मिर्जा गालिब में दोबारा काम करने का मौका मिले तो अपनी कई कमियां सुधारूंगा: नसीरूद्दीन शाह

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] • 1 Months ago
मिर्जा गालिब में दोबारा काम करने का मौका मिले तो अपनी कई कमियां सुधारूंगा: नसीरूद्दीन शाह
मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली

नसीरूद्दीन शाह ने कहा है कि मिर्जा गालिब फिल्म दोबारा बनी तो उसमें जरूर काम करना चाहेंगे. मगर इस बार बजट थोड़ा ज्यादा होना चाहिए, ताकि उनके अलावा भी अच्छे एक्टर लिए जा सकें. 

नसीर ने कहा कि गालिब में दोबारा काम करने पर पुरानी गलतियां भी सुधारने का मौका मिलेगा.उन्होंने   बताया कि पहले उनकी इस फिल्म में काम करने को लेकर यह कहते हुए आलोचना हुई थी कि मैं बड़ा अक्खड़ हूं. शेर पढ़ाना भी नहीं आता. गालिब का रोल कैसे क्या ? नसीर ने कहा कि अब यह रोल मिले तो और बेहतर कर सकता हूं. 
 
नसीरूद्दीन शाह ने पत्नी एवं अभिनेत्री रत्ना पाठक शाह के साथ जश्न-ए-रेख्ता के ‘दिल धड़कने का सबब’ टॉक शो में भाग देने के दौरान यह बातें बताईं. इस कार्यक्रम का संचालन सैफ महमूद कर रहे थे. 
 
नसीरुद्दीन शाह ने इस दौरान बताया कि मिर्जा गालिब वीएचएफ पर शूट हुई थी. अब इसकी एक भी मूल पिं्रंट नहीं बची है. एक थी जल गई. नसीर ने कहा कि बजट की कमी की वजह से फिल्म 60 एमएम में शूट नहीं हो पाई थी.
 
नसीर ने फिल्म मिर्जा गालिब में काम करने के लिए इसके निर्देशक गुलजार को एक फर्जी चिट्ठी लिखने की भी बात बताई, जिसमें  अधिकांश बातें झूठ लिखी गई थी.
 
उसमें नसीर ने लिखा था कि उन्हांेने गालिब को बहुत पढ़ा है. दिल्ली के जिस गली कासिम जान में गालिब रहते थे, वहां मैं रहता हूं. उर्दू बेहद अच्छी बोल लेता हूं.
 
नसीर ने कहा कि गली कासिम जान में उनकी बुआ रहती थीं. उनसे मिलने के लिए एकाध बार वहां गया हूं, बाकी चिट्ठी में लिखी सारी बातें झूठी थीं. हालांकि बाद में गुलजार ने नसीर को बताया कि 17 साल पहले पोस्ट से भेजी गई उनकी वह फर्जी चिट्ठी अब तक नहीं मिली है.
 
बॉलीवुड एवं थेयटर की दुनिया का बड़ा नाम नसीरूद्दीन शाह ने कहा कि जो भी जुबान बोलिए, अच्छी और सही बोलिए. जबकि रत्ना पाठक शाह ने कहा कि मैं अनुवादित सामग्री के खिलाफ नहीं हूं.
 
इससे दूसरी भाषा की अच्छी चीजें देखने, सुनने और पढ़ने को मिल जाती हैं, पर अनुवाद मूल भाषा जैसा ही होना चाहिए. इसपर नसीरुद्दीन शाह ने भी सहमति जताई.
 
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एक सवाल के जवाब में नसीर ने कहा कि चूंकि बचपन में उन्होंने बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की है. पिता जयपुर में रहते थे. मां मेरठ में. पिता अंग्रेजी बोलते थे, इसलिए लड़कपन में उर्दू से ज्यादा रिश्ता नहीं रहा.
 
मगर फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ के निर्माण के दौरान उन्होंने उर्दू को नए सिरे से समझने की कोशिश की. मीर और गालिब का खूब अध्ययन किया.एक सवाल के जवाब में रत्ना पाठक शाह ने कहा कि बचपन में उन्हंे उर्दू से कोई वास्ता नहीं था.
 
चूंकि उनकी मां थियेटर आर्टिस्ट थीं. इप्टा से जुड़ी थीं, इसलिए बचन में उनकी मां के एक्टर साथी घर आया करते थे. उस दौरान उन्हें उर्दू बोलते जरूर सुना था. वह मराठी हैं, इसलिए बचपन में उनका उर्दू सीखने, पढ़ने, बोलने से कोई रिश्ता नहीं रहा.
 
नसीर और रत्ना इस बात पर सहमत दिखे कि देश के अधिकांश लोगों का उर्दू से रिश्ता फिल्मों के कारण है. नसीर ने कहा कि गालिब करने के बाद इस्मत चुगताई को खूब पढ़ा.
 
जबकि रत्ना ने कहा कि नसीर सख्त टीचर हैं. उन्होंने उन्हें सख्ती से उर्दू सिखाई.नसीरूद्दीन शाह ने कहा कि जुबान जो भी बोलीं जाए अच्छी और सही बोली जाए.
 
फिल्मों में तलफ्फुज का कितना अहम रोल है ? इस सवाल पर नसीर और रत्ना ने कहा कि एक एक्टर का जुबान से अलग तरह का रितश होता है. अच्छी जुबान सीखना एक एक्टर के लिए जरूरी है.
 
रत्ना ने यंग एक्टर्स को एक तरह से फटकार लगाते हुए कहा कि वे बनावटी अंदाज में बोलते हैं. साफ और स्मूथ नहीं बोलते. कई बार डायलॉग बोलते समय शब्द खा जाते हैं. बोलते समय बेवजह बेस देते हैं.
 
नसीरूद्दीन शाह ने बताया कि मुंबई में रहने वाले खालिस नहीं बोलते. उनके बच्चे कहीं आइंगा, जाइंगा न बोलने लगें, इसके लिए उन्हें उर्दू सिखाई. उन्होंने बताया कि मराठी में सैकड़ों फारसी के शब्द हैं, जबकि उर्दू मिश्रण की भाषा है.इसपर रत्ना पाठक शाह ने कहा कि भारत में एकरूपता नहीं चलेगा. हिंदुस्तान मिश्रण का देश है.
 
उन्होंने एक सवाल के जवाब मंे कहा कि फिल्मों से उर्दू गायब हो रही है. पहले सेंसर बोर्ड के सर्टिफीकेट में भाषा की जगह उर्दू लिखा होता था. फिल्मों के टाइटल भी उर्दू में होते थे. अब तो फिल्मों के टाइटल भी अजीब-अजीब से होते हैं. फिल्मों में अच्छे नामों की कमी है.
 
बातचीत के दौरान नसीर ने गालिब के कई शेर भी पढ़े. कार्यक्रम के अंत में गालिब की वह नज्म भी पढ़ी जो उन्होंने   पेंशन बढ़ाने के लिए तत्तकानील मोगल बादशाह को लिखी थी.
 
कार्यक्रम के अंत मंे नसीर के एक्टिंग टीचर और निर्देशन क्वालिटी को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में रत्ना पाठक शाह ने कहा कि नसीर के साथ काम करने में झगड़े बहुत होते हैं. नसीर अच्छे टीचर हैं और खुले दिमाग निर्देशक. उन्होंने युवा पीढ़ी के लिए पढ़ने की आदत डालने पर जोर दिया.
 
नसीर ने कहा कि उनकी शक्ल गालिब से नहीं मिलती. उन्होंने उनकी मूल तस्वीर देखी है. इसके बावजूद लोग मुझे मिर्जा गालिब समझते हैं और मुझसे गालिब का शेयर पढ़ने के लिए कहते हैं.