प्रोफेसर तनवीर नसरीन

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-05-2026
Professor Tanveer Nasreen is a strong voice of harmony and culture.
Professor Tanveer Nasreen is a strong voice of harmony and culture.

 

शोम्पी चक्रवर्ती पुरकायस्थ

भारत की बहुलतावादी संस्कृति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपने काम, विचार और जीवन शैली से समाज को नई दिशा देते हैं। प्रोफेसर डॉ सैयद तनवीर नसरीन उन्हीं चुनिंदा नामों में शामिल हैं। इतिहासकार, शिक्षाविद, सांस्कृतिक कूटनीतिज्ञ, महिला अधिकारों की मुखर आवाज और सामाजिक सौहार्द की प्रतीक के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है।

उनका जीवन कई धाराओं का संगम है। शिक्षा, संस्कृति, महिला अधिकार और मानवीय सहअस्तित्व। यही कारण है कि आज वे समकालीन भारत की एक प्रभावशाली बौद्धिक हस्ती मानी जाती हैं।
 
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वर्तमान में प्रोफेसर डॉ सैयद तनवीर नसरीन बर्धमान विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर हैं। साथ ही वे महिला अध्ययन विभाग की प्रभारी भी हैं। शिक्षण और शोध के साथ उन्होंने सांस्कृतिक कूटनीति के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है।
 
साल 2019 से 2023 तक वे मालदीव की राजधानी माले स्थित भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की निदेशक रहीं। यह जिम्मेदारी केवल प्रशासनिक नहीं थी। यह भारत और मालदीव के बीच सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करने का एक संवेदनशील दायित्व था।
 
अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने भारतीय कला, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक परंपराओं को मालदीव के लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने यह साबित किया कि राजनीतिक संवाद से कहीं अधिक गहरा असर संस्कृति का होता है। लोगों के बीच रिश्ते दिल से बनते हैं और संस्कृति वही पुल तैयार करती है।
 
मालदीव में रहते हुए उन्होंने भारत मालदीव संबंधों, क्षेत्रीय राजनीति, चीन के बढ़ते प्रभाव और भारत विरोधी नैरेटिव पर लगातार लेख और विश्लेषण लिखे। उनके अनुभवों ने उन्हें यह समझ दी कि सांस्कृतिक संवाद किसी भी कूटनीति की सबसे मजबूत नींव हो सकता है।
 
शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका सफर बेहद समृद्ध रहा है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से “भारत में मुस्लिम महिलाओं की पहचान” विषय पर पीएचडी की। यही विषय आगे चलकर उनके शोध और चिंतन का प्रमुख आधार बना।
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महिला अधिकार, अल्पसंख्यक पहचान और समाज तथा राज्य के साथ महिलाओं के संबंध उनके अध्ययन के केंद्र में रहे हैं। उन्होंने तीन पुस्तकें लिखी हैं। पांच पुस्तकों का संपादन किया है। इसके अलावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में उनके अनेक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।
 
उनकी विद्वता का एक खास पहलू संस्कृत भाषा पर उनकी गहरी पकड़ है। संस्कृत के ज्ञान का उपयोग करते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रंथों में महिलाओं की स्थिति का गंभीर अध्ययन किया। उनके शोध ने भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका और स्थिति को लेकर नए विमर्श को जन्म दिया।
 
इतना ही नहीं, उन्होंने श्रीपाट श्रीखंड क्षेत्र में संरक्षित संस्कृत बंगाली पांडुलिपियों का वर्णनात्मक कैटलॉग भी तैयार किया। इतिहास और साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए यह कार्य आज एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
 
प्रोफेसर नसरीन केवल अकादमिक दुनिया तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने सामाजिक आंदोलनों और नीति संबंधी बहसों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। खासकर भारतीय मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक और मानवीय अधिकारों के सवाल पर वे हमेशा मुखर रहीं।
 
तीन तलाक के खिलाफ चले आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने इस मुद्दे को केवल धार्मिक बहस के रूप में नहीं देखा। उनके लिए यह महिलाओं की गरिमा और न्याय का सवाल था।
 
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके शोध और सामाजिक सरोकार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। वे केवल किताबों तक सीमित विद्वान नहीं हैं। वे समाज की वास्तविक समस्याओं को समझती हैं और उन पर स्पष्ट राय रखती हैं।
 
उनके व्यक्तित्व का एक
और महत्वपूर्ण पक्ष कला और संस्कृति से जुड़ा है। प्रोफेसर तनवीर नसरीन प्रशिक्षित शास्त्रीय नृत्यांगना हैं। उन्हें रंगमंच से भी गहरा लगाव है। कला के प्रति यह झुकाव उनके व्यक्तित्व को और व्यापक बनाता है।
 
उनकी सांस्कृतिक समझ केवल सैद्धांतिक नहीं है। वह उनके जीवन में भी दिखाई देती है। धार्मिक सौहार्द और सहअस्तित्व को लेकर उनका निजी जीवन भी एक मिसाल माना जाता है।
 
उनके पति सुमन भट्टाचार्य देश के जाने माने पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार हैं। अलग धार्मिक पहचान होने के बावजूद उनका पारिवारिक जीवन आपसी सम्मान, साझी संस्कृति और मानवीय मूल्यों का सुंदर उदाहरण पेश करता है।
 
दुर्गापूजा के दौरान प्रोफेसर नसरीन पूरे उत्साह के साथ उत्सव में शामिल होती हैं। सप्तमी से दशमी तक वे बंगाल के सबसे बड़े पर्व का हिस्सा बनती हैं। घर में आयोजित जगद्धात्री पूजा की तैयारियों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहती है।
 
 
विजयादशमी पर रिश्तेदारों और मित्रों को शुभकामनाएं देना हो या भाई के माथे पर फोटा लगाना, वे हर परंपरा को आत्मीयता के साथ निभाती हैं। यह उनके परिवार से मिले संस्कारों और मानवीय शिक्षा का हिस्सा है।
उनके लिए धर्म कभी विभाजन की दीवार नहीं रहा। वे मानती हैं कि इंसानियत और साझा संस्कृति किसी भी पहचान से बड़ी होती है। यही सोच उन्हें समाज में अलग स्थान दिलाती है।
 
आज जब समाज में पहचान की राजनीति और धार्मिक ध्रुवीकरण की चर्चा बढ़ रही है, ऐसे समय में प्रोफेसर डॉ सैयद तनवीर नसरीन का जीवन एक सकारात्मक संदेश देता है। उनका व्यक्तित्व बताता है कि शिक्षा, संस्कृति और संवाद के जरिए समाज को अधिक मानवीय बनाया जा सकता है।
 
उन्होंने अपने काम से यह साबित किया है कि एक व्यक्ति एक साथ कई भूमिकाएं निभा सकता है। वह विद्वान भी हो सकता है। सामाजिक कार्यकर्ता भी। सांस्कृतिक दूत भी। और सबसे बढ़कर एक संवेदनशील इंसान भी।
 
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प्रोफेसर तनवीर नसरीन की यात्रा केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां विविधता में एकता केवल नारा नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा है।
ज्ञान, संस्कृति, अधिकार और सौहार्द को साथ लेकर चलने वाली यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।