मुंबई
ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान का मानना है कि संगीत में समाज को दिशा देने की शक्ति होती है और आज के दौर में लोग अच्छी कविता और सार्थक संगीत के लिए तरस रहे हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया अब पहले जैसी सीमित और सांस्कृतिक रूप से बंधी हुई नहीं रही, बल्कि अब वह ज़्यादा खुली और जुड़ी हुई हो गई है।
‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक साक्षात्कार में रहमान ने कहा, "अब हम तुर्की के वाद्ययंत्रों पर भारतीय राग बजा सकते हैं और लोग उस नएपन का आनंद ले सकते हैं। आज लोग विभिन्न संस्कृतियों की ध्वनियों को अपनाने लगे हैं।" उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया के ज़रिए तुर्किये के एक संगीतकार, पुणे के एक ढोल वादक और लखनऊ के एक शास्त्रीय गायक से संपर्क किया।
रहमान ने कहा, "मैं हर तरह का संगीत सुनता हूं — चाहे वह रेडियो हो, आईट्यून्स, स्पॉटिफाई या सोशल मीडिया। जब कोई कलाकार मुझे अच्छा लगता है तो मैं उसे मैसेज करता हूं और अक्सर जवाब भी मिल जाता है। यह देखकर अच्छा लगता है कि अब दुनिया छोटी होती जा रही है।"
अपने गानों के रीमेक बनने को लेकर रहमान ने कहा कि उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है। उन्होंने कहा, "मैं खुद सबसे पहले एक श्रोता हूं। मैं हमेशा यह देखता हूं कि क्या मुझे रोमांचित करता है और क्या श्रोताओं को पसंद आएगा। जब तक लोग मेरे गानों को अनदेखा नहीं करते, मुझे कोई आपत्ति नहीं।"
संगीत जगत में तीन दशकों से सक्रिय रहमान का मानना है कि जब समाज में नकारात्मकता बढ़ती है, तो संगीत को उस अराजकता का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, बल्कि उसका इलाज बनना चाहिए। उन्होंने कहा, "जब बुरा संगीत आता है तो समाज पर भी उसका असर होता है। अच्छे बोल और धुनें समाज को प्रेरित करती हैं। आज लोग अच्छी कविता और संगीतमय शांति की वापसी की आशा कर रहे हैं।"
रहमान इन दिनों अपनी आगामी हिंदी फिल्म "उफ़्फ़ ये सियापा" के संगीत को लेकर उत्साहित हैं, जिसमें उन्होंने संगीत निर्देशन किया है।