तहूरा खातून: छोटे गांव से अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स तक का सफर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 23-10-2026
Tahura Khatoon: A Journey from a Small Village to International Athletics
Tahura Khatoon: A Journey from a Small Village to International Athletics

 

तरुण नंदी

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के भांगड़ इलाके के फूलबाड़ी गांव की 19 वर्षीय तहूरा खातून आज अपनी मेहनत, लगन और खेल प्रतिभा के दम पर नई पहचान बना रही हैं। उनके पिता मीर तैयब अली एक छोटे किसान हैं और मां आईसीडीएस केंद्र में सहायिका के रूप में काम करती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण है। घर में चार भाई बहन हैं। सीमित आमदनी में परिवार की जरूरतें पूरी करना आसान नहीं है। इसके बावजूद तहूरा ने अपने सपनों को छोटा नहीं होने दिया।

उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में पदक जीते और अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। अब उनकी निगाहें उस बड़े लक्ष्य पर टिकी हैं, जहां हर खिलाड़ी अपने देश की जर्सी पहनकर ओलंपिक ट्रैक पर उतरने का सपना देखता है।

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तहूरा खातून की कहानी केवल एक युवा एथलीट की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस परिवार के संघर्ष की कहानी भी है, जिसने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अपनी बेटी की प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर दिया।

भांगड़ के फूलबाड़ी गांव में रहने वाले इस परिवार के पास बड़े संसाधन नहीं थे। पिता खेती करके परिवार का खर्च चलाते हैं। मां अपने काम के साथ घर की जिम्मेदारियां भी संभालती हैं। चार भाई बहनों वाले परिवार में हर जरूरत को सोच समझकर पूरा करना पड़ता है। ऐसे माहौल में खेल को करियर बनाना आसान नहीं था। लेकिन तहूरा के परिवार ने उनकी रुचि को समझा और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

तहूरा के माता पिता बताते हैं कि बचपन से ही उनकी बेटी को खेलकूद में गहरी दिलचस्पी थी। दौड़ने के प्रति उनका उत्साह देखकर पिता मीर तैयब अली ने समय रहते उनकी प्रतिभा को पहचान लिया। प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने तहूरा को स्पोर्ट्स स्कूल में दाखिला दिलाया।

यहीं से उनकी एथलेटिक्स यात्रा ने व्यवस्थित रूप लेना शुरू किया। शुरुआती दिनों में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि गांव की गलियों और सीमित संसाधनों के बीच आगे बढ़ने वाली यह लड़की एक दिन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा बनेगी।

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खेल के मैदान पर प्रतिभा दिखाना किसी भी खिलाड़ी के लिए पहला कदम होता है। उसके बाद नियमित प्रशिक्षण, उचित खेल सामग्री, यात्रा और प्रतियोगिताओं में भाग लेने का खर्च बड़ी चुनौती बन जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए ये खर्च कई बार बच्चों के सपनों के रास्ते में बाधा बनते हैं।

तहूरा के साथ भी मुश्किलें कम नहीं थीं। परिवार की आमदनी सीमित थी, लेकिन पिता ने बेटी की तैयारी में कमी नहीं आने दी। खेती से होने वाली कमाई के बीच उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार जरूरी इंतजाम किए। परिवार के इसी सहयोग ने तहूरा को लगातार अभ्यास करने और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का हौसला दिया।

तहूरा की मेहनत का असर वर्ष 2018 में दिखाई दिया, जब उन्होंने स्कूल नेशनल प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। यह उनकी शुरुआती महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक थी। इस सफलता ने उन्हें आगे बढ़ने का भरोसा दिया।

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेलो इंडिया, नेशनल जूनियर फेडरेशन और अन्य राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए उन्होंने अपनी क्षमता को लगातार निखारा।

वर्ष 2021 से 2026 के बीच तहूरा ने अलग अलग प्रतियोगिताओं में कुल 12 पदक हासिल किए। इन पदकों में स्वर्ण, रजत और कांस्य शामिल हैं। हर उपलब्धि के पीछे घंटों का अभ्यास, अपनी कमियों को दूर करने की कोशिश और बेहतर प्रदर्शन करने का संकल्प रहा।

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एक प्रतियोगिता में सफलता मिलने के बाद अगली प्रतियोगिता की तैयारी शुरू हो जाती थी। एथलेटिक्स में कुछ सेकंड का अंतर भी नतीजा बदल सकता है। ऐसे में गति, सहनशक्ति, तकनीक और मानसिक मजबूती पर लगातार काम करना पड़ता है। तहूरा ने इन चुनौतियों के बीच अपनी जगह बनाई।

राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। चीन के हांगकांग में आयोजित एशियन अंडर 20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने महिलाओं की 4×400 मीटर रिले स्पर्धा में भारत की ओर से हिस्सा लिया। भारतीय टीम ने इस स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। तहूरा इस स्वर्ण पदक विजेता टीम की सदस्य थीं। टीम की अन्य तीन धाविकाएं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब से थीं।

यह उपलब्धि तहूरा के लिए खास थी। एक छोटे किसान परिवार से आने वाली बंगाल की इस युवा खिलाड़ी ने अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स मंच पर देश का प्रतिनिधित्व किया। उनके लिए यह पदक वर्षों की मेहनत का परिणाम था। उनके परिवार के लिए यह गर्व का क्षण था।

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फूलबाड़ी जैसे गांव में रहने वाली एक लड़की का अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में भारत की जर्सी पहनना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। इस सफलता ने यह भी दिखाया कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या संपन्न परिवार की मोहताज नहीं होती। सही मार्गदर्शन, निरंतर अभ्यास और अवसर मिलने पर छोटे गांवों से भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी सामने आ सकते हैं।

महिलाओं की 4×400 मीटर रिले एक टीम स्पर्धा है। इसमें चार धाविकाएं बारी बारी से 400 मीटर की दूरी तय करती हैं। हर खिलाड़ी की गति के साथ बैटन सौंपने की तकनीक और टीम के सदस्यों के बीच तालमेल भी अहम होता है। इस स्पर्धा में जीत के लिए व्यक्तिगत प्रदर्शन के साथ सामूहिक तैयारी जरूरी है। भारतीय टीम की स्वर्ण पदक जीत में तहूरा की भागीदारी उनके खेल करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव बनी।

अंतरराष्ट्रीय सफलता के बाद तहूरा की उपलब्धियों को सरकारी स्तर पर भी सम्मान मिला। हालांकि, उनकी उपलब्धि के बाद सम्मान और आर्थिक सहायता मिलने की प्रक्रिया को लेकर उन्हें इंतजार करना पड़ा। दूसरे राज्यों के खिलाड़ियों को मिलने वाले पुरस्कार और सम्मान की चर्चा के बीच तहूरा के भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे थे।

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बाद में राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर कोलकाता के नवान्न में आयोजित कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के अन्य उत्कृष्ट खिलाड़ियों के साथ तहूरा को भी सम्मानित किया। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम की सदस्य के रूप में उन्हें 12 लाख 50 हजार रुपये की पुरस्कार राशि दी गई।

यह सम्मान उनके लिए केवल आर्थिक सहायता नहीं था। इससे उनकी मेहनत को आधिकारिक पहचान मिली। खेल में आगे बढ़ने के लिए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, पोषण, यात्रा और प्रतियोगिताओं की तैयारी पर लगातार खर्च करना पड़ता है। ऐसे में आर्थिक पुरस्कार युवा खिलाड़ियों और उनके परिवारों को राहत दे सकता है। तहूरा के लिए भी यह उपलब्धि आगे की तैयारी में आत्मविश्वास बढ़ाने वाली रही।

फिलहाल तहूरा कोलकाता के साल्ट लेक स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण यानी स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के तहत प्रशिक्षण ले रही हैं। वर्ष 2022 से उन्हें सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत प्रशिक्षण की सुविधा मिल रही है। इससे उन्हें अपनी एथलेटिक्स तैयारी को नियमित रखने में मदद मिली है। प्रशिक्षण के साथ वह अपनी पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। तहूरा बारासात स्थित एडमास यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान से स्नातक की पढ़ाई के दूसरे वर्ष में हैं।

खेल और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाए रखना उनके दैनिक जीवन का अहम हिस्सा है। सुबह से अभ्यास और शारीरिक तैयारी का सिलसिला चलता है। इसके साथ प्रतियोगिताओं की तैयारी और पढ़ाई की जिम्मेदारियां भी रहती हैं। किसी खिलाड़ी के लिए यह संतुलन हमेशा आसान नहीं होता। खासकर तब, जब लक्ष्य राष्ट्रीय स्तर से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार बेहतर प्रदर्शन करना हो। तहूरा जानती हैं कि एक बड़ी जीत के बाद भी मेहनत खत्म नहीं होती। हर नए मुकाबले में खुद को साबित करना पड़ता है।

अब तहूरा खातून का सपना ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करना है। हालांकि, ओलंपिक तक पहुंचने के लिए उन्हें आगे कई स्तरों पर अच्छा प्रदर्शन करना होगा। अंतरराष्ट्रीय अनुभव, बेहतर समय, नियमित प्रशिक्षण और चयन प्रतियोगिताओं में सफलता उनके लिए महत्वपूर्ण होंगे। महिलाओं की 400 मीटर और 4×400 मीटर रिले जैसी स्पर्धाओं में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में उन्हें अपनी गति, सहनशक्ति और तकनीक को अगले स्तर तक ले जाना होगा।

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तहूरा की यात्रा उन युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित आर्थिक संसाधनों के कारण अपने खेल के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि प्रतिभा को आगे बढ़ाने में परिवार का भरोसा, प्रशिक्षण की सुविधा और सही समय पर मिलने वाला सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही, ऐसी उपलब्धियां खेल संस्थानों और सरकार के सामने यह सवाल भी रखती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को शुरुआती दौर से ही बेहतर सुविधाएं कैसे उपलब्ध कराई जाएं।

भांगड़ के फूलबाड़ी गांव की तहूरा खातून अभी अपने लक्ष्य से दूर हैं, लेकिन उनकी उपलब्धियां बताती हैं कि उन्होंने मजबूत शुरुआत की है। एक छोटे किसान की बेटी से अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता टीम की सदस्य बनने तक का उनका सफर संघर्ष और संकल्प की मिसाल है।

उनके सामने अब नई चुनौतियां हैं और उन्हें पार करने के लिए लंबा अभ्यास करना होगा। तहूरा फिलहाल अपने ट्रैक पर दौड़ रही हैं। उनकी नजर केवल अगले पदक पर नहीं, बल्कि उस दिन पर है जब वह ओलंपिक के ट्रैक पर भारत की जर्सी पहनकर उतरेंगी।