New AI shopping agents promise better deals, but who pays the price if something goes wrong?
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
मेटा का हाल ही में पेश किया गया एआई एजेंट ‘म्यूज’ कई तरह के काम करने में सक्षम होने का भरोसा देता है। यह ईमेल भेजने, छुट्टियां मनाने के लिए जरूरी बुकिंग कर सकता है, मुश्किल ऑनलाइन फॉर्म भर सकता है।
लेकिन एक निजी खरीदारी सहायक के रूप में इसकी संभावनाओं को लेकर खासा ध्यान आकर्षित हो रहा है। यह सस्ते सौदों की तलाश करने और उपयोगकर्ता की मंजूरी के बिना खरीदारी करने में सक्षम है।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति दौड़ने के लिए नए जूते खरीदना चाहता है। कुछ ही मिनट में एआई सहायक दर्जनों दुकानों की वेबसाइटों पर खोज कर सकता है और अलग-अलग ब्रांड की तुलना करके सबसे सस्ते और जरूरत के मुताबिक जूते ढूंढ सकता है।
म्यूज अकेला ऐसा एआई एजेंट नहीं है। प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के बीच इन एजेंट को रोजमर्रा की खरीदारी का हिस्सा बनाने की होड़ लगी है। गूगल और ओपनएआई भी एआई आधारित शॉपिंग टूल विकसित कर रहे हैं।
उपभोक्ताओं के लिए इन नए एआई एजेंट का फायदा साफ है। खरीदारी में कम समय लगेगा और बेहतर सौदे मिलने की संभावना होगी। वहीं, खुदरा कारोबारियों के लिए ये ऑनलाइन उत्पादों के प्रचार करने के तरीके को बदल सकते हैं।
लेकिन इसका एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिस पर कम ध्यान दिया जा रहा है। इन उत्पादों को बनाने वाले कामगारों का क्या होगा? क्या उनकी स्थिति और भी खराब हो जाएगी?