कोई भी फिल्म औरत के दर्द के अहसास के बगैर मुमकिन नहीं , बोले फिल्म निर्देशक मुजफ्फर अली

Story by  मोहम्मद अकरम | Published by  [email protected] • 2 Months ago
No film is possible without feeling the pain of a woman, said film director Muzaffar Ali.
No film is possible without feeling the pain of a woman, said film director Muzaffar Ali.

 

मोहम्मद अकरम / नई दिल्ली

ग़जल नंगी आंखों से नहीं दिल से मिलती है, जिसमें शायर अपनी महबुबा के लिए इश्क से भरे अल्फाज़ के जरिये शेर को खूबसूरत और दिलों को छू लेने वाला बनाता है. और यहीं एक कामयाब शायर की पहचान है. इसी तरह फिल्म में कोई भी फिल्म औरत के दर्द के अहसास के बगैर मुमकिन नहीं है.

गजल तखलीक की दुनिया है. फिल्म की दुनिया में जितनी तखलीक होती है वह फिल्म उतना ही कामयाब और लोगों के दिलों को छूता है. ये बातें मशहूर फिल्म निर्देशक और कवि मुजफ्फर अली जश्न ए रेख़्ता के 8वें संस्करण में अपनी पत्नी मीरा अली के साथ विषय ज़िन्दगी और शायरी लाइफ इन पोएट्री पर बोलते हुए कही.
 
इन निगाहों का जलवा दिखा, अब तो चेहरे से पर्दा हटा
मेरे रहबर मेरे रहनुमा दिल परेशान है तेरे लिए
तू है मुझ से यूं बे ख़बर, डाल दे मुझ पे नज़र
मेरी चाहत है तेरे लिए, दिल में अरमां है तेरे लिए

मुजफ्फर अली ने अपनी जिंदगी के शुरुआती वक्त को याद करते हुए कहा कि मेरी पैदाइश नवाबों के शहर लखनऊ में हुई, लेकिन कश्मीर ने की जन्नत निशां वादियां, वहां की तहज़ीब और खास तौर पर सूफिइज्म ने मुझे वहां पहुंचने पर मजबूर कर दिया.  
 
उमराव जान की कहानी

शहरयार और उमराव जान हवाले से कहते है कि 'इन आंखों की मस्ती के लिए जिसकी जुस्तजू तीं. जयदेव, जिन्हें शुरू में ड्राफ्ट किया गया था, बदल दिया गया. मेरी निकटता के कारण, मैं शहरयार के साथ कुछ छूट ले सकता था, लेकिन जयदेव साहब के साथ,  उमराव जान के लिए चीजें काम नहीं कर पाईं.
 
उनकी रचनाएँ अच्छी थीं लेकिन उनमें कुछ ऊर्जा की कमी थी. इसके अलावा, मधुरानी ने जिस तरह से उन्हें गाया, उससे भी मैं पूरी तरह खुश नहीं था. तो मैं खय्याम साहब के पास गया. और आशा भोसले आईं, वह गानों के अच्छे से पढ़ने के लिए वह उपन्यास पढ़ना चाहती थीं जिस पर फिल्म आधारित थी. वह निहत्थे और पूरी तरह से प्रतिबद्ध होकर आई थीं.
 
आशा भोसले ने एक उत्कृष्ट कैबरे गीत कलाकार होने की छवि को बदल दिया. उनकी उर्दू भाषा ने कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया.
 
आपने उमराव जान (1981) में रेखा को क्यों चुना?

इस सवाल पर मुजफ्फर अली ने कहा कि उसके अंदर गहराई, चश्म ए नम, इंसानी हमदर्दी और अहसास का ग्राफ था इसलिए उन्हें शामिल किया गया. अंजुमन (1986) फिल्म में भी हमने लोगों के दर्द को दिखाने की कोशिश है जिसमें गांव का लड़का कैसे संघर्ष करता है. महिलाएं कितनी परेशानियों के बावजूद हर तरह की दुख को सहने करती हैं. ऐसी फिल्में लोगों को आकर्षित करती हैं.