आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
विश्व में अधिकतर लोगों को 28 आम बीमारियों में से तीन रोगों का उच्च आनुवंशिक जोखिम रहता है जिनमें मधुमेह, हृदय रोग और सित्ज़ोफ्रेनिया शामिल हैं। यह बात एक नए अध्ययन में कही गई है।
ब्रिटेन के एक्सेटर विश्वविद्यालय की टीम के नेतृत्व में अनुसंधानकर्ताओं ने ‘औसत’ मानव जीनोम का अध्ययन करते हुए पाया कि हर व्यक्ति, चाहे उसकी वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति कुछ भी हो, केवल अपनी आनुवंशिक बनावट के आधार पर कई तरह की बीमारियों के जोखिम में हो सकता है।
‘जीनोम मेडिसिन’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट से पता चलता है कि हर व्यक्ति के ‘जीनोम’ में लगभग 50 लाख ‘वैरिएंट’ (डीएनए के ऐसे हिस्से जो अलग-अलग व्यक्तियों में भिन्न होते हैं) पाए जाते हैं।
इनमें लगभग 10,000 ऐसे ‘वैरिएंट’ शामिल हैं जो जीन क्रम को बदल देते हैं। इनका असर सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है-जैसे ‘लैक्टोज’ न पच पाने से लेकर दवाओं के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया तक। हालाँकि, अक्सर ये जैविक रूप से तटस्थ होते हैं।
अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि हर व्यक्ति में एक से तीन ऐसे दुर्लभ ‘वैरिएंट’ होते हैं, जिनके बारे में पहले ही पता चल चुका है कि वे गंभीर आनुवंशिक बीमारियां पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा, हर व्यक्ति में 50 अन्य दुर्लभ ‘वैरिएंट’ भी होते हैं, जिनका चिकित्सीय महत्व अभी स्पष्ट नहीं है।
टीम ने दो बड़े जनसंख्या बायोबैंक - यूके बायोबैंक (यूकेबी) और अमेरिका के ‘ऑल ऑफ अस’ - के डेटा का विश्लेषण किया। इनमें लगभग दस लाख लोगों का संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण शामिल है।
स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद संकीर्णता से परे मानवता और विश्व बंधुत्व की भावना से जुड़ा था। डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव अपने लेख 'स्वामी विवेकानन्द के समानता, स्वतन्त्रता एवं राष्ट्र सम्बन्धी विचार' में लिखते हैं कि तत्कालीन युग की सबसे बड़ी मांग राष्ट्रवाद थी, जिसे विवेकानंद ने अपनी ओजस्वी वाणी में व्यक्त किया। वह आगे लिखते हैं कि यह राष्ट्रवाद कोई अमूर्त और संकीर्ण अवधारणा नहीं, बल्कि विश्व बंधुत्व से ओत-प्रोत था, जिसके मूल में भारत की सनातन परंपरा और उसकी संतानों का हित निहित था।