अब्दुल मुईद अजहरी
इस्लाम में मस्जिद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मुस्लिम जीवन में मस्जिद की भूमिका ऐतिहासिक रूप से बहुत व्यापक और गहरी रही है। मस्जिद से जुड़ी अनेक मजहबी, सामाजिक और आध्यात्मिक हिकमतें हैं। यही कारण है कि मस्जिद में नमाज की इमामत करने और उससे जुड़ी दूसरी जिम्मेदारियां निभाने वाले इमाम का चयन बेहद सोच-समझकर और पूरी जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।
इमाम ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो इस पद से जुड़ी जिम्मेदारियों को समझता होIउन्हें निभाने की क्षमता रखता हो। दुर्भाग्य से, आज इमामत का पेशा उन क्षेत्रों में शामिल हो गया है, जिनकी सबसे अधिक उपेक्षा की जाती है।
कई मामलों में मस्जिदों की कमेटियां धार्मिक उद्देश्यों के बजाय दुनियावी हितों, प्रतिष्ठा, सामाजिक पहचान और सार्वजनिक सम्मान को प्राथमिकता देने लगती हैं। मस्जिद कमेटियों के अध्यक्ष अक्सर अपनी आर्थिक हैसियत के आधार पर चुने जाते हैं और धीरे-धीरे खुद को धर्म का संरक्षक समझने लगते हैं। वे ऐसा इमाम चाहते हैं, जो उनकी इच्छाओं के अनुसार धर्म की व्याख्या करे। इस तरह मस्जिद की धार्मिक गतिविधियां भी कुछ लोगों की व्यक्तिगत पसंद और नापसंद पर निर्भर हो जाती हैं।
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सबसे चिंताजनक बात यह है कि कमेटियों के अनेक सदस्यों को धर्म की बुनियादी जानकारी तक नहीं होती। वे इस्लामी शिक्षाओं और फिक्ह से अच्छी तरह परिचित नहीं होते, फिर भी इमाम की नियुक्ति का फैसला उन्हीं के हाथों में होता है।
नतीजा यह निकलता है कि वे किसी योग्य इमाम का चयन करने के बजाय ऐसे व्यक्ति को रख लेते हैं, जो केवल पांच वक्त की नमाज पढ़ा दे। उनके लिए इमाम एक धार्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि एक सेवा देने वाला कर्मचारी बनकर रह जाता है।विडंबना यह है कि अनेक जगहों पर इमाम को मिलने वाला वेतन एक मजदूर की दिनभर की कमाई से भी कम होता है।
आज की एक और बड़ी समस्या यह है कि कई इमाम स्वयं भी अपने पद की वास्तविक अहमियत और जिम्मेदारियों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। उन्हें यह समझ ही नहीं होती कि इमामत कितनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और इसके साथ कौन-कौन से कर्तव्य जुड़े हुए हैं। न तो उन्हें इस संबंध में पर्याप्त जानकारी दी जाती है और न ही जरूरी प्रशिक्षण या व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
अधिकांश धार्मिक संस्थानों में आठ से बारह वर्ष तक चलने वाले पाठ्यक्रमों के बावजूद इमामत के लिए कोई समर्पित विषय या विशेष प्रशिक्षण व्यवस्था नहीं होती। इमामत के नाम पर जो कुछ पढ़ाया जाता है, वह आम तौर पर कुरआन की तिलावत को बेहतर बनाने और नमाज से जुड़े कुछ फिक्ही मसलों को सीखने तक सीमित रहता है।
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मस्जिद का महत्व केवल नमाज तक सीमित नहीं
मस्जिद की अहमियत का अंदाजा उन हदीसों से लगाया जा सकता है, जिनमें मस्जिद में इबादत करने की अधिक फजीलत बयान की गई है। इस्लाम के पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अकेले घर में नमाज पढ़ने के मुकाबले जमात के साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने को अधिक महत्व दिया और इसकी भरपूर तरगीब दी। मस्जिद में नमाज के सवाब को अकेले नमाज पढ़ने से सत्तर गुना अधिक बताने वाली रिवायतें भी इसकी अहमियत को स्पष्ट करती हैं।
मस्जिद के निर्माण से लेकर उसकी देखभाल तक, उस पर माल खर्च करने से लेकर उसके प्रशासन और प्रबंधन में योगदान देने तक, हर तरह की खिदमत के साथ बड़ी फजीलत जुड़ी हुई है।
मस्जिद से किसी भी रूप में जुड़ने को सवाब का माध्यम माना गया है। मस्जिदों की फजीलत के बारे में सैकड़ों रिवायतें मिलती हैं। यहां तक कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति अल्लाह की रजा के लिए मस्जिद के निर्माण में एक ईंट भी लगाता है, तो अल्लाह उसके लिए जन्नत में घर बनाता है।
अनेक हदीसों में मस्जिद के निर्माण में सहयोग को सदका-ए-जारीया यानी ऐसा सदका बताया गया है, जिसका सवाब लगातार मिलता रहता है। जब तक उस मस्जिद में नमाज अदा की जाती रहेगी, तब तक उसके निर्माण में योगदान देने वालों को भी सवाब मिलता रहेगा।
यदि किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे के लिए सवाब पहुंचाने की नीयत से योगदान दिया हो, तो वह व्यक्ति भी इस नेक काम के सवाब से लाभान्वित हो सकता है। इसी तरह मस्जिद की सफाई करना, झाड़ू लगाना, उसे धोना और अपने घर की तरह उसकी देखभाल करना भी नेक काम हैं, जिनकी बड़ी फजीलत बयान की गई है।
मस्जिद से जुड़ी इन तमाम खूबियों और उसके प्रबंधन की अहमियत पर गौर करने के बाद एक सवाल उठता है। क्या मस्जिद की महानता केवल इबादत तक सीमित है, या इसके पीछे कोई और व्यापक उद्देश्य भी है?
इस्लामी इतिहास और उसकी सामाजिक विचारधारा इस सवाल का जवाब देते हैं। मस्जिद की असाधारण अहमियत के पीछे एक ऐसा सामाजिक ढांचा मौजूद है, जिसकी कीमत अनमोल है। उम्मत की एकता, सामूहिक समस्याओं पर विचार-विमर्श, जनकल्याण, सामाजिक सुधार और एक-दूसरे की मदद करना मस्जिद के बुनियादी उद्देश्यों का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।

मस्जिद: एकता और सामाजिक बदलाव का केंद्र
मस्जिद के माध्यम से पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मुसलमानों को एक बेहतरीन सामाजिक व्यवस्था दी। दिन में पांच बार लोगों का एक-दूसरे से मिलना, कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना और बिना किसी भेदभाव के एक ही कतार में नमाज अदा करना मानव समाज की सबसे खूबसूरत व्यवस्थाओं में से एक है। इसमें न दौलत की ऊंच-नीच होती है, न नस्ल का भेदभाव और न ही सामाजिक हैसियत का अंतर।
इस दृष्टि से मस्जिदें ऐसी उपयोगी संस्थाएं भी बन सकती हैं, जहां समझदार और अनुभवी लोगों की सलाह से मुस्लिम समाज की समस्याओं का समाधान निकाला जाए और समाज के निर्माण तथा विकास के लिए मजबूत आधार तैयार किया जाए।
संपन्न लोग जरूरतमंदों की मदद कर सकते हैं। मस्जिदें एकता, भाईचारे और निष्ठा के केंद्र बन सकती हैं। यही कारण है कि इस्लामी इतिहास के शुरुआती दौर में मस्जिदें सामुदायिक समस्याओं पर चर्चा करने, योजनाएं बनाने और सामाजिक तरक्की के रास्ते तलाशने की प्रमुख जगह हुआ करती थीं।वे दीन की केंद्रीय संस्थाएं थीं, जहां ईमानदारी, खैरख्वाही और नेक नीयती को फलने-फूलने का सबसे अच्छा अवसर मिलता था।
यह बात याद रखनी चाहिए कि जहां अधिक फजीलत होती है, वहां जिम्मेदारियां भी उतनी ही बड़ी होती हैं। इस्लामी इतिहास की प्रमुख हस्तियों और उनके सामूहिक प्रयासों का अध्ययन करने से पता चलता है कि किसी व्यक्ति का महत्व जितना अधिक होता है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को जितनी गंभीरता से निभाता है, उसका महत्व भी उतना ही बढ़ता है।
इससे स्पष्ट होता है कि मस्जिद की महानता और उसकी असाधारण अहमियत यह मांग करती है कि उसका प्रबंधन गंभीरता, ईमानदारी, गरिमा और जिम्मेदारी के साथ किया जाए।लेकिन जब हम आज की स्थिति पर नजर डालते हैं, तो पाते हैं कि समाज की इस सबसे महत्वपूर्ण संस्था का प्रबंधन गंभीर लापरवाही का शिकार हो चुका है।
कई मामलों में यह लापरवाही मस्जिद के मूल उद्देश्यों को नुकसान पहुंचा रही है। इमाम से लेकर प्रबंधन करने वालों तक, अनेक स्तरों पर दिशाहीनता दिखाई देती है। कई लोग न केवल मस्जिद के वास्तविक उद्देश्यों से दूर हो गए हैं, बल्कि जहां उन्हें समाज को लाभ पहुंचाना चाहिए, वहां वे नुकसान का कारण बन रहे हैं।
इमामत पेशा बनी, मस्जिद की सामाजिक भूमिका सिमटी
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो हमारे समाज में दो बड़े बदलाव आए हैं।पहला, पहले इमामत को महज एक पेशे के रूप में नहीं देखा जाता था, लेकिन आज यह एक औपचारिक रोजगार बनकर रह गई है।
दूसरा, पहले मस्जिद उम्मत की सामूहिक समस्याओं पर चर्चा करने और विचारों के आदान-प्रदान का सबसे अच्छा केंद्र होती थी, लेकिन आज उसकी यह भूमिका लगभग समाप्त होती जा रही है।
मस्जिदें काफी हद तक पांच वक्त की नमाज अदा करने तक सीमित होकर रह गई हैं, जबकि पहले वे धार्मिक शिक्षा के प्रमुख केंद्र भी हुआ करती थीं। मदरसों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा ने मस्जिदों की शैक्षिक भूमिका को कमजोर कर दिया है।
बच्चों के मस्जिद जाने की परंपरा भी कमजोर पड़ी है। मस्जिदें गुटबाजी और फिरकावाराना मतभेदों से अछूती नहीं रही हैं। शिक्षा का अर्थ केवल किताबों और पाठ्यक्रमों को पढ़ने तक सीमित कर दिया गया है, जबकि अच्छे चरित्र, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक प्रशिक्षण की उपेक्षा होती जा रही है।
धार्मिक संस्थानों से पढ़कर निकलने वाले अनेक छात्र पर्याप्त प्रशिक्षण के बिना ही इमाम, शिक्षक, उपदेशक, मुफ्ती, काजी और अब यहां तक कि आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी बन जाते हैं। यही लोग आगे चलकर समुदाय का नेतृत्व करते हैं। उनके कामकाज के नतीजे हमारे सामने हैं।
एक समय मस्जिद समाज के प्रशिक्षण की सबसे बेहतरीन संस्था हुआ करती थी। आज मस्जिदों में बुनियादी शिक्षा की व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। इसके बजाय कई बार अलग-अलग संस्थान स्थापित किए जाते हैं, जिन पर अनावश्यक रूप से अधिक खर्च होता है।
यदि शिक्षा की व्यवस्था मस्जिदों के भीतर बनी रहती, तो बच्चों में छोटी उम्र से ही मस्जिद के प्रति लगाव पैदा होता। उन्हें अच्छी तालीम के साथ सही संस्कार और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी मिलता।ऐसी स्थिति में मस्जिद के प्रबंधन को केवल किसी संपत्ति की देखभाल नहीं, बल्कि एक प्रशिक्षण संस्था की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता।
मस्जिदें विचार-विमर्श, परामर्श और जनकल्याण का केंद्र भी हुआ करती थीं। वहां किसी लाभकारी पहल पर चर्चा होती, तो मस्जिद की पवित्रता और उसके प्रति लोगों के सम्मान के कारण उस पहल को भी महत्व मिलता था। इस तरह बेकार की बातचीत, अव्यवस्था और समय की बर्बादी की जगह सार्थक चर्चा को बढ़ावा मिलता था। यहां तक कि गलत नीयत रखने वाला व्यक्ति भी मस्जिद के सम्मान का ख्याल करते हुए अपने व्यवहार पर दोबारा विचार कर सकता था।
मस्जिद में नियमित रूप से आने-जाने से लोगों का उससे जुड़ाव बढ़ता था और इबादत के प्रति उनकी रुचि बनी रहती थी। मस्जिद से जुड़ी शिक्षण व्यवस्था में पढ़ने वाले बच्चे केवल किताबों का ज्ञान नहीं लेते थे, बल्कि मस्जिद का सम्मान करना भी सीखते थे।
मस्जिद तक जाने वाला रास्ता उनके लिए उतना ही जाना-पहचाना हो जाता था, जितना अपने घर का रास्ता। वे शारीरिक और वाणी की पवित्रता का महत्व समझते थे। पीठ पीछे बुराई करना, झूठे आरोप लगाना, चुगली करना और दूसरों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना जैसी बुराइयों को हतोत्साहित किया जाता था। इससे समाज का नैतिक वातावरण बेहतर बनता था।यह समझना जरूरी है कि ये तमाम लाभ सीधे तौर पर मस्जिद और इमाम से जुड़े हुए हैं।
इमाम केवल नमाज पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं
जब इमामत एक पेशे का रूप ले चुकी है, तो मस्जिद की अहमियत और समाज में उसकी केंद्रीय भूमिका को देखते हुए इस पद पर सही व्यक्ति का चयन करना बेहद जरूरी हो जाता है। एक योग्य इमाम समुदाय में सकारात्मक बदलाव ला सकता है और समाज में राष्ट्रीय एकता तथा देश के प्रति जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को मजबूत कर सकता है।
इस्लाम में इमाम का पद अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानित माना गया है। एक इमाम अपने समुदाय को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इमामत इस्लामी जीवन की आत्मा से जुड़ी जिम्मेदारी है।
मस्जिद का इमाम वहां नमाज पढ़ने वालों का नेतृत्व करता है और व्यवहार में पूरे मोहल्ले का मार्गदर्शक बन सकता है। उसकी जिम्मेदारी लोगों के भौतिक और आध्यात्मिक विकास से भी जुड़ी होती है।
यदि इमाम स्वयं चिकित्सक नहीं है, तब भी उसे इतनी समझ और क्षमता होनी चाहिए कि जरूरत पड़ने पर लोगों के लिए चिकित्सकीय सहायता की व्यवस्था कर सके।इमाम की जिम्मेदारी केवल नमाज पढ़ाने तक सीमित नहीं है। उसका काम जरूरतमंद लोगों को उन व्यक्तियों से जोड़ना भी है, जो उनकी जरूरतें पूरी कर सकते हैं। इससे समाज के लोग एक-दूसरे के काम आ सकते हैं और पारस्परिक सहयोग की भावना मजबूत होती है।
इमाम को अपने समुदाय की जरूरतों, कमियों, कमजोरियों, खूबियों, प्रतिभाओं और क्षमताओं की जानकारी होनी चाहिए, ताकि वह लोगों को एक-दूसरे की मदद करने के लिए प्रेरित कर सके।
यह जिम्मेदारी हर मोहल्ले और हर मस्जिद पर लागू होती है। इस तरह इस्लाम ने करुणा, पारस्परिक सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी पर आधारित एक मजबूत व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की है।
इमामत की व्यवस्था में दोहरी नाइंसाफी
आज इमामत से जुड़ी नाइंसाफी दो स्तरों पर दिखाई देती है। एक तरफ कई बार इस पद पर पर्याप्त योग्यता और प्रशिक्षण से वंचित व्यक्ति नियुक्त कर दिए जाते हैं। दूसरी तरफ नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसे लोगों के हाथों में होती है, जो स्वयं इस जिम्मेदारी की वास्तविक प्रकृति को नहीं समझते। वे इमामत को महज एक सेवा और इमाम को सेवा देने वाला कर्मचारी मानते हैं।
इस व्यवस्था के खतरनाक परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।धार्मिक संस्थानों में इमामत के विषय पर गंभीर योजना और दूरदर्शिता का अभाव है। न तो इसके लिए कोई विशेष पाठ्यक्रम है और न ही एक या दो वर्ष का ऐसा प्रशिक्षण कार्यक्रम, जो भावी इमामों को उनकी जिम्मेदारियों के लिए तैयार कर सके।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि इस्लाम की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक कई बार ऐसे लोगों के हिस्से में आ जाती है, जिनके पास रोजगार का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।
यदि हमारा उद्देश्य मस्जिद के माध्यम से समाज में वास्तविक सुधार लाना है, तो इमामत को गंभीरता से लेना होगा। इस पद पर योग्य, ईमानदार, विद्वान और प्रभावशाली ढंग से अपनी बात रखने में सक्षम लोगों का चयन किया जाना चाहिए।
उन्हें वही सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए, जो समाज में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों के प्रभावशाली लोगों को दी जाती है।आखिरकार, किसी मस्जिद के इमाम की योग्यता और सोच ही काफी हद तक यह तय करती है कि उस मस्जिद के आसपास रहने वाला समाज किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
लेखक परिचय: अब्दुल मुईद अजहरी काहिरा स्थित अल-अजहर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं।