अजमेर के ऊंटड़ा गांव की जामा मस्जिद में छोटी सी लाइब्रेरी, बच्चों के सपनों को दे रही उड़ान

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 14-03-2026
A small library at the Jama Masjid in Untada village, Ajmer, is fueling children's dreams.
A small library at the Jama Masjid in Untada village, Ajmer, is fueling children's dreams.

 

फरहान इसराइली/ अजमेर

राजस्थान के अजमेर शरीफ और किशनगढ़ के बीच बसे छोटे से गांव ऊंटड़ा में शिक्षा के क्षेत्र में एक नई पहल ने सबका ध्यान खींचा है। गांव की जामा मस्जिद के परिसर में चंदे के पैसे से शुरू हुई एक छोटी सी लाइब्रेरी आज बच्चों और युवाओं के लिए उम्मीद और प्रेरणा का केंद्र बन गई है। सीमित संसाधनों के बावजूद गांव के शिक्षकों, डॉक्टरों और जागरूक नागरिकों ने मिलकर ऐसा माहौल तैयार किया है जहां बच्चे देर रात तक बैठकर अपने सपनों और भविष्य की तैयारी करते नजर आते हैं।

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इस लाइब्रेरी का नाम लिमरा एजुकेशन मुहिम लाइब्रेरी रखा गया है। सितंबर 2023में यह पहल शुरू हुई। धीरे-धीरे इसे स्थायी रूप देने की तैयारी भी हो रही है। इसके लिए लिमरा एजुकेशन मुहिम वेलफेयर एंड चैरिटेबल ट्रस्ट, ऊंटड़ा के नाम से पंजीकरण कराने की प्रक्रिया चल रही है। स्थानीय लोग सक्रिय रूप से इस पहल में सहयोग दे रहे हैं।

यहां आने वाले बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है। लाइब्रेरी न केवल ज्ञान का स्रोत है, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास, लगन और देश सेवा के प्रति जुनून भी पैदा कर रही है। गांव के कई बच्चे अब बड़े सपने देखने लगे हैं। वे चाहते हैं कि भविष्य में वे अपने गांव और देश के लिए कुछ बड़ा कर सकें। सीमित संसाधनों के बावजूद यह पहल साबित करती है कि सच्ची लगन और सामूहिक प्रयास से बड़े सपने सच किए जा सकते हैं।

लाइब्रेरी फिलहाल मस्जिद की ऊपरी मंजिल पर बने लगभग 30×30फीट के हॉल में संचालित हो रही है। हॉल को लकड़ी और प्लाई की मदद से इस तरह व्यवस्थित किया गया है कि बच्चे शांत वातावरण में पढ़ाई कर सकें। यहां पढ़ाई का अनुशासित माहौल स्पष्ट नजर आता है। लाइब्रेरी में करीब 34बच्चों के बैठने की व्यवस्था है। रोजाना लगभग 18बच्चे नियमित रूप से यहां पढ़ाई करते हैं। खास बात यह है कि लाइब्रेरी चौबीसों घंटे खुली रहती है। बच्चे अपनी सुविधा अनुसार किसी भी समय यहां पढ़ाई कर सकते हैं।

लाइब्रेरी खास तौर पर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। यहां राजस्थान और भारत का सामान्य ज्ञान, प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी किताबें और मानसिक क्षमता बढ़ाने वाली सामग्री रखी गई है। इसके साथ मुफ्त वाई-फाई की सुविधा भी दी गई है। इससे बच्चे ऑनलाइन लेक्चर और अध्ययन सामग्री भी देख सकते हैं। कई छात्र अपनी किताबें भी साथ लाते हैं और घंटों बैठकर पढ़ाई करते हैं। धीरे-धीरे यह स्थान गांव का साझा अध्ययन केंद्र बन गया है।

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लाइब्रेरी की शुरुआत आसान नहीं थी। कमेटी के सदस्य और शिक्षक मोहम्मद इकबाल बताते हैं कि सबसे पहले गांव के पढ़े-लिखे और जागरूक लोगों को इकट्ठा कर बैठक की गई। इसमें तय किया गया कि बच्चों को सही दिशा देने के लिए पढ़ाई के लिए अच्छा माहौल बनाना जरूरी है।

इकबाल लगातार गांव में लोगों को जागरूक करते रहे। उन्होंने मस्जिदों, चौक-चौराहों और बैठकों में लोगों से मिलकर बच्चों की पढ़ाई के महत्व को समझाया। नमाज़ के बाद, चबूतरों और चाय की दुकानों पर भी इस पहल पर चर्चा हुई। धीरे-धीरे लोगों को समझ में आने लगा कि अगर गांव में पढ़ाई का अच्छा माहौल बने, तो बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है।

लाइब्रेरी बनाने के लिए लोगों से सहयोग मांगा गया। गांव वाले अपनी क्षमता के अनुसार मदद करते रहे। किसी ने 500रुपये दिए, किसी ने 1000या 2000रुपये, तो कुछ ने 5000रुपये तक का योगदान दिया। इस सामूहिक सहयोग से करीब ढाई लाख रुपये जुटाए गए।

इस राशि से हॉल को पढ़ाई के अनुकूल बनाया गया। टेबल और कुर्सियों की व्यवस्था की गई, फर्श पर कालीन बिछाई गई, पंखे लगाए गए और बिजली की फिटिंग करवाई गई। हर टेबल के पास इलेक्ट्रिक बोर्ड लगे। इसके अलावा इन्वर्टर, कंप्यूटर, टीवी और सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। इंटरनेट के लिए वाई-फाई भी उपलब्ध कराया गया। मस्जिद कमेटी ने भी सहयोग करते हुए लाइब्रेरी से किसी प्रकार का किराया नहीं लिया।

लाइब्रेरी के संचालन के लिए नाममात्र की फीस रखी गई है। बोर्ड कक्षाओं के बच्चों से 100 रुपये और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बच्चों से 200रुपये प्रति माह लिए जाते हैं। कमेटी का मानना है कि थोड़ी सी फीस रखने से बच्चों में जिम्मेदारी और नियमितता बनी रहती है। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को निशुल्क पढ़ाई की सुविधा भी दी जाती है।

लाइब्रेरी शुरू हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है, लेकिन परिणाम नजर आने लगे हैं। एक छात्र हाल ही में चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरी में सफल हुआ। कमेटी का कहना है कि यह केवल शुरुआत है। अगर इसी तरह बच्चों को पढ़ाई का अच्छा माहौल मिलता रहा, तो आने वाले समय में कई छात्र बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफलता हासिल करेंगे।

इस पहल को और मजबूत बनाने के लिए गांव के गुल मोहम्मद, जो मदरसा शिक्षक हैं, ने लाइब्रेरी के लिए लगभग 200गज जमीन दान करने की घोषणा की। जमीन चिन्हित कर दी गई है। ट्रस्ट का पंजीकरण पूरा होने के बाद इसी जमीन पर लाइब्रेरी की अलग और बेहतर इमारत बनाने की योजना है।

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लाइब्रेरी के संचालन के लिए 12 सदस्यों की कमेटी बनाई गई है। अध्यक्ष मास्टर शफी मोहम्मद हैं। सचिव डॉ. वज़ीर मोहम्मद हैं और कोषाध्यक्ष डॉ. अब्दुल कादिर हैं। इसके अलावा कई शिक्षक, डॉक्टर और जागरूक लोग इस पहल में सहयोग दे रहे हैं। भविष्य में इसे डिजिटल लाइब्रेरी बनाने की योजना है। छात्रों को ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और ई-लर्निंग की सुविधाएं दी जाएंगी। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ऑफलाइन कोचिंग बैच भी शुरू करने की योजना है।

ऊंटड़ा गांव में करीब 1200 घर हैं। यह मुस्लिम बहुल गांव है। लेकिन यहां शुरू हुई यह तालीमी पहल पूरे इलाके के लिए प्रेरणा बनती जा रही है। गांव के युवाओं का कहना है कि पहले पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में ही ऐसा स्थान मिल गया है जहां वे शांति से अपने भविष्य की तैयारी कर सकते हैं।

मस्जिद के एक साधारण हॉल से शुरू हुई यह पहल अब गांव के बच्चों और युवाओं के लिए मेहनत, उम्मीद और बेहतर भविष्य की नई राह खोल रही है। समाज का सहयोग इसी तरह बना रहे, तो यह छोटी सी लाइब्रेरी कई बड़े सपनों को हकीकत में बदल सकती है।