आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
कुपोषण की समस्या का समाधान करने से दुनिया भर में तपेदिक (टीबी) के 23 लाख मामलों को रोका जा सकता है। यह संख्या 2023 में वयस्कों को हुए कुल संक्रमणों का 23.7 प्रतिशत है। 'द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ' जर्नल में प्रकाशित एक मॉडलिंग अध्ययन में यह जानकारी सामने आई।
‘लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन’ के शोधकर्ताओं सहित विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि यदि कुपोषण पर ध्यान दिया जाए, तो भारत में टीबी के मामलों में सबसे बड़ी गिरावट देखी जा सकती है। इसके बाद इंडोनेशिया, फिलीपींस और पाकिस्तान का नंबर आता है।
लेखकों ने लिखा, "हमारा अनुमान है कि मध्यम से गंभीर कुपोषण को खत्म करने से वैश्विक स्तर पर टीबी के 14 लाख मामलों को टाला जा सकता है, जो 2023 में वैश्विक वयस्क मामलों का 14.6 प्रतिशत है। वहीं, सभी प्रकार के कुपोषण को खत्म करने से 23 लाख मामले टाले जा सकते हैं, जिससे वैश्विक टीबी प्रसार में 23.7 प्रतिशत की कमी आ सकती है।"
उन्होंने कहा कि ये निष्कर्ष जनसंख्या स्तर पर पोषण संबंधी हस्तक्षेप को बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
टीम के अनुसार, यह अध्ययन टीबी संक्रमण पर किसी व्यक्ति की पोषण स्थिति के प्रभावों का अनुमान लगाने वाला पहला अध्ययन है।
इस अध्ययन में कुपोषण को वयस्क के 'बॉडी मास इंडेक्स' (बीएमआई) के 18.5 से कम होने के रूप में परिभाषित किया गया है। यह इस जीवाणु संक्रमण के लिए एक परिवर्तनीय और सामाजिक रूप से निर्धारित जोखिम कारक है।
अगस्त 2023 में, भारत के 'राशंस' (पोषण संबंधी स्थिति में सुधार के माध्यम से टीबी की रोकथाम ...आरएटीआईओएनएस) परीक्षण के निष्कर्षों ने दिखाया कि टीबी प्रभावित परिवारों को पर्याप्त प्रोटीन और मल्टी-विटामिन वाली मासिक खाद्य सामग्री (फूड बास्केट) प्रदान करना एक किफायती तरीका हो सकता है। इससे परिवार के सदस्यों में संक्रमण की संभावना को लगभग 40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
वर्ष 2024 का एक व्यवस्थित विश्लेषण और 'मेटा-एनालिसिस' (कई अध्ययनों का एक साथ विश्लेषण) किया गया जिसमें टीबी के उच्च और निम्न प्रसार वाले देशों के 43 अध्ययन समूहों के 2.6 करोड़ से अधिक लोग शामिल थे। इस विश्लेषण में यह अनुमान लगाया गया है कि बीएमआई (शरीर के वजन) में बदलाव का टीबी के जोखिम पर सीधा नहीं बल्कि जटिल असर पड़ता है।
अध्ययन के लेखकों ने कहा, "उपलब्ध साक्ष्य दर्शाते हैं कि कुपोषण वैश्विक टीबी महामारी का एक प्रमुख कारण है, जबकि वर्तमान में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुमान इसके महत्व को काफी कम करके आंक रहे हैं।"