क्या आप भी हैं Winter Depression के शिकार, जानिए लक्षण और बचाव

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari • 2 Months ago
winter depression it's symptoms & prevention
winter depression it's symptoms & prevention

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली 
 
मौसमी भावात्मक विकार (एसएडी) एक प्रकार का अवसाद है जो मौसमी पैटर्न में आता और जाता है. एसएडी को कभी-कभी "शीतकालीन अवसाद"(winter depression) के रूप में जाना जाता है क्योंकि सर्दी के दौरान लक्षण आमतौर पर अधिक स्पष्ट और अधिक गंभीर होते हैं. एसएडी से पीड़ित कुछ लोगों में गर्मी के दौरान लक्षण हो सकते हैं और सर्दी के दौरान वे बेहतर महसूस कर सकते हैं. इससे बचाव के लिए धुप बेहद लाभकारी है और इसकी रोशनी शरीर को एक ऐसी ऊर्जा प्रदान करती है जिसकी तुलना और किसी अन्य दवाई से मिलने वाली ऊर्जा से नहीं की जा सकती. जो काम दवाओं से होता है वो ये धूप मुफ्त में कर देती है. 
 
 
शीतकालीन अवसाद का क्या कारण है?
एसएडी का सटीक कारण पूरी तरह से समझा नहीं गया है, लेकिन इसे अक्सर छोटे शरद ऋतु और सर्दियों के दिनों के दौरान सूरज की रोशनी के कम संपर्क से जोड़ा जाता है. सुबह उठ कर हम सूरज की रोशनी देखते हैं या नहीं इससे रात में हमारी नींद पर भी असर पड़ता है.
 
दरअसल हमारे शरीर की हर कोशिका को टाइम की जानकारी चाहिए, ताकि वो दिन और रात के हिसाब से सही ढंग से काम कर सकें. हमारे मुंह के ऊपरी हिस्से में खास तरह के न्यूरॉन्स होते हैं जिन्हें सुप्राकायस्मैटिक न्यूक्लियस कहते हैं और ये हमारे शरीर में घड़ी की तरह दूसरी कोशिकाओं को दिन और रात के बारे में बताते हैं.
 
मुख्य सिद्धांत यह है कि सूरज की रोशनी की कमी से मस्तिष्क का हाइपोथैलेमस नामक हिस्सा ठीक से काम करना बंद कर सकता है, जो निम्न को प्रभावित कर सकता है:
 
मेलाटोनिन का उत्पादन - मेलाटोनिन एक हार्मोन है जो आपको नींद का एहसास कराता है; एसएडी वाले लोगों में, शरीर इसका उत्पादन सामान्य स्तर से अधिक कर सकता है.
 
सेरोटोनिन का उत्पादन - सेरोटोनिन एक हार्मोन है जो आपके मूड, भूख और नींद को प्रभावित करता है; सूर्य के प्रकाश की कमी से सेरोटोनिन का स्तर कम हो सकता है, जो अवसाद की भावनाओं से जुड़ा है.
 
शरीर की आंतरिक घड़ी (सर्कैडियन लय) - आपका शरीर विभिन्न महत्वपूर्ण कार्यों के लिए सूर्य के प्रकाश का उपयोग करता है, जैसे कि जब आप उठते हैं, तो सर्दियों के दौरान कम रोशनी का स्तर आपके शरीर की घड़ी को बाधित कर सकता है और एसएडी के लक्षणों को जन्म दे सकता है.
 
यह भी संभव है कि कुछ लोग अपने जीन के कारण एसएडी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि कुछ मामले परिवारों में चलते दिखाई देते हैं.
 
चूंकि हमारे दिमाग तक लाइट सीधे नहीं पहुंच सकती. इसलिए हमारी आंखों के पीछे के हिस्से में खास तरह की सेल्स होती हैं जिन्हें मेलेनॉप्सिन गैंगलियोन सेल्स कहते हैं। ये खास तरह की कोशिकाएं लाइट सेंसिटिव होती हैं और दिमाग को दिन और रात के बारे में बताती हैं.
 
इसलिए सुबह की रोशनी दिमाग के जागने और अलर्ट रहने के लिए बहुत जरूरी है. यहां तक कि जो लोग देख नहीं सकते उनके लिए भी सुबह रोशनी में रहना जरूरी है ताकि दिमाग को दिन और रात का सही अंदाजा हो सके और शरीर में बाकी काम उसी हिसाब से किए जा सकें.
 
लेकिन क्या हो अगर हमें बाकायदा सुबह सूरज की रोशनी न मिले. या फिर अगर हम लंबे समय तक बिना सन लाइट के रहें तो? आज दुनिया भर के मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सन लाइट का हमारे मूड पर भी असर पड़ता है.
 
जिसकी वजह से कुछ लोगों में सर्दियों में डिप्रेशन के लक्षण देखे जा सकते हैं. इसे विंटर डिप्रेशन या सीजनल इफेक्टिव डिसॉर्डर कहते हैं.
 
एसएडी के लक्षणों में शामिल हो सकते हैं:
 
*लगातार ख़राब मूड
*सामान्य रोजमर्रा की गतिविधियों में आनंद या रुचि की हानि
*चिड़चिड़ापन
*निराशा, अपराधबोध और बेकार की भावनाएँ
*दिन के दौरान सुस्ती (ऊर्जा की कमी) और नींद महसूस होना
*सामान्य से अधिक समय तक सोना और सुबह उठना कठिन होना
*कार्बोहाइड्रेट की लालसा और वजन बढ़ना (ज्यादा खाने की इच्छा)
*ध्यान लगाने में मुश्किल 
*सेक्स ड्राइव में कमी
*कुछ लोगों के लिए, ये लक्षण गंभीर हो सकते हैं और उनकी दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं
 
डॉ. (general practitioner) आपके मानसिक स्वास्थ्य की जांच के लिए मूल्यांकन कर सकता है. वे आपसे आपके मूड, जीवनशैली, खाने की आदतों और सोने के पैटर्न के साथ-साथ आपके विचारों और व्यवहार में किसी भी मौसमी बदलाव के बारे में पूछ सकते हैं.
 
ठंड में उदासी का एक बड़ा कारण धूप की कमी है. अक्सर लोग खिड़कियों में परदे लगा लेते हैं ताकि सुबह की धूप उमकी नींद न तोड़े, लेकिन ये धूप बहुत जरूरी है. ये हमारा मूड सही रखती है और नींद सुधारती है. 
 
ठंड में रोज सुबह धूप में रहना क्यों जरूरी है?
 
जब हम सुबह उठते ही रोशनी में जाते हैं तो हमारे दिमाग से स्ट्रेस हॉर्मोन कॉर्टिसॉल निकलता है. जो हमें फौरन जागने और अलर्ट रहने के लिए तैयार करता है. लेकिन ये हेल्दी कॉर्टिसॉल है जो हमारी मदद करता है. इन 3 पॉइट्स के जरिए दिमाग पर लाइट के असर को समझते हैं.
 
1. हमारा शरीर दिन में एक बार कॉर्टिसॉल जरूर रिलीज करता है. ये शरीर का नॉर्मल प्रोसेस है. लेकिन अगर ये कॉर्टिसॉल सुबह की बजाय शाम को रिलीज हो तो? इस बारे में स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड स्पीगल और बॉब सपोलस्की ने एक रिसर्च की और देखा कि अगर ये हेल्दी कॉर्टिसॉल सुबह की बजाय रात 8-9 के बीच रिलीज होने लगे तो इससे डिप्रेशन हो सकता है.
 
इसलिए हम समझ सकते हैं कि सुबह धूप में रहने से हेल्दी कॉर्टिसॉल का लेवल शाम की बजाय सुबह शिफ्ट करके, डिप्रेशन जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है.
 
2. सुबह रोशनी और धूप में रहने से नींद के हॉर्मोन मेलाटोनिन भी कम निकलता है, जो कि रात में अच्छी नींद लेने में हमारी मदद करता है.
 
3. इसके साथ सुबह की धूप से हैप्पी हॉर्मोन डोपामाइन भी रिलीज होता है. जो कि हमें खुशी का एहसास देता है और मोटिवेट रहने में हमारी मदद करता है.
 
खाने पीने का रखें खास ख्याल
फास्ट फूड और हाई शुगर हमारे शरीर के लिए तो नुकसानदायक है ही, ये हमारे मूड पर भी असर डालते हैं. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में छपी एक रिसर्च में देखन गया कि फल-सब्जियां और हेल्दी डाइट खाने वालों के मुकाबले फास्ट फूड खाने वाले लोगों को डिप्रेशन का खतरा ज्यादा है.
वहीं कुछ खाने की चीजें ऐसी हैं जो हमारे मूड को बेहतर रखने में मदद कर सकती हैं इसलिए सर्दियों में उदासी से बचने के लिए इन्हें अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं.