शिक्षा के बढ़ते व्यापारीकरण पर चिंता, सार्वजनिक शिक्षा मजबूत करने की मांग

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 19-06-2026
Concern over the growing commercialization of education; demand to strengthen public education.
Concern over the growing commercialization of education; demand to strengthen public education.

 

नई दिल्ली,

जमाअत-ए-इस्लामी हिन्द के मर्कज़ी तालीमी बोर्ड के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने कहा है कि सरकारी शिक्षा से राज्य का धीरे-धीरे पीछे हटना, शिक्षा का बढ़ता व्यापारीकरण और शैक्षिक व्यवस्था में केंद्रीकरण का रुझान देश के भविष्य के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर रहा है। उन्होंने मांग की कि शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 6 प्रतिशत किया जाए।

प्रोफेसर सलीम ने यह बात नीति आयोग की हाल ही में जारी 200 पृष्ठों की रिपोर्ट “भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली: गुणवत्ता में सुधार के लिए सामयिक विश्लेषण और नीतिगत रोडमैप” पर आयोजित राष्ट्रीय ऑनलाइन सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए कही। सेमिनार में देशभर के शिक्षाविदों, संस्थानों के प्रमुखों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

उन्होंने कहा कि वर्तमान नीतियों से यह संकेत मिलता है कि राज्य अपनी शैक्षिक जिम्मेदारियों से पीछे हट रहा है और शिक्षा को तेजी से निजी एवं कॉर्पोरेट क्षेत्र के हवाले किया जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा एक बुनियादी सार्वजनिक अधिकार है और इसे मुनाफे का माध्यम नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

प्रोफेसर सलीम ने उच्च शिक्षा, शोध और डॉक्टरेट स्तर की पढ़ाई के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने, शिक्षण संस्थानों में कॉर्पोरेट हस्तक्षेप सीमित करने तथा पाठ्यक्रम में संवैधानिक मूल्यों—न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व—को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने सांप्रदायिक सोच को हतोत्साहित करने पर भी बल दिया।

मर्कज़ी तालीमी बोर्ड के सचिव सैयद तनवीर अहमद ने कहा कि नीति आयोग की रिपोर्ट समस्याओं की पहचान तो करती है, लेकिन उनके समाधान के लिए कोई स्पष्ट और व्यावहारिक रोडमैप प्रस्तुत नहीं करती। उन्होंने चिंता जताई कि शिक्षक हर साल औसतन 28 दिन गैर-शैक्षणिक सरकारी कार्यों में व्यतीत करते हैं, जिससे कक्षाओं में पढ़ाई प्रभावित होती है।

सेमिनार में मर्कज़ी तालीमी बोर्ड के समन्वयक और शोधकर्ता जफर-उल-हक़ ने नीति आयोग के आंकड़ों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि देश में 14.71 लाख स्कूल, 24.69 करोड़ विद्यार्थी और एक करोड़ शिक्षक होने के बावजूद बुनियादी साक्षरता और गणितीय दक्षता का स्तर चिंताजनक बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि तीसरी कक्षा के 27 प्रतिशत, पांचवीं कक्षा के लगभग 50 प्रतिशत और सातवीं कक्षा के 71 प्रतिशत विद्यार्थी दूसरी कक्षा के स्तर का सरल पाठ भी नहीं पढ़ पाते। वहीं, कक्षा 3 के 35 प्रतिशत, कक्षा 5 के 30 प्रतिशत और कक्षा 8 के 45 प्रतिशत छात्र भाग (डिवीजन) के सामान्य सवाल हल करने में असमर्थ हैं।

जफर-उल-हक़ ने बुनियादी सुविधाओं की कमी पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार 1.19 लाख स्कूलों में बिजली नहीं है, 14 हजार स्कूलों में पेयजल सुविधा उपलब्ध नहीं है, लगभग 98 हजार स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं हैं, एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और करीब 8 हजार स्कूलों में कोई भी छात्र नामांकित नहीं है।

सेमिनार के समापन पर प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने घोषणा की कि मर्कज़ी तालीमी बोर्ड विभिन्न सामाजिक और शैक्षिक संगठनों के सहयोग से शिक्षा सुधार के लिए एक व्यापक नीति मसौदा तैयार करेगा। यह मसौदा केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राज्यों के शिक्षा विभागों को सौंपा जाएगा, ताकि शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक सुधार सुनिश्चित किए जा सकें।