आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बुधवार को कहा कि न्यायपालिका का मूल सिद्धांत यह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) न्यायिक तर्क क्षमता को बेहतर तो बना सकती है लेकिन यह न्यायिक विवेक का स्थान नहीं ले सकती।
प्रधान न्यायाधीश ने बताया कि नयी प्रौद्योगिकी के रूप में एआई को अपनाने और उसकी जवाबदेही की निगरानी के लिए एक स्थायी शीर्ष संस्था बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।
जर्मनी के कार्ल्सरूहे स्थित फेडरल कोर्ट ऑफ जस्टिस के पीठासीन न्यायाधीश उलरिख हरमन के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का इस्तेमाल कुछ निर्धारित सहायक कार्यों में किया जा रहा है। इनमें कानूनी शोध, फैसलों का 16 भाषाओं में अनुवाद और नागरिकों को मुकदमे की स्थिति तथा प्रक्रियाओं की जानकारी देने के लिए संवाद आधारित माध्यम के रूप में इसका इस्तेमाल शामिल है।
उन्होंने कहा कि हालांकि इन तकनीकों का उद्देश्य बार-बार किए जाने वाले काम को कम करना है, लेकिन ये न्यायिक फैसलों का निर्धारण नहीं करती हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) न्यायिक तर्क क्षमता को बेहतर बना सकती है लेकिन वह न्यायिक विवेक का स्थान नहीं ले सकती। उच्चतम न्यायालय की एआई समिति के मसौदा नियमों में समय-सारिणी तैयार करने, कार्यवाही को लिखित रूप देने और अनुवाद जैसे प्रशासनिक कार्यों में एआई के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। हालांकि, गवाहों की विश्वसनीयता, फरार होने के जोखिम, दोबारा अपराध करने की आशंका या जमानत के लिए पात्रता के आकलन में एआई के इस्तेमाल पर रोक है। एआई के इस्तेमाल और उसकी जवाबदेही की निगरानी के लिए एक स्थायी शीर्ष संस्था के गठन का प्रस्ताव भी दिया गया है।’’