बदलाव का दशक: 2013-14 से भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य फंडिंग तीन गुना बढ़कर ₹3.85 लाख करोड़ हुई

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 27-05-2026
Decade of transformation: India's public health funding triples to ₹3.85 lakh crore since 2013-14
Decade of transformation: India's public health funding triples to ₹3.85 lakh crore since 2013-14

 

नई दिल्ली 
 
देश के हेल्थकेयर सेक्टर के एक अहम आकलन में, केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2022-23 के लिए नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (NHA) के अनुमान जारी किए हैं। रिपोर्ट से पता चला है कि भारत के पब्लिक हेल्थ सेक्टर के लिए यह एक बदलाव वाला दशक रहा है। इस दौरान सरकारी खर्च में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई है, परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ काफी कम हुआ है, और परिवारों द्वारा अपनी जेब से किए जाने वाले खर्च (out-of-pocket expenditure) में भी काफी कमी आई है।
 
यह रिपोर्ट नेशनल हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर के तहत नेशनल हेल्थ अकाउंट्स टेक्निकल सेक्रेटेरिएट (NHATS) द्वारा तैयार की गई है। यह 'सिस्टम ऑफ़ हेल्थ अकाउंट्स (2011)' फ्रेमवर्क पर आधारित स्वास्थ्य खर्च के अनुमानों का दसवां संस्करण है। यह 2013-14 से हेल्थकेयर सेक्टर में सार्वजनिक निवेश में लगातार बढ़ोतरी को दिखाता है।
 
रिपोर्ट के नतीजों के मुताबिक, सरकारी स्वास्थ्य खर्च (GHE) में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई है -- जो 2013-14 में 1.30 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 3.85 लाख करोड़ रुपये हो गया है। अगर अनुपात के हिसाब से देखें, तो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में GHE की हिस्सेदारी 2013-14 में 1.15 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 1.43 प्रतिशत हो गई है। 2022-23 को आधार वर्ष मानकर GDP की संशोधित श्रृंखला का इस्तेमाल करने पर, यह हिस्सेदारी थोड़ी ज़्यादा, यानी 1.48 प्रतिशत बैठती है।
 
रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि इसी दौरान, सामान्य सरकारी खर्च (GGE) में GHE की हिस्सेदारी 3.78 प्रतिशत से बढ़कर 4.89 प्रतिशत हो गई है। यह दिखाता है कि सार्वजनिक खर्च में स्वास्थ्य को ज़्यादा प्राथमिकता दी जा रही है। प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें, तो सरकारी स्वास्थ्य खर्च में लगभग 2.7 गुना बढ़ोतरी हुई है -- जो 2013-14 और 2022-23 के बीच 1,042 रुपये से बढ़कर 2,786 रुपये हो गया है। रिपोर्ट की एक मुख्य बात यह है कि कुल स्वास्थ्य खर्च (THE) में से अपनी जेब से किए जाने वाले खर्च (OOPE) का हिस्सा कम हुआ है; यह 2013-14 में 64.2 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत हो गया।
 
मंत्रालय ने इस कमी का श्रेय लगातार चलाई जा रही सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों और बढ़ाए गए वित्तीय सुरक्षा उपायों को दिया है, जिनका मकसद स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच और उनकी सामर्थ्य को बेहतर बनाना है।
 
इस दशक में कुल स्वास्थ्य खर्च में सरकारी स्वास्थ्य खर्च (GHE) का हिस्सा 28.6 प्रतिशत से बढ़कर 43.7 प्रतिशत हो गया, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में ज़्यादा सरकारी वित्तपोषण की ओर एक ढांचागत बदलाव को दिखाता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह रुझान यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज और ज़्यादा न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की दिशा में चल रहे प्रयासों के अनुरूप है।
 
इसमें यह भी बताया गया है कि COVID-19 महामारी के दौरान, सरकारी स्वास्थ्य खर्च में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई; 2021-22 में यह GDP का 1.84 प्रतिशत हो गया। इसकी मुख्य वजह आपातकालीन प्रतिक्रिया उपाय थे, जिनमें इमरजेंसी COVID रिस्पॉन्स पैकेज (ECRP-I और II) और देशव्यापी टीकाकरण अभियान शामिल हैं।
 
स्वास्थ्य पर सामाजिक सुरक्षा खर्च (SSE) भी 2013-14 में कुल स्वास्थ्य खर्च के 6 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 9.9 प्रतिशत हो गया। इस श्रेणी में सरकार द्वारा वित्तपोषित बीमा योजनाएँ, सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली प्रतिपूर्ति (reimbursements), और सामाजिक स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यक्रम शामिल हैं।
 
इसके अलावा, इसी अवधि में कुल स्वास्थ्य खर्च में निजी स्वास्थ्य बीमा का हिस्सा 3.4 प्रतिशत से बढ़कर 9.2 प्रतिशत हो गया। यह स्वास्थ्य बीमा के प्रति लोगों में बढ़ती जागरूकता और उनकी खरीदने की क्षमता में हुए सुधार को दिखाता है।
 
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा कि ये समग्र रुझान पिछले एक दशक में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य वित्तपोषण प्रणाली के लगातार मज़बूत होने की बात को रेखांकित करते हैं, खासकर COVID-19 काल के दौरान और उसके बाद हुई तेज़ प्रगति के संदर्भ में।