AI could use 3% of the world's electricity by 2030, leading to excessive water consumption.
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग से ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को लेकर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक नई रिपोर्ट ने गंभीर चेतावनी जारी की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक एआई से जुड़ी प्रणालियां दुनिया की कुल बिजली खपत का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा उपयोग कर सकती हैं, जबकि डेटा केंद्रों की शीतलन जरूरतों के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी वैश्विक आबादी की वार्षिक पेयजल आवश्यकता से भी अधिक हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई की बढ़ती क्षमता और लोकप्रियता के साथ उसके पर्यावरणीय प्रभाव भी तेजी से बढ़ रहे हैं। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि एआई मॉडल समय के साथ अधिक दक्ष और कम ऊर्जा खपत वाले हो जाएंगे, जिससे उनकी पर्यावरणीय लागत घटेगी। हालांकि, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह धारणा भ्रामक हो सकती है।
रिपोर्ट में ‘जेवॉन्स पैराडॉक्स’ का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार किसी तकनीक की दक्षता बढ़ने पर संसाधनों की कुल खपत कम होने के बजाय बढ़ सकती है। यह सिद्धांत 19वीं सदी के अर्थशास्त्री विलियम स्टेनली जेवॉन्स के अवलोकन पर आधारित है, जिन्होंने पाया था कि कोयले के उपयोग की दक्षता बढ़ने के बावजूद उसकी कुल मांग और खपत में वृद्धि हुई थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे एआई मॉडल अधिक सस्ते और सुलभ होंगे, उनके उपयोग के नए क्षेत्र विकसित होंगे और कुल मांग बढ़ेगी, जिससे दक्षता से होने वाली बचत का लाभ समाप्त हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष ही दुनिया भर के डेटा केंद्रों ने उतनी बिजली की खपत की थी जितनी सऊदी अरब करता है। सऊदी अरब विश्व का 11वां सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता देश है। यदि 2030 तक बिजली की मांग अनुमान के अनुरूप दोगुनी होती है, तो उसके कार्बन प्रभाव की भरपाई के लिए 10 वर्षों तक 6.7 अरब पेड़ उगाने की आवश्यकता पड़ेगी।
अध्ययन में कहा गया है कि डेटा केंद्रों को 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी तथा विशाल भू-क्षेत्र की जरूरत होगी, जिसका आकार मेक्सिको सिटी के क्षेत्रफल से लगभग 10 गुना अधिक हो सकता है।