दिल्ली HC का आदेश: बेघर ब्लड कैंसर मरीज को आर्थिक मदद दे सरकार

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 09-07-2026
Delhi HC directs state govt to extend financial assistance to homeless blood cancer patient undergoing treatment at AIIMS
Delhi HC directs state govt to extend financial assistance to homeless blood cancer patient undergoing treatment at AIIMS

 

नई दिल्ली 
 
दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) में इलाज करा रहे बेघर ब्लड कैंसर मरीज़ को आर्थिक मदद दे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मदद एक हफ़्ते के भीतर अस्पताल को जारी की जाए और इसके लिए ऐसे दस्तावेज़ न मांगे जाएं जो मरीज़ के पास नहीं हैं। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने यह आदेश 37 साल के बेसहारा व्यक्ति विक्रांत तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जो 'डिफ्यूज़ लार्ज बी-सेल लिंफोमा' (ब्लड कैंसर) से पीड़ित हैं।
 
याचिकाकर्ता की स्थिति को देखते हुए, कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली सरकार उससे ऐसे किसी दस्तावेज़ की मांग न करे जो उसके पास उपलब्ध नहीं है, क्योंकि वह एक बेघर व्यक्ति है और सरकारी शेल्टर होम में रहता है। सुनवाई के दौरान, AIIMS के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता का अभी ओरल कीमोथेरेपी (मुंह से ली जाने वाली दवा) से इलाज चल रहा है, उसकी हालत स्थिर है और AIIMS उसे ज़रूरी इलाज देता रहेगा।
 
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अशोक अग्रवाल ने कहा कि तिवारी के पास इलाज का खर्च उठाने के लिए पैसे नहीं हैं और केंद्र सरकार व दिल्ली सरकार दोनों का यह संवैधानिक दायित्व है कि वे उसकी जान बचाने वाले ब्लड कैंसर के इलाज के लिए आर्थिक मदद दें। इन दलीलों के बाद, कोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के इलाज के लिए एक हफ़्ते के भीतर AIIMS को 3 लाख रुपये जारी करे, और इसके लिए ऐसे दस्तावेज़ न मांगे जो उसके पास नहीं हैं।
 
याचिका में AIIMS, केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे तिवारी के लिए तुरंत, बिना रुकावट और मुफ़्त इलाज सुनिश्चित करें, जो 2024 से 'डिफ्यूज़ लार्ज बी-सेल लिंफोमा' से जूझ रहे हैं। याचिका में कहा गया था कि वह टीबी (TB) और HIV से भी पीड़ित हैं, बेघर हैं और जब उनकी सेहत ठीक होती है तो दिहाड़ी मज़दूरी करके गुज़ारा करते हैं। याचिका के अनुसार, AIIMS ने मरीज़ के इलाज का खर्च लगभग 3 लाख रुपये आंका था। 
 
याचिकाकर्ता का कहना था कि आर्थिक मदद के लिए AIIMS, मेडिकल सोशल वर्क ऑफिसर, सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट और अन्य अधिकारियों से संपर्क करने के बावजूद उन्हें कोई ठोस मदद नहीं मिली, जिसके कारण उन्हें हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा। वकील अशोक अग्रवाल और कुमार उत्कर्ष के ज़रिए दायर याचिका में तर्क दिया गया कि अधिकारियों की निष्क्रियता से संविधान के तहत याचिकाकर्ता के जीवन और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। 
 
साथ ही, इसमें उन अदालती फैसलों का भी हवाला दिया गया जिनमें आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों को जीवन बचाने वाला इलाज मुहैया कराने की राज्य की ज़िम्मेदारी को माना गया है। इलाज जारी रखने के बारे में AIIMS के आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए और दिल्ली सरकार को ऊपर बताए गए निर्देश जारी करते हुए, हाई कोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा कर दिया।