नई दिल्ली
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के नायब अमीर प्रो. सलीम इंजीनियर ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों की भागीदारी के बिना महत्वपूर्ण फैसले लिए जाने की खबरों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि भारतीय निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर सामने आए खुलासों ने इस महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
मीडिया के लिए जारी अपने बयान में प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाली, मतदाता डेटाबेस, फॉर्म-6 तथा स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। इसके बावजूद चुनाव आयोग के महत्वपूर्ण फैसलों में कथित तौर पर उन्हें अलग रखा गया। उन्होंने इसे बेहद चिंताजनक बताया।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में टी.एन. शेषन मामले में अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त समान दर्जे के सदस्य हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ऐसा व्यवहार नहीं कर सकते, मानो चुनाव आयोग उनका निजी संस्थान हो। उन्होंने कहा कि यदि लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं तो स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि इन फैसलों का आम नागरिकों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उनके अनुसार, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के परिणामस्वरूप देशभर में लगभग 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। लाखों लोगों ने शिकायत की है कि SIR की प्रक्रिया बेहद जटिल है और इसमें ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जो बड़ी संख्या में नागरिकों के पास उपलब्ध नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि 16.1 लाख ऐसे मतदाताओं के नाम हटाने के खिलाफ अपीलें दायर की गईं, जिनके नाम पहले ही मतदाता सूची में शामिल किए जाने के लिए मंजूर हो चुके थे।
प्रो. सलीम इंजीनियर ने फॉर्म-6 से जुड़े मामले को भी गंभीर बताया। फॉर्म-6 का इस्तेमाल 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके उन नागरिकों द्वारा किया जाता है, जो पहली बार मतदाता के रूप में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने आवेदकों के लिए यह शर्त रखी है कि वे अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी के नाम उसी तरह उपलब्ध कराएं, जिस तरह वे पिछली SIR की मतदाता सूची में दर्ज थे।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू, दोनों ने चेतावनी दी थी कि नियमों में संशोधन किए बिना फॉर्म-6 में इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह बदलाव जारी रखा।
उन्होंने कहा कि यदि मताधिकार को प्रभावित करने वाले किसी प्रावधान में बदलाव के लिए कानून में संशोधन आवश्यक है, तो चुनाव आयोग अपने स्तर पर इस तरह का परिवर्तन नहीं कर सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी कानूनी रूप से अधिकृत अधिकारी होते हैं, जो मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन के लिए जिम्मेदार होते हैं। हालांकि, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर चिंता जताई कि ECINet डेटाबेस को चुनाव आयोग के पास स्थानांतरित किया जा रहा था, जबकि संबंधित अधिकारियों को इसे संचालित करने के लिए पर्याप्त पहुंच नहीं दी जा रही थी।
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के नायब अमीर ने स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) में कथित असामान्य देरी पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि SSR मतदाता सूचियों को अद्यतन रखने और 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं के नाम मतदाता सूची में शामिल करने की महत्वपूर्ण वार्षिक प्रक्रिया है।
उन्होंने कहा कि 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर—इन चार तारीखों को आधार मानकर युवा नागरिक वर्ष के अलग-अलग समय में मतदान के योग्य हो सकते हैं। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने जनवरी 2024 के बाद से वार्षिक SSR नहीं कराया है। उनके अनुसार, यह देरी स्थिति को और चिंताजनक बनाती है।
उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने SIR के दौरान यह जानने के लिए कानूनी राय मांगी थी कि क्या SSR कराना आवश्यक है, जबकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SSR को बहाल करने की जोरदार वकालत की थी।
प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि SSR महज एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि मतदाता सूचियों को अद्यतन और सटीक बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रक्रिया है।
प्रो. सलीम इंजीनियर ने कहा कि लोकतंत्र की मांग है कि नागरिकों के लिए मतदाता बनना आसान बनाया जाए, कठिन नहीं। मतदान का अधिकार तभी सार्थक हो सकता है, जब नागरिक बिना अनावश्यक बाधाओं के मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा सकें।उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग देश के संविधान और जनता की संस्था है, किसी एक पदाधिकारी की निजी संस्था नहीं है।”
उन्होंने कहा कि नागरिकों को उनके मूलभूत मताधिकार से वंचित करना महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि देश और उसके नागरिकों के साथ गंभीर अन्याय है। इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जो लोग दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।