Muslim artisans styling Goddess Durga's hair—crafting an example of Hindu-Muslim unity.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
नवरात्रि आते ही पश्चिम बंगाल के शहरों और गांवों में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं पंडालों की शोभा बढ़ाने लगती हैं। मां के चेहरे की तेजस्विता, बड़ी-बड़ी आंखें, हाथों में अस्त्र-शस्त्र और उनके चारों ओर सजे आभूषण श्रद्धालुओं का ध्यान खींचते हैं। लेकिन इन सबके बीच मां दुर्गा के घने, काले और लहराते बाल भी उनकी प्रतिमा के सौंदर्य और दिव्यता को पूरा करते हैं। इन बालों को देखकर शायद ही किसी श्रद्धालु के मन में यह सवाल आता हो कि आखिर इन्हें तैयार कौन करता है?
पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के अमता इलाके के परबतिपुर गांव में इस सवाल का जवाब छिपा है। यहां पीढ़ियों से मुस्लिम परिवार मां दुर्गा की प्रतिमाओं के लिए जूट से बाल और विग तैयार करते आ रहे हैं। नवरात्रि और दुर्गा पूजा का उत्सव इन कारीगरों के बिना जैसे अधूरा सा लगता है। मां दुर्गा की प्रतिमाओं के केशों को आकार देने वाले इन हाथों में सिर्फ हुनर नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही हिंदू-मुस्लिम साझी विरासत की कहानी भी दर्ज है।
कोलकाता से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित परबतिपुर गांव बारागछिया रेलवे स्टेशन से जुड़ा हुआ है। गांव में मां दुर्गा की प्रतिमाओं के लिए विग बनाने का सबसे बड़ा कारोबार शेख नवाब चलाते हैं। 37 वर्षीय नवाब को यह याद नहीं कि उनके परिवार में इस काम की शुरुआत किस पूर्वज ने की थी, लेकिन इतना जरूर याद है कि उन्होंने यह हुनर अपने दादा से सीखा था। आज वही पारंपरिक कला उनके परिवार की पहचान बन चुकी है।
शेख नवाब बताते हैं कि मां दुर्गा की प्रतिमाओं के लिए तैयार किए जाने वाले इन विगों को बनाने का काम मुख्य रूप से दो चरणों में होता है। सबसे पहले जूट खरीदा जाता है और उसे काले रंग में रंगा जाता है। इसके बाद कई कारीगरों को इसे सिलने और बालों का आकार देने के लिए लगाया जाता है। पूरी प्रक्रिया में सिलाई का काम सबसे अधिक समय लेता है। इसके लिए स्थानीय कारीगरों को परिवार के लोग खुद प्रशिक्षण देते हैं, ताकि वर्षों पुराना हुनर अगली पीढ़ी तक पहुंचता रहे।
नवाब के घर के भीतर बने छोटे से आंगन में इस पारंपरिक कारोबार की पूरी दुनिया दिखाई देती है। उन्होंने वहां दो फूस की झोपड़ियां बना रखी हैं, जहां मां दुर्गा की प्रतिमाओं के बाल तैयार करने का काम होता है। एक तरफ उनके दो भाई बड़े से कोयले के चूल्हे पर रखे बर्तन में काले रंग को उबालते हैं। सफेद जूट को इस काले रंग में रंगा जाता है और फिर कई दिनों तक सूखने के लिए कपड़े की रस्सियों पर टांग दिया जाता है। इसी गली में स्थित एक दूसरे घर में पांच महिलाएं सिलाई मशीनों पर इस रंगे हुए जूट को सिलकर मां दुर्गा के बालों का रूप देती हैं। जूट की साधारण डोरियां धीरे-धीरे ऐसे विग में बदल जाती हैं, जो बाद में मां दुर्गा की प्रतिमा का अभिन्न हिस्सा बनती हैं।

नवाब के पास तैयार किए गए सैकड़ों विग बोरे में रखे हुए हैं। एक बोरे की कीमत करीब 9,000 से 10,000 रुपये तक होती है। इनका कारोबार केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। परबतिपुर में तैयार किए गए ये विग मुख्य रूप से कोलकाता के कुम्हारटोली के साथ-साथ बिहार, उत्तर प्रदेश, नेपाल और बांग्लादेश तक पहुंचते हैं। कुम्हारटोली कोलकाता का वह इलाका है, जहां बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की मिट्टी की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं और दुर्गा पूजा से पहले यहां काम कई गुना बढ़ जाता है।
मां दुर्गा के घने काले बालों को तैयार करने की यह कला देखने में जितनी साधारण लगती है, इसके पीछे उतनी ही मेहनत, समय और कौशल छिपा है। जूट को खरीदने से लेकर उसे उबालने, रंगने, सुखाने और फिर सिलाई के जरिए विग का रूप देने तक कई हाथ लगातार काम करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार के सदस्यों के साथ आसपास के गांवों के सैकड़ों मजदूर भी जुड़े हुए हैं।
लेकिन परबतिपुर के इन पारंपरिक कारीगरों के लिए हर साल बढ़ती मांग के बावजूद यह काम आसान नहीं रह गया है। पिछले दो-तीन वर्षों में प्रतिकूल मानसून और जूट की बढ़ती कीमतों ने उनके कारोबार पर असर डाला है। शेख इंजामान, जो इसी परिवार के एक अन्य सदस्य हैं, बताते हैं कि बढ़ती लागत ने उत्पादन को प्रभावित किया है। जिस जूट की एक यूनिट की कीमत दो-तीन साल पहले करीब 90 रुपये थी, अब वह बढ़कर लगभग 140 से 150 रुपये हो गई है।
इस बढ़ती लागत का सीधा असर कारीगरों की कमाई पर पड़ रहा है। इंजामान के मुताबिक, उनके साथ काम करने वाले आसपास के गांवों के सैकड़ों मजदूरों को भुगतान करना भी मुश्किल होता जा रहा है। बांग्लादेश के साथ बदलते राजनीतिक संबंधों ने भी इस पारंपरिक कारोबार को प्रभावित किया है। इन कारीगरों के बांग्लादेश के हिंदू समुदायों के साथ लंबे समय से अच्छे कारोबारी संबंध रहे हैं। वहां भी उनके बनाए विग और बालों की मांग थी। लेकिन दोनों देशों के बीच बिगड़ते राजनीतिक माहौल और व्यापारिक रास्तों में आई मुश्किलों के कारण अब यह कारोबार पहले जैसा आसान नहीं रहा।
परबतिपुर के कारीगरों के सामने एक और बड़ी चुनौती आधुनिक मशीनों से तैयार होने वाले विग हैं। कोलकाता में कई मशीन आधारित कारखाने बड़े पैमाने पर विग तैयार कर रहे हैं। कारीगरों का कहना है कि हाथ से बनाए जाने वाले पारंपरिक विगों के सामने इन फैक्ट्रियों की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।
कुम्हारटोली के कई मूर्तिकार अब परबतिपुर के पारंपरिक कारीगरों की जगह कोलकाता की तीन से पांच बड़ी फैक्ट्रियों से विग खरीदना पसंद करते हैं। मशीन से उत्पादन तेज होता है और बड़ी मात्रा में सामान तैयार किया जा सकता है। ऐसे में पीढ़ियों से हाथों के हुनर पर निर्भर इन परिवारों के सामने अपने कारोबार को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। लेकिन आर्थिक कठिनाइयों से कहीं अधिक चिंता इन कारीगरों को बदलते सामाजिक माहौल को लेकर है।
शोना बीबी, जो शेख इंजामान के साथ काम करती हैं, बताती हैं कि पहले वे मूर्तिकारों के पास जाने और अपना काम दिखाने में बिल्कुल संकोच नहीं करती थीं। खासकर हिंदू समुदाय के मूर्तिकारों के साथ उनका लंबे समय से कामकाजी रिश्ता रहा है। लेकिन अब कुछ मूर्तिकार उनसे विग खरीदने में हिचकिचाते हैं। बदलते सामाजिक और राजनीतिक माहौल ने उन रिश्तों में भी एक दूरी पैदा की है, जो कभी पूरी तरह काम और भरोसे पर आधारित थे। यह कहानी सिर्फ जूट से बने विग की कहानी नहीं है। यह उस भारत की तस्वीर है, जहां एक समुदाय की आस्था से जुड़ी प्रतिमा को दूसरे समुदाय के हाथ अपना हुनर देकर पूर्णता देते हैं।

मां दुर्गा को हिंदू धर्म में शक्ति, साहस और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में करोड़ों श्रद्धालु देवी की आराधना करते हैं। पश्चिम बंगाल में तो दुर्गा पूजा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी अभिन्न हिस्सा है। विशाल पंडालों से लेकर छोटी-छोटी प्रतिमाओं तक, हर जगह मां दुर्गा के स्वरूप को अत्यंत श्रद्धा और कलात्मकता के साथ सजाया जाता है। और इसी दिव्य स्वरूप को पूरा करने में परबतिपुर के मुस्लिम कारीगरों के हाथ भी शामिल हैं।
वे मां दुर्गा की पूजा नहीं करते होंगे, लेकिन मां की प्रतिमा के बालों को तैयार करने में अपना श्रम, समय और हुनर जरूर लगाते हैं। उनके लिए यह उनका पुश्तैनी काम है, उनकी रोजी-रोटी है, उनके परिवार की विरासत है। लेकिन अनजाने में ही सही, उनके हाथ उस धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव की सुंदरता को पूरा करते हैं, जिसे लाखों-करोड़ों हिंदू श्रद्धालु अपनी आस्था से जोड़कर देखते हैं। यही भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरती है।
यहां एक हिंदू परिवार मां दुर्गा की प्रतिमा बनाता है और एक मुस्लिम परिवार उसके बाल तैयार करता है। कोई मिट्टी को आकार देता है, कोई रंग भरता है, कोई आभूषण सजाता है और कोई जूट के रेशों को मां के घने केशों में बदल देता है। अलग-अलग आस्थाओं के बावजूद मेहनत के ये हाथ एक ही सांस्कृतिक विरासत को आकार देते हैं।
परबतिपुर की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि हिंदू-मुस्लिम एकता केवल मंचों से दिए गए भाषणों या नारों में नहीं मिलती। यह उन छोटे-छोटे गांवों और कस्बों में सांस लेती है, जहां लोग पीढ़ियों से एक-दूसरे की परंपराओं को अपने श्रम और हुनर से पूरा करते आए हैं। नवरात्रि में जब मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने लाखों श्रद्धालु सिर झुकाते हैं और देवी की शक्ति का स्मरण करते हैं, तब शायद ही किसी को यह पता हो कि उनकी प्रतिमा के घने, काले और लहराते बालों के पीछे हावड़ा के परबतिपुर गांव के मुस्लिम कारीगरों की मेहनत भी शामिल है।
इन कारीगरों के हाथों से तैयार हुए वे बाल मां दुर्गा के दिव्य स्वरूप को पूरा करते हैं। एक ऐसी देवी, जिन्हें शक्ति का प्रतीक माना जाता है, उनके केशों को संवारने में उन हाथों की मेहनत शामिल है जो धर्म की सीमाओं से परे केवल अपने हुनर को जानते हैं। यही वह तस्वीर है, जो भारत की असली खूबसूरती को सामने लाती है।
मां दुर्गा की दिव्य शक्ति के सामने जब श्रद्धालु नतमस्तक होते हैं, तब उनके स्वरूप को पूर्ण करने वाले इन मुस्लिम कारीगरों की कहानी भी उसी भारत की कहानी बन जाती है, जहां आस्था अलग हो सकती है, लेकिन कला, मेहनत, विरासत और इंसानियत सबको जोड़ती है। परबतिपुर के इन कारीगरों की उंगलियों से बुने मां दुर्गा के केश सिर्फ जूट के रेशे नहीं हैं। वे पीढ़ियों से चली आ रही साझी संस्कृति, आपसी भरोसे और हिंदू-मुस्लिम एकता के वे धागे हैं, जो आज भी भारत की सामाजिक बुनावट को मजबूती देते हैं।