BMC elections: Opposition split, multi-cornered contest and division of votes make the BJP's path easier
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
बृहन्मुंबई महानगपालिका (बीएमसी) के लिए हुए चुनाव में बहुकोणीय लड़ाई, विपक्षी महा विकास आघाडी (एमवीए) खेमे में टकराव और विरोधियों के बीच एक ठोस रणनीति का अभाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने में मददगार साबित हुआ और संभवत: पहली बार देश के सबसे अमीर नगर निकाय में उसका महापौर होगा।
टेलीविजन समाचार चैनलों द्वारा शुक्रवार शाम को प्रसारित रुझानों के अनुसार, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की कुल 227 सीट में से 210 के रुझान सामने आए हैं जिनमें से भाजपा 90 सीटों पर आगे चल रही थी। उसकी सहयोगी शिवसेना 28 सीट पर, विपक्षी शिवसेना (उबाठा) 57 सीट पर, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(मनसे)नौ सीट पर, कांग्रेस 15 सीट पर, राज्य सरकार में सहयोगी लेकिन अलग लड़ रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) तीन पर और अन्य आठ सीट पर बढ़त बनाए नजर आ रहे थे।
भाजपा ने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन में 15 जनवरी को बीएमसी चुनाव लड़ा, जबकि उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना(उबाठा)और राज ठाकरे नीत मनसे चुनाव पूर्व गठबंधन कर मैदान में उतरे।
राज्य स्तर पर कांग्रेस, शिवसेना (उबाठा) और शरद पवार नीत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शप) के साथ गठबंधन महा विकास अघाडी (एमवीए) का हिस्सा है, लेकिन बीएमसी चुनाव में वह प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन आघाडी (वीबीए) और राष्ट्रीय समाज पक्ष (आरएसपी) के साथ मैदान में उतरी।
शिवसेना (उबाठा) और कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन ने एमवीए को करारा झटका दिया है। इससे गठबंधन की गंभीर संगठनात्मक कमजोरियां उजागर हुई हैं और महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को चुनौती देने की विपक्षी गठबंधन की क्षमता पर सवाल उठे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक एमवीए के भीतर आंतरिक विरोधाभास, कांग्रेस और शिवसेना (उबाठा) के बीच वैचारिक मतभेद, व्यक्तिगत टकराव और समन्वित रणनीति की कमी ने चुनावों में गठबंधन की प्रभावशीलता को कमजोर कर दिया है।
उन्होंने बताया कि मूल शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा)में विभाजन, साथ ही कांग्रेस के स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने के फैसले ने लगभग 200 वार्ड में भाजपा विरोधी वोटों को प्रभावी रूप से कमजोर कर दिया।
मुंबई को कभी कांग्रेस और शिवसेना (उबाठा) का गढ़ माना जाता था और यहां पर खराब प्रदर्शन दोनों दलों को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक झटका है।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना (उबाठा)के लिए यह परिणाम एक राजनीतिक दुस्वप्न से कम नहीं है। मुंबई अविभाजित शिवसेना आंदोलन का उद्गम स्थल था और दो दशकों से अधिक समय तक पार्टी के नियंत्रण में रहा। बीएमसी का हाथ से निकल जाना 2022 के विभाजन के बाद से पार्टी के नाटकीय पतन का प्रतीक है।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि ये रुझान अंतिम परिणामों में तब्दील होते हैं, तो वे शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की विरासत के ‘वास्तविक’ उत्तराधिकारी होने के शिंदे के दावे को सही साबित करेंगे और यह संकेत देंगे कि पार्टी के पारंपरिक मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग सत्तारूढ़ गठबंधन के घटक दल के प्रति निष्ठावान हो चुका है।