नई दिल्ली
भारत के नए दौर के 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' (FTA) मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने, प्राइवेट सेक्टर के निवेश (कैपेक्स) को फिर से शुरू करने और सप्लाई-चेन को जोड़ने में तेज़ी लाने का काम कर सकते हैं। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग व मशीनरी के सामान बनाने वाली कंपनियों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होगा। 'यस सिक्योरिटीज' का कहना है कि इन समझौतों के साथ-साथ PLI स्कीम और "चीन+1" (China+1) वाली डाइवर्सिफिकेशन रणनीति भारत को 2030 तक US$1 ट्रिलियन का सामान एक्सपोर्ट करने का सबसे अच्छा मौका देती है। 'यस सिक्योरिटीज' ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "भारत में हाल ही में हुए FTA, आर्थिक रणनीति में एक बड़े बदलाव को दिखाते हैं - जिसमें सावधानी बरतते हुए संरक्षणवाद (protectionism) से हटकर ग्लोबल ट्रेड में गहराई से जुड़ने की ओर कदम बढ़ाया गया है।"
रिपोर्ट में कहा गया है कि FTA अब सिर्फ़ टैरिफ (आयात शुल्क) तक सीमित नहीं हैं। 'यस सिक्योरिटीज' ने कहा, "ये FTA सिर्फ़ व्यापार समझौते नहीं हैं, बल्कि कई सालों तक चलने वाले इंडस्ट्रियल और एक्सपोर्ट-आधारित ग्रोथ साइकल की नींव हैं।" UAE, ऑस्ट्रेलिया, UK, EFTA, ओमान, न्यूज़ीलैंड और EU के साथ समझौते लागू किए जा रहे हैं, और साथ ही इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, पोर्ट अपग्रेड और सप्लाई-चेन के लोकलाइज़ेशन (स्थानीय स्तर पर उत्पादन) पर भी काम हो रहा है। ब्रोकरेज का कहना है कि इस मेल से भारत उन चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन गया है, जिनके पास बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को शिफ्ट करने की क्षमता, लेबर फ़ोर्स और घरेलू बाज़ार का आकार मौजूद है।
निवेश इसका सबसे बड़ा ज़रिया हो सकता है। 'यस सिक्योरिटीज' ने कहा, "FTA के पक्ष में सबसे मज़बूत तर्क यह है कि इनमें भारत के रुके हुए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट साइकल को फिर से शुरू करने की क्षमता है।" क्षमता का इस्तेमाल (कैपेसिटी यूटिलाइज़ेशन) लगभग 75% होने के कारण, कंपनियों में बड़े कैपेक्स के लिए आत्मविश्वास की कमी है। FTA के ज़रिए एक्सपोर्ट से लगातार मांग मिल सकती है, क्षमता का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है और बड़े पैमाने पर उत्पादन (economies of scale) का फ़ायदा मिल सकता है। इससे अंततः प्राइवेट सेक्टर में मज़बूत निवेश को बढ़ावा मिल सकता है, जैसा कि पूर्वी एशिया में हुआ था, जहाँ एक्सपोर्ट ने मैन्युफैक्चरिंग के विस्तार और पूंजी निर्माण को गति दी थी।
सेवा क्षेत्र (सर्विसेज़) के भी एक समानांतर इंजन के रूप में बने रहने की उम्मीद है। भारत का लक्ष्य 2030 तक कुल US$2 ट्रिलियन का एक्सपोर्ट करना है, जिसमें सामान और सेवाओं का हिस्सा बराबर-बराबर होगा। 'यस सिक्योरिटीज' ने कहा कि UK और EU के साथ समझौते IT सेवाओं, कंसल्टिंग, इंजीनियरिंग R&D और वित्तीय सेवाओं के लिए बाज़ार तक पहुँच को बेहतर बनाते हैं, जिससे कुशल लेबर और टेक्नोलॉजी के मामले में भारत की बढ़त और मज़बूत होती है।
लेकिन ब्रोकरेज ने चेतावनी दी कि सिर्फ़ बाज़ार तक पहुँच काफ़ी नहीं है। उसने कहा, "सबसे मज़बूत विपरीत तर्क यह है कि भारत के लिए मुख्य चुनौती बाज़ार तक पहुँच की नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता (domestic competitiveness) की है।" 2015-2025 के दौरान सामान का एक्सपोर्ट केवल 3.5% CAGR (कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट) की दर से बढ़ा है। उच्च रसद लागत, महंगी बिजली, अनुपालन की जटिलता और कम श्रम उत्पादकता जैसी संरचनात्मक बाधाएं अभी भी बनी हुई हैं। इन बाधाओं को दूर किए बिना, यदि आयात निर्यात से अधिक तेजी से बढ़ता है तो मुक्त व्यापार समझौते व्यापार घाटे को और बढ़ा सकते हैं।