इन 10 महिला उद्यमियों ने बदली सफलता की परिभाषा

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 16-08-2026
These 10 women entrepreneurs redefined success.
These 10 women entrepreneurs redefined success.

 

आवाज द वाॅयस ब्यूरो / नई दिल्ली

सफलता कभी भी एक सीधी राह पर नहीं चलती। कुछ महिलाओं के लिए यह जीवन के किसी अप्रत्याशित मोड़ से शुरू होती है, तो कुछ इसे पारिवारिक विरासत, अपने किसी व्यक्तिगत शौक या दूसरों की मदद करने की इच्छा से सींचती हैं।

इन सभी की जीवन यात्राओं में एक बात समान होती है, वह है पारंपरिक दायरों से बाहर निकलकर ऐसे रास्ते बनाना जहां महत्वाकांक्षा, रचनात्मकता और सामाजिक जिम्मेदारी एक साथ चल सकें।

आवाज़ द वॉइस के विशेष फ़ीचर 'परवाज़' में उन दस महिला उद्यमियों की कहानियों को सामने लाया गया है जिन्होंने न केवल अपनी एक अलग पहचान बनाई है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा और आय का स्रोत बनी हैं।

यह विशेष रिपोर्ट देश के अलग-अलग कोनों से उन दस उल्लेखनीय महिलाओं को एक मंच पर लाती है जिन्होंने बिजनेस, मीडिया, स्वास्थ्य सेवा, पोषण, खानपान और क्रिएटर इकोनॉमी में अपनी एक खास जगह बनाई है। उनकी यह कहानियां साबित करती हैं कि महिला सशक्तिकरण किसी एक पेशे या सफलता के किसी एक पैमाने पर निर्भर नहीं होता। असली ताकत अपनी पसंद खुद चुनने, बाधाओं को पार करने और दूसरों के लिए नए रास्ते तैयार करने में है।

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आफ़रीन ज़ेब: क्रिएटर इकोनॉमी की नई पहचान

आफरीन ज़ेब भारत की उभरती हुई क्रिएटर इकोनॉमी का एक जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक कंटेंट राइटर के तौर पर की थी। इसके बाद उन्होंने कॉपीराइटिंग, डिजिटल मार्केटिंग और क्रिएटिव स्ट्रैटेजी में काम किया और आज वह स्टूडियो बैड्रॉप्स डॉट कॉम की चीफ मार्केटिंग ऑफिसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

उनकी विजुअल स्टोरीटेलिंग की समझ ने कंपनी को महंगे आयातित उपकरणों और भारतीय क्रिएटर्स के लिए किफायती उत्पादों के बीच के अंतर को पाटने में मदद की है। आफरीन मानती हैं कि आने वाले समय में देश के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों से डिजिटल क्रिएटर के रूप में बड़ी प्रतिभाएं सामने आने वाली हैं।

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आयशा अयूब: कविता से लेकर बिजनेस तक का सफर

आयशा अयूब ने कविता, उद्यमिता और सामाजिक सशक्तिकरण के बीच एक अनूठा सेतु बनाया है। अलग-अलग सांस्कृतिक माहौल में पली-बढ़ी और अंत में लखनऊ को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाली आयशा ने महामारी के दौरान अपनी नौकरी छूटने के गम को एक नए अवसर में बदल दिया।

उन्होंने महिलाओं के लिए 'हर - हर्डल एम्पॉवर राइज़' नाम से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की। उनका मानना है कि नेटवर्किंग का मतलब सिर्फ संपर्क बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि इससे लोगों को वास्तविक आर्थिक अवसर मिलने चाहिए। उनकी कविताएं महिलाओं के आत्मविश्वास और स्वतंत्रता के संदेश को और अधिक मजबूती देती हैं।

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शबाना फैसल: कॉर्पोरेट नेतृत्व और सामाजिक बदलाव

शबाना फैसल ने यह साबित कर दिया है कि व्यापारिक नेतृत्व किस तरह से समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है। एक स्टील मिल में काम करने से लेकर केईएफ होल्डिंग्स की सह-संस्थापक और वाइस चेयरपर्सन बनने तक का उनका सफर बेहद प्रेरणादायक है।

उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले व्यापारिक क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई और साथ ही अपने परिवार की जिम्मेदारी भी बखूबी संभाली। फैसल एंड शबाना फाउंडेशन के जरिए उनका काम शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। उनका मानना है कि वास्तविक विकास तभी संभव है जब सरकार, निजी संस्थाएं और समाज मिलकर काम करें।

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एलिना दावुदानी: पोषण विज्ञान और मातृ स्वास्थ्य

एलिना दावुदानी ने पोषण के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल उन माताओं की मदद के लिए किया है जो शुरुआती बाल्यावस्था की देखभाल से जुड़ी उलझनों से जूझती रहती हैं। डायटेटिक्स, मैटरनल एंड चाइल्ड न्यूट्रिशन में मास्टर डिग्री लेने के बाद वह पर्ड्यू यूनिवर्सिटी में पोषण विज्ञान में डॉक्टोरल शोध कर रही हैं।

उन्होंने 'मॉमफंडा' की स्थापना की ताकि माता-पिता को विज्ञान पर आधारित सही जानकारी आसानी से मिल सके। उनके पाठ्यक्रम और डिजिटल संसाधन लोगों के मन से अवांछित डर और गलत जानकारी को दूर करने का काम करते हैं।

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फराह मलिक भंजी: खुदरा बाजार की मजबूत कमान

फराह मलिक भंजी भारत के जाने-माने फुटवियर ब्रांड मेट्रो ब्रांड्स के नेतृत्व का एक नया चेहरा हैं। कोलाबा की एक छोटी सी दुकान से शुरू हुई इस पारिवारिक विरासत को एक विशाल राष्ट्रीय खुदरा नेटवर्क में बदलने में उनका बड़ा योगदान रहा है।

गणित से ग्रेजुएट फराह ने शुरुआत में परिवार के बिजनेस में आने की कोई खास योजना नहीं बनाई थी, लेकिन बाद में उन्होंने कंपनी में आधुनिक तकनीक और डेटा आधारित प्रबंधन को बढ़ावा दिया। उनका मुख्य जोर हमेशा से कर्मचारियों को सशक्त बनाने और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर रहा है।

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फ़ज़िला अल्लाना: टेलीविजन की दुनिया का बड़ा नाम

फज़िला अल्लाना ने भारतीय टेलीविजन पर नॉन-फिक्शन मनोरंजन की तस्वीर को पूरी तरह से बदल दिया। जिस समय पारिवारिक ड्रामे टीवी पर हावी हुआ करते थे, उस वक्त उन्होंने रियलिटी और अनस्क्रिप्टेड प्रोग्रामिंग की क्षमता को पहचाना। यूटीवी के साथ अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करने के बाद उन्होंने साल 2003 में सोल प्रोडक्शंस की सह-स्थापना की। 'कॉफ़ी विद करण' और 'नच बलिए' जैसे लोकप्रिय शो ने उनकी रचनात्मक सोच और व्यावसायिक अनुशासन की मिसाल पेश की है।

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शेफ़ साजिदा खान: घर की रसोई से पेशेवर सफलता तक

शेफ साजिदा खान यह दिखाती हैं कि घर के भीतर पनपा शौक किस तरह से उद्यमिता का एक बड़ा जरिया बन सकता है। कुकिंग के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें मुंबई के पवई में 'कुलिनरी क्राफ्ट स्टूडियो' की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया।

यहां लोग बेकिंग से लेकर भारतीय और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों को बनाने की कला सीखते हैं। उनके इस संस्थान से प्रशिक्षण लेने वाली कई महिलाओं ने अपने घर से ही खानपान का बिजनेस शुरू किया है और आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ी हैं।

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समीना हामिद: फार्मास्युटिकल क्षेत्र में सामाजिक दायित्व

समीना हामिद कॉर्पोरेट नेतृत्व और स्वास्थ्य सेवा को एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की सोच का एक बेहतरीन उदाहरण हैं। सिप्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी की सदस्य के रूप में उन्होंने इस दिग्गज फार्मास्युटिकल कंपनी में आधुनिक प्रबंधन पद्धतियों को लागू किया।

उनका नेतृत्व केवल कंपनी की वृद्धि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने और स्वास्थ्य सेवाओं तक सबकी पहुंच बनाने पर भी उनका विशेष ध्यान रहा है। कोरोना महामारी के दौरान उनके द्वारा किए गए कार्य उनके मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

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रूही नाज़की: कश्मीर में चाय और संस्कृति का अनूठा संगम

रूही नाज़की ने कश्मीर में केवल एक कैफे की शुरुआत नहीं की, बल्कि 'चायजाई' के जरिए एक ऐसा मंच तैयार किया जहां भोजन, आपसी बातचीत और कश्मीरी संस्कृति का खूबसूरत मेल देखने को मिलता है।

उन्होंने कश्मीर में पारंपरिक स्वादों और आधुनिक आतिथ्य को एक छत के नीचे लाने का काम किया है। उनका यह प्रयास इस बात की मिसाल है कि एक कप चाय कैसे लोगों के दिलों को जोड़ने और पुरानी यादों को ताजा करने का एक बेहतरीन जरिया बन सकती है।

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डॉ. कशिश अज़ीज़

डॉ. कशिश अज़ीज़ भारत की फ़ार्मास्युटिकल इंडस्ट्री में एक मज़बूत आवाज़ हैं, जो प्रोफेशनल काबिलियत के साथ-साथ हिम्मत और सामाजिक ज़िम्मेदारी का बेहतरीन उदाहरण पेश करती हैं। कम उम्र में शादी और माँ बनने के बावजूद अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने से लेकर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से गोल्ड मेडल पाने और क्वालिटी एश्योरेंस (गुणवत्ता आश्वासन) में महारत हासिल करने तक, उनका सफ़र उनके दृढ़ संकल्प और लगन को दिखाता है।
 
यूनिक्योर इंडिया लिमिटेड में एक सीनियर लीडर के तौर पर, वह यह पक्का करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि क्वालिटी और मरीज़ों की सुरक्षा से कभी कोई समझौता न हो। ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम वाले बच्चे की माँ होने के नाते मिले अनुभव ने उन्हें खास ज़रूरतों वाले लोगों की भलाई के काम में भी प्रेरित किया है। फ़ार्मा सेक्टर में महिलाओं के लिए अपने काम, मेंटरशिप और वकालत के ज़रिए, डॉ. अज़ीज़ महिलाओं की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं जो पुरानी परंपराओं को चुनौती देते हुए भारत की फ़ार्मास्युटिकल इंडस्ट्री की तरक्की और विश्वसनीयता में योगदान दे रही हैं।

यह तमाम महिलाएं इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि सफलता का दायरा किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होता। रसोई से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक और डिजिटल प्लेटफॉर्म से लेकर शिक्षा के मैदान तक, इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि सच्ची महत्वाकांक्षा वही है जो अपने साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी नई संभावनाएं पैदा करे।