हाथ नहीं चले, हौसला चला… फैजानुल्लाह की प्रेरक कहानी

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 12-05-2026
Topping High School Against All Odds: The Story of Faizanullah
Topping High School Against All Odds: The Story of Faizanullah

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

झारखंड के गोड्डा जिले के 16 वर्षीय दिव्यांग छात्र मोहम्मद फैजानुल्लाह ने झारखंड हाई स्कूल परीक्षा में 93.80% अंक प्राप्त कर साबित कर दिया है कि कठिन परिस्थितियाँ कभी किसी की सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकतीं। सेरेब्रल पाल्सी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे फैजानुल्लाह ने अपने हाथों का इस्तेमाल न कर पाने के बावजूद मुंह के सहारे लिखकर यह उपलब्धि हासिल की। फैजानुल्लाह की यह सफलता न केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि है, बल्कि धैर्य, समर्पण और परिवार के समर्थन का प्रतीक भी है। फैजानुल्लाह ने कहा, “मैं अपनी दिव्यांगता को कभी अपनी राह में रुकावट नहीं बनने दूँगा।”

फैजानुल्लाह का जन्म सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) के साथ हुआ, जिससे उनके शरीर के अधिकांश अंग निष्क्रिय हैं। शुरुआत में उनके माता-पिता को इस बीमारी के बारे में पता ही नहीं था और उन्हें यह समझने में समय लगा कि बच्चा सामान्य बच्चों की तरह नहीं बढ़ रहा है। डॉक्टरों की सलाह और इलाज के बाद स्पष्ट हुआ कि फैजानुल्लाह शारीरिक रूप से कमजोर है और अधिकांश कार्य स्वयं नहीं कर सकता। उनके पिता मोहम्मद अनवर आलम, जो एक निजी मदरसा में शिक्षक हैं, और मां नजिमा ने हर कदम पर बेटे का समर्थन किया। घर में भोजन, दिनचर्या और शिक्षा की पूरी देखभाल माता-पिता ने सुनिश्चित की। फैजानुल्लाह के पिता कहते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे अपने बेटे की बीमारी के बावजूद उसे आगे बढ़ाने का मार्ग तलाशें और उसका इलाज सुनिश्चित करें।

शारीरिक सीमाओं के बावजूद फैजानुल्लाह की शिक्षा की शुरुआत घर पर ही हुई। प्रारंभिक पढ़ाई के लिए उनके माता-पिता ने उन्हें मौखिक रूप से पढ़ाया। जब फैजान का दाखिला छठी कक्षा में हुआ, तो झारखंड शिक्षा परियोजना के अंतर्गत प्रखंड संसाधन केंद्र गोड्डा के शिक्षक जितेंद्र कुमार भगत ने घर पर ही उन्हें विशेष रूप से पढ़ाना शुरू किया। लिखने की प्रक्रिया सबसे बड़ी चुनौती थी, क्योंकि फैजानुल्लाह हाथ का उपयोग नहीं कर सकते थे। इसके लिए सबसे पहले कलम पर धागा बांधकर पकड़ने की कोशिश की गई, लेकिन यह सफल नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने मुंह के सहारे लिखना शुरू किया। शिक्षक और परिवार के समर्थन से उनकी लेखनी समय के साथ इतनी धाराप्रवाह हो गई कि सामान्य बच्चों की कॉपी और फैजान की कॉपी में अंतर पहचानना मुश्किल हो गया।

फैजानुल्लाह ने परीक्षा में अपने कठिन परिश्रम का नतीजा दिखाया। गणित में 98 अंक, विज्ञान में 98, उर्दू में 96, सामाजिक विज्ञान में 92, हिंदी में 90 और अंग्रेजी में 84 अंक प्राप्त किए। सभी विषयों में उन्होंने ‘A’ ग्रेड हासिल किया। फैजानुल्लाह ने घर पर ही पूरी पढ़ाई की और सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षक के नियमित मार्गदर्शन से हर विषय में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

तकनीकी कौशल में भी फैजानुल्लाह ने अपनी दक्षता साबित की है। अपने दो अंगुलियों से लैपटॉप का उपयोग कर वह टाइपिंग, MS Excel, PowerPoint और MS Paint जैसे सॉफ़्टवेयर में काम कर सकते हैं। उन्होंने AI और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग सीखकर खुद को और अधिक सक्षम बनाया है। फैजानुल्लाह कहते हैं, “जो हम कर सकते हैं, वही करेंगे। शरीर की सीमाएँ हमारी क्षमता को रोक नहीं सकतीं। हर कठिनाई को पार कर सफलता संभव है।”

फैजानुल्लाह की सफलता में उनके परिवार का योगदान अहम रहा। पिता मोहम्मद अनवर आलम ने बताया कि उन्होंने हमेशा बेटे पर भरोसा रखा और उसकी सफलता ने उनका दिल खुशी से भर दिया। मां नजिमा ने कहा कि बेटे की देखभाल में उन्हें कई बार चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। शिक्षक जितेंद्र कुमार भगत ने बताया कि फैजानुल्लाह का एकाग्रचित्त स्वभाव और सकारात्मक दृष्टिकोण चुनौतियों को अवसर में बदलने में मददगार रहा।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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फैजानुल्लाह को फरवरी 2025 में जिला शिक्षा विभाग ने importance of education पर भाषण देने के लिए लैपटॉप प्रदान किया। यह उनके लिए और उनके परिवार के लिए गर्व का पल था। फैजानुल्लाह की उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन में प्रेरणादायक है, बल्कि सभी छात्रों, विशेषकर दिव्यांग बच्चों के लिए प्रेरणा और आशा की किरण भी है।

मोहम्मद फैजानुल्लाह की कहानी यह संदेश देती है कि संघर्ष, परिवार और शिक्षक का सहयोग, सकारात्मक दृष्टिकोण और मेहनत किसी भी कठिनाई को पार कर सकती है। उन्होंने साबित किया है कि सीमाएं केवल मानसिक होती हैं, और अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। गोड्डा जिले का यह 16 वर्षीय छात्र सभी के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया है, जिसने साबित कर दिया कि हार मानने का कोई विकल्प नहीं होता।