आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
दुनिया के हर क्षेत्र के साथ साथ उच्च शिक्षा में भी जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (जेनएआई) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और छात्र तथा शिक्षक पढ़ाई, सीखने और मूल्यांकन में चैटबॉट्स को शामिल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि शिक्षा की मूल प्रकृति को प्रभावित करने वाला है।
कनाडा के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के 28 शिक्षकों पर आधारित एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि शिक्षा एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि जब एल्गोरिदम मानव संज्ञान को सहारा दे सकते हैं या उसका अनुकरण कर सकते हैं, तब आकलन किस बात का होना चाहिए।
एआई और अकादमिक ईमानदारी पर पिछले 15 वर्षों के शोध की समीक्षा से पता चला कि एआई शिक्षा के लिए दोधारी तलवार है। एक ओर, उन्नत टेक्स्ट जनरेटर और अनुवादक मानव-जैसा लेखन कर सकते हैं, जिससे नकल को पकड़ना और उसका पता लगाना ही कठिन हो गया है। साथ ही, ये उपकरण कभी-कभी गलत जानकारी देते हैं या सामाजिक पूर्वाग्रह भी दोहरा सकते हैं।