Oil prices rise amid West Asia tensions, bullion remains under pressure: Analysts
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के मद्देनजर केंद्रीय बैंकों के सख्त मौद्रिक रुख बनाए रखने तथा ब्याज दरों में कटौती टालने के आसार से अल्पावधि में सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। विश्लेषकों ने यह बात कही।
विश्लेषकों के अनुसार, आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से बढ़ने वाली मुद्रास्फीति की आशंकाएं कीमती धातुओं को समर्थन देती हैं लेकिन यदि इसके जवाब में केंद्रीय बैंक सख्त मौद्रिक नीति अपनाते हैं तो सर्राफा कीमतों में निकट अवधि की तेजी सीमित रह सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अब कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव पर सर्राफा बाजार की प्रतिक्रिया केवल मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि इस बात पर अधिक निर्भर करेगी कि केंद्रीय बैंक क्या कदम उठाते हैं।
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (एमओएफएसएल) के जिंस विश्लेषक मानव मोदी ने कहा, ‘‘ ऐतिहासिक रूप से कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि से मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ा है। ऐसा 1970 के दशक के तेल प्रतिबंध और पश्चिम एशिया के कई संकटों के दौरान देखा गया था।’’
उन्होंने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से पैदा हुए मुद्रास्फीति के दबाव के कारण सोने और चांदी में मजबूत तेजी देखने को मिलती है।
अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के हालिया घटनाक्रम के दौरान सोने और चांदी ने बाजार की इस पारंपरिक धारणा के विपरीत प्रदर्शन किया है। इस संघर्ष से होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये होने वाली वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा प्रभावित होने का खतरा पैदा हुआ है।
पिछले सप्ताह से पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद जिंस बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया है।
पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने से पहले फरवरी के अंत में ब्रेंट क्रूड करीब 68 डॉलर प्रति बैरल पर था। अप्रैल के मध्य में तनाव चरम पर पहुंचने के दौरान यह बढ़कर 126.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
इसके बाद अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव कम होने पर तेल की कीमतें घटकर लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं लेकिन बाद में फिर बढ़कर करीब 90 डॉलर प्रति बैरल हो गईं।