कर्नाटक का यक्षगान : मुस्लिम कलाकार अरशिया खान ने निभाया देवी का किरदार

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 23-10-2026
Karnataka’s Yakshagana: Muslim artist Arshia Khan played the role of a goddess
Karnataka’s Yakshagana: Muslim artist Arshia Khan played the role of a goddess

 

शिरीष खरे

मंगलुरु के कदरी मंजुनाथ मंदिर में देवी महात्म्य की प्रस्तुति हुई। आठ भुजाओं वाली श्रीदेवी के मुकुट के नीचे अरशिया खान थीं, जिन्हें यक्षगान की दुनिया में तानु विटला के नाम से जाना जाता है। वह मुस्लिम हैं, और जिस देवी का किरदार वह निभा रही थीं, वह हिंदू आस्था की देवी हैं। प्रस्तुति पर लोगों का ध्यान गया। पर इसे सिर्फ़ एक अनोखी घटना मानकर आगे बढ़ जाना यक्षगान की मूल बात से चूक जाना है। यह विधा समुदायों को किसी घोषणा से नहीं जोड़ती। वह हर किसी को कोई न कोई काम देती है: किसी को किरदार, किसी को ताल, किसी को आँगन में बैठने की जगह।

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यक्षगान की कथाएँ रामायण, महाभारत और पुराणों से आती हैं। उसके मंच पर देवता, असुर, राजा और योद्धा उतरते हैं। पर इन कथाओं को साधने और देखने वालों की पहचानें एक नहीं हैं। कोई बचपन में स्कूल के वार्षिक समारोह से इस कला तक पहुँचता है, कोई रोज़गार के लिए विदेश जाकर भी इसकी ओर लौट आता है, और कोई परिवार पीढ़ियों से अपने घर में इसकी प्रस्तुति करवाता है। रास्ते अलग हैं, पर इन तीनों जगहों पर हिंदू, मुस्लिम और ईसाई, तीनों की मौजूदगी दर्ज है।

कुंदापुर के पास कव्राडी के मोहम्मद गौस पाँच दशक से यक्षगान कर रहे हैं। परिवार ने उन्हें काम के लिए सऊदी अरब भेजा था। वहाँ सात साल बिताने के बाद भी कला का खिंचाव कम नहीं हुआ। वह लौट आए और यक्षगान में फिर सक्रिय हो गए।

मदमक्की वीरभद्रेश्वर यक्षगान मंडली के साथ उन्होंने अर्जुन और भस्मासुर जैसे किरदार निभाए। एक तरफ़ महाभारत का धनुर्धर, दूसरी तरफ़ वह असुर जिसे कथा में गिरना है। उन्होंने तटीय कर्नाटक में प्रचलित यक्षगान की दोनों प्रमुख शैलियों, तेंकुतिट्टु और बडगुतिट्टु, में भी काम किया है। दो शैलियों में टिकना बताता है कि यह रिश्ता कुछ प्रस्तुतियों का नहीं, पूरे जीवन का है।

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इस जुड़ाव की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। गौस के मुताबिक, यक्षगान से उनके रिश्ते के कारण कुछ रिश्तेदारों ने उनसे दूरी बना ली, और इसका असर उनके परिवार पर भी पड़ा। फिर भी उन्होंने कला नहीं छोड़ी। उनका कहना है, "जाति और धर्म इंसानों के बनाए हुए हैं।" वह आख़िरी साँस तक यक्षगान से जुड़े रहना चाहते हैं। यह बात किसी बाहरी दर्शक की नहीं, उस आदमी की है जिसने प्रशिक्षण, प्रदर्शन और कठिनाइयों के बीच अपना जीवन बिताया।

अरशिया की शुरुआत दूसरी तरह की है। विटला के पास माडा में बचपन के दौरान अपने इलाके में यक्षगान की प्रस्तुति देखकर वह इसकी ओर खिंचीं। करीब दस साल की उम्र में एक स्कूल शिक्षक ने वार्षिक समारोह के लिए उन्हें यह कला सिखाई। यानी उनका पहला दरवाज़ा किसी मंदिर या घराने का नहीं, एक स्कूल का था। आगे चलकर उन्होंने मंगलुरु के कदली कला केंद्र में प्रशिक्षण लिया और तानु विटला के नाम से मंच पर पहचान बनाई।

उन्हें 'बन्नदा वेशा' यानी रंगीन वेशभूषा वाले असुर और खलनायक सबसे ज़्यादा पसंद थे। महिषासुर, निशुंभ और रक्तबीज उन्होंने निभाए। वह चेंडे नाम का तालवाद्य भी सीखना चाहती थीं। यानी वह मंच के सिर्फ़ चमकदार हिस्से में नहीं, ताल के भीतर की मेहनत में भी अपनी जगह चाहती थीं।

यहाँ एक बात ग़ौर करने लायक है। देवी महात्म्य की कथा में महिषासुर, निशुंभ और रक्तबीज देवी के विरोधी हैं। अरशिया ने इन असुरों की भूमिकाएँ निभाईं और अब देवी की भूमिका में भी मंच पर आईं।

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यक्षगान में देवता और असुर, दोनों को कोई न कोई कलाकार साधता है, और उस साधना की शर्त रियाज़ है, कलाकार की धार्मिक पहचान नहीं। पर मंच के बाहर यह भागीदारी हमेशा सहज नहीं रही। अरशिया को अपने समुदाय के कुछ लोगों की आपत्ति सहनी पड़ी, हालाँकि परिवार उनके साथ रहा। यक्षगान में महिलाओं की भागीदारी वैसे भी सीमित रही है, इसलिए उनके सामने धर्म के साथ-साथ लिंग की सीमा भी थी।

यक्षगान का यह रिश्ता कलाकारों तक ही सीमित नहीं है। उडुपी के मालपे इलाके में बादनिडियूर गणजन यक्षगान कला संघ की चिम्मेला मंडली नवरात्रि के दौरान परिवारों के निमंत्रण पर उनके घरों में प्रस्तुति देती है। यह परंपरा छह दशक से भी ज़्यादा पुरानी है। मंडली हिंदू परिवारों के साथ मुस्लिम और ईसाई परिवारों के यहाँ भी जाती है। यहाँ यक्षगान मंच से उतरकर घरों के आँगन तक पहुँचता है।

वडाभांडेश्वर के सरफ़राज़ ने इस परंपरा के बारे में कहा, "हमारा परिवार पीढ़ियों से यक्षगान का आनंद लेता आया है।" उनके अनुसार, गणजन यक्षगान मंडली उनके दादा के समय से प्रदर्शन करती रही है, और परिवार के सब लोग साथ बैठकर चिम्मेला देखते हैं।

इस प्रसंग की ख़ास बात उसकी सादगी है। यहाँ किसी ने साझी संस्कृति का नारा नहीं दिया, कोई अभियान नहीं चला। एक तरफ़ से बुलावा आता है, दूसरी तरफ़ से मंडली पहुँचती है। जो रिश्ता पीढ़ियों में बना हो, उसे दादा के ज़माने का हवाला देकर समझाया जाता है, किसी विचारधारा का नहीं।

इन तीनों कहानियों को साथ रखें तो एक पैटर्न दिखता है। मंच पर गौस को किरदार साधना है, अरशिया को ताल और अभिनय, और सरफ़राज़ के परिवार को सिर्फ़ साथ बैठना है। हर जगह माँग कला की है, पहचान की जाँच कहीं नहीं। जब माँग कला की होती है, तब हिंदू, मुस्लिम और ईसाई एक ही परंपरा के भागीदार बन सकते हैं, चाहे कोई कलाकार बनकर जुड़े, कोई मंडली बुलाकर, या कोई पीढ़ियों से परिवार के साथ बैठकर।

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फिर भी यक्षगान को ऐसी दुनिया की तरह पेश करना ठीक नहीं होगा जहाँ धर्म और समुदाय के सवाल कभी उठते ही नहीं। गौस और अरशिया दोनों ने विरोध झेला है। किसी परंपरा से जुड़ने की इच्छा और अपने समुदाय में उसकी स्वीकृति हमेशा साथ नहीं चलतीं। पर उनके अनुभव यह भी बताते हैं कि धार्मिक पहचान हर बार अंतिम सीमा नहीं बनती।

यक्षगान की ताक़त यह नहीं कि वह अपनी कथाएँ या जड़ें बदल देता है। कथाएँ वही रहती हैं, देवता वही, असुर वही। ताक़त यह है कि उन्हीं कथाओं को मंच पर उतारने, देखने और अपने घर बुलाने वाले लोग अलग-अलग समुदायों से आ सकते हैं। पहचानें मिटती नहीं, पर उनके बीच एक साझा जगह बनती है। यक्षगान का सामाजिक महत्व इसी जगह में है।

( शिरीष खरे स्वतंत्र लेखक और पत्रकार हैं। ग्रामीण भारत, सामाजिक जीवन, ग्रामीण आजीविका, पलायन और सार्वजनिक संस्थानों से जुड़े विषयों पर लिखते हैं। इनकी हिंदी पुस्तकों में ‘एक देश बारह दुनिया’ और कहानी-संग्रह ‘नदी सिंदूरी’ शामिल हैं।)