मुहर्रम खासः हिंदू हूं, क़ातिले शब्बीर नहीं .....

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 08-07-2024
Muharram Khas: I am a Hindu, not the killer of Shabbir.....
Muharram Khas: I am a Hindu, not the killer of Shabbir.....

 

ruhiडा. रख़्शंदा रूही मेहदी

उर्दू साहित्य की एक अनुपम विधा मर्सिया निगारी है. मर्सिया अरबी शब्द ‘रिसा‘ से बना है जिसका अर्थ है - मृतकों की याद में रोना या दुख प्रकट करना. मगर परंतु विशेषः मर्सिया का तात्पर्य इमाम हुसैन और उनके अनुयायी व साथियों द्वारा यज़ीद की सेना के खि़लाफ़ इराक़ के मैदान-ए- कर्बला में लड़ी गई जंग का वर्णन और जंग में शहीदों की स्मृति में लिखे शोक गीतों से होता है. मूल रूप से अरबी से फ़ारसी काव्य में और फ़ारसी काव्य से उर्दू काव्य में इस विद्या का अवतरण हुआ. 

कर्बला की जंग 10 मुहर्रम, 61 हिजरी (10 अक्टूबर, 680 ईसा पूर्व) को हुई थी, और इसमें हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) और उनके साथी और अनुयायी शहीद हुए थे. कर्बला की जंग में उनके साथियों और अनुयायियों को लेकर आम धारणा है कि उनकी संख्या कुछ सवा सौ से हज़ार तक थी.

इस घटना में हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) के साथियों और अनुयायियों ने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के धर्मिक और सामाजिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए जान की बाजी लगाई थी. उनकी बलिदानी आत्मा इस्लामी इतिहास में महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद की जाती है, और इसे मुहर्रम और आशूरा के दिनों पर याद किया जाता है.

भारत की सरज़मीन सूफ़ी-संतों की प्रेम-भक्ति से रसमग्न है. कर्बला के इस दिलदोज़ वाक़्य को ग़ैर मुस्लिम लेखकों और विशेषः कवियों ने श्रद्धापूर्वक अपने काव्य में व्यक्त किया है जो आपसी दुख-दर्द की सांझी विरासत का प्रमाण है.इंतज़ार हुसैन की पुस्तक ‘मर्सिया में हिंदू योगदान‘ में अनेक ग़ैर मुस्लिम मर्सियागो कवियों का उल्लेख मिलता है.कुछ प्रसिद्ध कवियों द्वारा रचे मर्सिये यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं. इसमें क्रम में रूप कुमारी का चर्चित हाजिर है-

  • दुआएं मांगी हैं हमने बरसों झुका के सर हाथ उठा उठा कर
  • मिला है तब मुस्तफ़ा सा बंदा ख़ुदा ख़ुदा कर ख़ुदा ख़ुदा कर
  • पियूंगी मैं गंगा जल न साक़ी
  • गुनाह समझूं जो दे ब्रहमण
  • सवाब ले ले मैं तेरे सदक़े
  • ष्षराब ताहिर पिला पिला कर
  • बरंगे गुल दाग़ हुब हैदर
  • हमारे सीनों में है नुमायां
  • ये फूल रखा है हमने दिल में
  • बुतों से नज़रें बचा बचा कर
  • बे दीन हूं, बे पीर नहीं हूं
  • हिंदू हूं, क़ातिले शब्बीर नहीं हूं
  • हुसैन अगर भारत में उतारा जाता
  • यूं चांद मोहम्मद का, न धोखे में मारा जाता
  • न बाज़ू क़लमबंद होते,न पानी बंद होता
  • गंगा के किनारे ग़ाज़ी का अलम होता

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रूप कुमारी का लिखा ये सलाम उस समय के कई रिसालों में छपा और बहुत मशहूर हुआ. रूप कुमारी को उर्दू साहित्य की इकलौती ग़ैर मुस्लिम मर्सियागो शायर होने का गौरव प्राप्त है.उन्होंने पहला सलाम 1931 में और अंतिम मर्सिया 1937 में कहा. सात वर्ष वो अपनी अछूती मर्सिया कविता से आशिकाने हुसैन के दिलों पर अक़ीदत के रत्नों से सराबोर करती रहीं. 

सुप्रसिद्ध मर्सिया ‘ घबराएगी ज़ैनब‘ लाला छंगूलाल दिलगीर लखनवी की रचना है. ये मीर अनीस के मर्सिये से पहले 417 मर्सिए रच चुके थे. पहले ये रोमानी शायरी किया करते थे, मगर मर्सिया लिखने के बाद उन्होंने अपनी समस्त रोमानी शायरी मोती झील में बहा दी और केवल मर्सिया लिखते रहे.

कहा ज़ैनब ने के बिन भाई के हो आई मैं

आपके लाडले शब्बीर को खो आई मैं

त्रिलोक नाथ आज़म जलालाबादी लिखते हैं-

  • ऐ कर्बला है तेरी ज़मीन रशक कीमिया
  • तंबे को ख़ाक से हम ज़र बनाएंगे
  • आज़म तू अपने शौक़ को बे फ़ायदा न जान
  • फ़िरदौस में यह शेर तेरा घर बनाएंगे

गुर सरन लाल अदीब लखनवी का एक चर्चिम मर्सिया है-

  • लौहे जहां पे नक़्श है अज़मत हुसैन की
  • हक़ को शरफ़ मिला है बदौलत हुसैन की
  • हुई है ताज़ा दिल में रसूले ख़ुदा की याद
  • कहते थे लोग देख के सूरत हुसैन की
  • था एतक़ाद मेरे बुज़ुर्गों को भी अदीब
  • मीरास में मिली है मोहब्बत हुसैन की

रघुबीर सरन दिवाकर उर्फ़ राही अमरोहवी का मर्सिया है-

  • मैं हक़ परस्त मुबस्सिर हूं इसलिए शब्बीर
  • तुम्हे ही फ़ातेह आलम क़रार देता हूं
  • काष फिर पैग़ामे हक़ ले कर यहां आएं हुसैन
  • ज़िंदगी को इक नया पैग़ाम दे जाएं हुसैन

संत दर्शन जी महाराज दर्शन अपनी नज़्म ‘ फ़ातेह कर्बला‘ में कहते हैं-

  • हुसैन हौसला ए इंक़लाब देता है
  • हुसैननामा नहीं आफ़ताब देता है
  • हुसैन लश्करे बातिल का ग़म नहीं करता
  • हुसैन अज़्म है माथे को ख़म नहीं करता
  • हुसैन सुब्हे जहांताब की अलामत है
  • हुसैन ही को भुला दें यह क्या क़्यामत है


सरोजनी नायडू की नज़्म ‘षबे ष्षहादते उज़मा‘ का उर्दू अनुवाद मौलाना सफ़ी लख्नवी ने किया है-

  • बरहना पा, सियाहपोश, चश्म सफेद, अश्कबार
  • तेरी मुसीबतों पे आह,रोती है ख़ल्क़ ज़ार ज़ार
  • हाय हुसैन बे वतन,वाय हुसैन बे कफ़न
  • प्यारे वली हक़ नुमा,तेरे मुहिब बा सफ़ा
  • जिसकी नहीं कोई मिसाल, गाड़ गया वो इक निशां 
  • जिस से विरासतन मिली, दौलते दीने बे ज़वाल

दिल्लू राम कौसरी ने लिखा है-

  • कुरां कलामे पाक है शब्बीर नूर है
  • दोनों जहां में दोनों का यकसां ज़हूर है
  • हज़रत शब्बीर दीने मुस्तफ़ा के नाम पर
  • सुबह से ता अस्र बच्चों को फ़िदा करते रहे
  • मारिफ़त कहते हैं उस को भूख और ग़म में हुसैन
  • ज़ेरे ख़ंजर भी नमाज़े हक़ अदा करते रहे
  • कौसरी फिर क़ब्र में क्या होगी ईज़ा जब के हम
  • उम्र भर ज़िक्रेशहीदे कर्बला करते रहे

पंडित दया शंकर नसीम का एक चर्चित मर्सिया है-

  • पांच उंगलियों में ये हर्फ़े ज़़न है
  • यानि ये मुतीअ पंजतन है

सूरज सिंह सूरज ने लिखा है-

  • ये मोजिज़ा भी प्यास जहां को दिखा गई
  • आंखों में आंसुओं की सबीलें लगा गई
  • कर्बो बला में देखिएशब्बीर की नहीं
  • हर दौर के यज़ीद को जड़ से मिटा गई

हकीम छन्नूमल देहलवी का एक चर्चित मर्सिया है-

  • सलामी क्या कोई बेकार है जी से गुज़र जाना
  • हयाते जाविदां है शाह के मातम में मर जाना
  • नहीं आता जिन्हें राहे हक़ीक़त से गुज़र जाना
  • हुसैन इब्ने अली से सीख लें वो लोग मर जाना

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राय बहादुर बाबू अतारदीन ने कर्बाला की घटना पर लिखा है-

  • वो दिल हो ख़ाक न हो जिसमें अहले बैत का ग़म
  • वो फूटे आंख जो रोई न हो मुहर्रम में

सरकश प्रसाद लिखते हैं-

  • हुसैन इब्ने अली हैं फ़र्द यक्ता
  • कोई मज़लूम ऐसा था न होगा
  • दिया सर आपने राहे ख़ुदा में
  • किया दीने नबी को दीन अपना

मुंशी विश्वनाथ प्रसाद माथुर लखनवी का चर्चित मर्सिया है-

  • आंख में उनकी जगह, दिल में मकां शब्बीर का
  • यह ज़मीं शब्बीर की, यह आस्मां शब्बीर का
  • जब से आने को कहा था, कर्बला से हिंद में
  • हो गया उस रोज़ से, हिंदोस्तां षब्बीर का

नथुनी लाल वहशी ने इमाम हुसैन पर लिखा है-

  • पानी के बंदोबस्त में था लश्कर इमाम
  • सैयद अपनों की गोद में बच्चे थे तश्नाकाम
  • आलम ये था के बंद थी अरज़ो समां की सांस
  • रुक रुक के चल रही थी फ़िज़ा में हवा की सांस

कुंवर महिंदर सिंह बेदी का एक चर्चित मर्सिया है-

  • गुलशने सदक़ो सफ़ा का लाल ए रंगीं हुसैन
  • शमे आलम,मअले दुनिया,चिराग़े दीं हुसैन
  • बदा ए हस्ती का हस्ती से तिरी है कैफ़ो कम
  • उठ नहीं सकता तिरे आगे सरे लोहो क़लम

अदीब सीतापुरी ने लिखा है-

  • चमक से जिनकी मुनव्वर है आज तक इस्लाम
  • चिराग़ ऐसे बहत्तर जला दिए तुमने
  • हुसैन चश्मे इनायत ज़रा अदब पर भी
  • न जाने कितने मुक़द्दर बना दिए तुमने

जय सिंह ने कर्बला के वाक्य पर लिखा है-

  • पनाह मांगेगी मुझसे नरक की आग
  • हिंदू तो हूं मगर हूं मैं शैदा हुसैन का
     

राम प्रकाष साहिर ने लिखा है-

  • है हक़ो सदाक़त मिरा मस्लक साहिर
  • हिंदू भी हूं शब्बीर का शैदाई भी

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मुंशी प्रेमचंद का “कर्बला” उनके महत्वपूर्ण नाटकों में से एक है, जो भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यह नाटक मुस्लिम समुदाय की ऐतिहासिक कर्बला की घटना पर आधारित है, जो हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों के बलिदान की कहानी है.

केंद्रीय पात्र हुसैन हैं, जो अपने आदर्शों और धरोहरों के लिए सच्चाई और न्याय की रक्षा करने का संकल्प लेता और उसको जान की बाज़ी लगा कर पूरा करता है.कालिदास गुप्ता रज़ा का रचा मर्सिया शोरे ग़म‘ इस परंपरा को आगे बढ़ाने में प्रमुख स्थान रखता है.

वर्तमान समय के अखिल भारतीय हुसैनी मंच के संस्थापक रमा शंकर पाण्डेय अपनी पुस्तक ‘हुसैन से इंसानियत‘ में लिखते हैं-इमाम हुसैन के हृदय में मौजूद मानवता की सर्वोच्च रोशनी से संपूर्ण मानव जगत की मानवता के हृदय को प्रकाशमान करना तथा संपूर्ण मानव जाति के उद्धार एवं कल्याण को बढ़ावा देना, आतंकवाद व भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना और आगे चल कर अंतरराष्ट्रीय हुसैनी मंच के रूप में संपूर्ण दुनिया से आतंकवाद और भ्रष्टाचार का विनाश करना अखिल भारतीय हुसैनी मंच के उद्देश्य हैं. कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए ग़ैर मुस्लिम कवियोंव साहित्यकारों का योगदान हमेशा से अनुकरणीय रहा है.

-लेखिका जामिया मिल्लिया इस्लामिया स्कूल से जुड़ी हैं.

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