age cannot erase economic value of homemaker’s work

 

नई दिल्ली

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि ज़्यादा उम्र इस बात का आधार नहीं हो सकती कि कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति परिवार में आर्थिक योगदान देना बंद कर चुका है। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि मोटर दुर्घटना के मामलों में मुआवज़ा तय करते समय बुज़ुर्ग महिलाओं द्वारा किए गए बिना पैसे वाले घरेलू कामों और देखभाल की सेवाओं को मान्यता दी जानी चाहिए। जस्टिस अनीश दयाल ने कहा कि मुआवज़े का आकलन रूढ़िवादी सोच या इस धारणा के आधार पर नहीं किया जा सकता कि उम्र बढ़ने की वजह से कोई व्यक्ति घर में योगदान देना बंद कर देता है। घरेलू कामों के लिए पैसे न मिलने का फ़ायदा दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति को नहीं मिलना चाहिए और न ही इससे पीड़ित को मिलने वाला मुआवज़ा कम होना चाहिए।
 
कोर्ट ने ये बातें गंगा देवी को मिलने वाले मुआवज़े को बढ़ाते हुए कहीं। फरवरी 2019 में एक बस दुर्घटना में उनके पैर कुचल गए थे, जिससे उनके बाएं पैर को घुटने के नीचे से और दाएं पैर की सभी उंगलियों को काटना पड़ा था। उस समय उनकी उम्र 74 साल थी। हाई कोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) द्वारा उन्हें दिए गए मुआवज़े को 14.42 लाख रुपये से बढ़ाकर 20.79 लाख रुपये कर दिया (यानी 6.37 लाख रुपये की बढ़ोतरी)। साथ ही, क्लेम याचिका दायर करने की तारीख से 7.5 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी देने का आदेश दिया।
 
कोर्ट ने फ़ैसले में बताई गई शर्तों के तहत, भविष्य में कृत्रिम अंग (artificial limb) लगवाने के खर्च के लिए अतिरिक्त 1.30 लाख रुपये और उसके रखरखाव के लिए 75,000 रुपये देने का भी आदेश दिया। जस्टिस दयाल ने कहा, "पैसे के लेन-देन का न होना दुर्घटना करने वाले व्यक्ति के फ़ायदे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और न ही इससे घायल व्यक्ति को मिलने वाला मुआवज़ा कम किया जा सकता है।" कोर्ट ने उम्र के आधार पर बुज़ुर्ग गृहिणी को केवल परिवार पर निर्भर सदस्य मानने के नज़रिए को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 70 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाएं भी घर के काम करती रहती हैं और पोते-पोतियों व परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल करती हैं। उनके इन योगदानों को अक्सर मान्यता नहीं मिलती क्योंकि इनसे कोई सीधी आय नहीं होती।
 
फ़ैसले में "एजइज़्म" (ageism) यानी उम्र के आधार पर भेदभाव और पूर्वाग्रह की अवधारणा पर भी प्रकाश डाला गया और ज़ोर दिया गया कि ऐसी धारणाओं का असर मुआवज़े के आकलन पर नहीं पड़ना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि मुआवज़ा तय करने के लिए बिना पैसे वाली देखभाल और घरेलू काम की आर्थिक कीमत को मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कोई उम्र की सीमा तय नहीं की थी। उम्र के आधार पर कोई रोक लगाना मोटर व्हीकल एक्ट के फ़ायदेमंद मकसद और सही व उचित मुआवज़ा देने की ज़रूरत के ख़िलाफ़ होगा। गंगा देवी एक गृहिणी थीं और उन्होंने कभी कोई औपचारिक नौकरी नहीं की थी। MACT ने आय या भविष्य की कमाई के नुकसान के लिए मुआवज़ा देने से इनकार कर दिया था। उनका तर्क था कि वह 74 साल की थीं, रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी थीं, और इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं था कि वह घर के काम करती थीं या अपने पोते-पोतियों की देखभाल करती थीं।
 
हाई कोर्ट ने पाया कि इस नज़रिए से परिवार में उनके योगदान की आर्थिक कीमत को ठीक से नहीं समझा गया। संयुक्त परिवार में एक गृहिणी के तौर पर उनकी भूमिका और पोते-पोतियों की देखभाल में उनकी भागीदारी को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने उनकी अनुमानित मासिक आय 16,962 रुपये तय की। यह रकम दुर्घटना के समय दिल्ली में कुशल कामगार के लिए तय न्यूनतम मज़दूरी के बराबर थी। कोर्ट ने माना कि गृहिणी की सेवाओं की कीमत को सिर्फ़ इसलिए नकारा नहीं जा सकता कि काम के लिए पैसे नहीं मिलते या व्यक्ति एक खास उम्र पार कर चुका है।
 
कोर्ट ने यह भी कहा कि बुज़ुर्ग लोग सिर्फ़ परिवार के युवा सदस्यों से देखभाल पाने वाले नहीं होते, बल्कि वे खुद भी काफ़ी मदद करते हैं। बच्चों की देखभाल और घर का प्रबंधन जैसे योगदानों की एक पहचान योग्य आर्थिक कीमत होती है, क्योंकि अगर ऐसा न हो तो परिवारों को वैसी ही सेवाएँ पाने के लिए खर्च करना पड़ता। कोर्ट ने पाया कि गंगा देवी को दोनों पैरों में 74 प्रतिशत स्थायी शारीरिक विकलांगता हुई थी। हालाँकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि शारीरिक विकलांगता और कार्यात्मक विकलांगता को अपने-आप एक जैसा नहीं माना जा सकता।
 
घरेलू काम करने और परिवार को सेवाएँ देने की उनकी क्षमता पर चोटों के असर का आकलन करते हुए, कोर्ट ने उनकी कार्यात्मक विकलांगता 50 प्रतिशत तय की।
कोर्ट ने माना कि आकलन करते समय उनकी उम्र, दुर्घटना से पहले किए जाने वाले काम की प्रकृति और चोटों ने उन कामों को जारी रखने की उनकी क्षमता को किस हद तक सीमित किया, इन बातों का ध्यान रखना ज़रूरी था। कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि 70 साल से ज़्यादा उम्र के दावेदार को मल्टीप्लायर मेथड का इस्तेमाल करके भविष्य के नुकसान के लिए मुआवज़ा नहीं दिया जा सकता। अदालत ने माना कि मल्टीप्लायर टेबल में 70 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के लिए अलग कैटेगरी न होने का मतलब यह नहीं है कि उनके भविष्य के नुकसान का हिसाब नहीं लगाया जा सकता। पांच का मल्टीप्लायर लागू करते हुए, अदालत ने भविष्य की आय के नुकसान के लिए ₹5,08,860 का मुआवज़ा दिया। इसके अलावा, अदालत ने तीन महीने की आय के नुकसान के लिए ₹50,886 का मुआवज़ा भी दिया, क्योंकि लंबे समय तक चले इलाज और बार-बार अस्पताल में भर्ती होने के कारण वह घर के रोज़मर्रा के काम नहीं कर पा रही थीं।