रितिका दास
भारत की आजादी की लड़ाई लंबी और बहुत कठिन रही है। इस देश की स्वतंत्रता के लिए हजारों देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। उन्होंने औपनिवेशिक अंग्रेजी शासन के सामने कभी घुटने नहीं टेके। इनमें से कई महान सेनानियों के नाम इतिहास की किताबों और लोकप्रिय कहानियों के जरिए पूरे देश में फैल गए। लेकिन इसके साथ ही ऐसे कई वीर भी हैं जिनकी वीरता की कहानियां समय के साथ कहीं पीछे छूट गईं। आज की युवा पीढ़ी उन महान नायकों के योगदान से ज्यादातर अनजान है।
इन गुमनाम नायकों में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल हैं। वर्तमान समय में पूर्वोत्तर भारत में कुल सात राज्य आते हैं। इनके नाम अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा हैं।
जब भी हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की चर्चा करते हैं, तो हमारी जानकारी कुछ चुनिंदा बड़े नेताओं और शहीदों तक ही सीमित रह जाती है। इसके विपरीत जब पूर्वोत्तर के स्वतंत्रता सेनानियों के नाम लेने की बात आती है, तो हम उन्हें उंगलियों पर गिन सकते हैं।
इनमें से कुछ के नाम हम कभी-कभार सुन लेते हैं। फिर भी इन्हें राष्ट्रीय मीडिया और मुख्यधारा के इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। उनका योगदान ज्यादातर स्थानीय स्मृतियों, लोककथाओं और मौखिक इतिहास तक ही सिमटकर रह गया है।
1857 की क्रांति से लेकर मेघालय का संघर्ष
सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की जब भी बात होती है, तो मंगलमय पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई और असम के मनीराम दीवान जैसे महान नेताओं का जिक्र जरूर होता है। इन वीरों ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। इसी दौर में मेघालय की धरती पर एक ऐसा योद्धा भी था जिसने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त मोर्चा लिया था। उनका नाम यू कियांग नांगबाह था।
यू कियांग नांगबाह ने अंग्रेजों की नीतियों का कड़ा विरोध किया था। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले के जोवाई शहर में इअहमूसियांग के पास सरेआम फांसी पर लटका दिया था। अंग्रेजों ने यह खौफनाक कदम इसलिए उठाया था ताकि क्षेत्र का कोई दूसरा व्यक्ति ब्रिटिश राज के खिलाफ बगावत करने की हिम्मत न जुटा सके।
पूर्वोत्तर की साहसी महिला स्वतंत्रता सेनानी
जब हम अनसुने स्वतंत्रता सेनानियों की बात करते हैं, तो उन महिला नेताओं का जिक्र करना बहुत जरूरी है जिन्होंने क्रूर शासन का डटकर मुकाबला किया। महिलाओं के योगदान और उनके बलिदानों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी तेरह साल की रानी गाइदिनलिु की है।
नागाओं केरोंगमी जनजाति से ताल्लुक रखने वाली रानी गाइदिनलिु ने ईसाई मिशनरियों से अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन का दामन थामा था। उन्हें साल 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया था।
उन्होंने जेल में चौदह लंबे साल बिताए जो किसी भी भारतीय स्वतंत्रता सेनानी द्वारा जेल में काटे गए सबसे लंबे समय में से एक है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने साल 1937 में उन्हें'रानी' की उपाधि से नवाजा था। इसके बाद साल 1982 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से भी सम्मानित किया गया।
रानी गाइदिनलिु की तरह मिजोरम की एक बहादुर महिला chieftain लालनु रोपुलियानी की कहानी भी बहुत प्रेरणा देती है। लालनु रोपुलियानी ने लुशाई हिल्स में अंग्रेजों की विस्तारवादी नीतियों और कब्जा करने की साजिशों का पुरजोर विरोध किया था। उन्होंने ब्रिटिश योजनाओं के तहत बनने वाली सड़कों और पुलों के निर्माण के लिए स्थानीय मजदूरों या पुरुषों को भेजने से साफ इनकार कर दिया था।
छियासी वर्ष की उम्र में भी उन्होंने जेल जाने के बाद भी अंग्रेजों के सामने झुकने से मना कर दिया। उन्होंने जेल के भीतर ही अपनी आखिरी सांस ली। वह मिजोरम के लोगों के लिए प्रतिरोध और क्रांति का एक बड़ा प्रतीक बन गईं।

असम के महान शहीद और 1940 का दौर
उन्नीस सौ चालीस का दशक भारत के कई हिस्सों में बहुत क्रांतिकारी दौर था। यह वह समय था जब स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम चरण अपने चरम पर था और देश ने कई प्रमुख हस्तियों का नेतृत्व और बलिदान देखा था। इसी दौरान असम के युवाओं में भी अंग्रेजों के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश उफन रहा था।
साल 1942 में सत्रह साल की कनकलता बरुआ को असम के गोहपुर पुलिस स्टेशन पर तिरंगा झंडा फहराने की कोशिश के दौरान अंग्रेजों ने गोली मारकर शहीद कर दिया था। उनकी इस साहसिक कहानी के साथ ही एक और अमर सेनानी शहिद कुशल कोंवर का नाम भी इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। वह भारत के ऐसे इकलौते शहीद थे जिन्हें 1942-43 के भारत छोड़ो आंदोलन के अंतिम चरण के दौरान फांसी दी गई थी।
कुशल कोंवर पर एक ऐसी घटना में शामिल होने का झूठा आरोप लगाया गया था जिसमें कुछ आंदोलनकारियों ने गोलाघाट जिले के सरुपथर के पास रेलवे स्लीपर उखाड़ दिए थे। इस दुर्घटना में कई सहयोगी सैनिकों की मौत हो गई थी। इस घटना से कुशल कोंवर का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। इसके बाद भी अंग्रेजों की अदालत ने बिना किसी पुख्ता सबूत के उन्हें दोषी करार दे दिया और मौत की सजा सुना दी।
कुशल कोंवर ने इस अन्यायपूर्ण फैसले को पूरी हिम्मत के साथ स्वीकार किया। ऐसा कहा जाता है कि जब उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया जा रहा था, तब उनके होंठों पर एक प्रार्थना गूंज रही थी। वह'पार करो रघुनाथ संसार सागर' गा रहे थे, जिसका अर्थ है कि ईश्वर उन्हें इस भवसागर को पार करने में मदद करे।
राजा-महाराजाओं और क्षेत्रीय नेताओं का योगदान
भारत की आजादी की लड़ाई में केवल आम जनता ने ही हिस्सा नहीं लिया, बल्कि देश के कई राजाओं और राजकुमारों ने भी अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। ऐसी ही एक गौरवशाली गाथा मणिपुर के वीर महाराजा बीर टिकेंद्रजीत सिंह की है, जिन्हें प्यार से'मणिपुर का शेर' कहा जाता है।
उन्होंने एंग्लो-मणिपुर युद्ध के दौरान अंग्रेजों की उस कोशिश का डटकर मुकाबला किया जिसके जरिए वे मणिपुर को अपने नियंत्रण में लेना चाहते थे। दुर्भाग्य से उन्हें अंग्रेजों ने बंदी बना लिया और थंगल जनरल के साथ इम्फाल के पोलो ग्राउंड में सरेआम फांसी पर लटका दिया।
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश के अलग-अलग हिस्सों से क्षेत्रीय नेताओं को आगे लाने में बहुत अहम भूमिका निभाई। इनमें से कई नेता बाद में स्वतंत्रता संग्राम के बड़े स्तंभ बने।
अरुणाचल प्रदेश के मोजे रिबा भी ऐसे ही एक महान नेता थे। पश्चिम सियांग जिले के बासर उप-मंडल में जन्मे मोजे रिबा को प्यार से'अबोह न्यिजी' यानी सभी के बूढ़े पिता कहकर पुकारा जाता था। उन्होंने उभरती हुई कांग्रेस पार्टी का दामन थामा और गोपीनाथ बोरदोलोई तथा ललित हजारिका जैसे दिग्गज नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। वह अरुणाचल प्रदेश से पहले कांग्रेस अध्यक्ष भी बने थे।
उनकी वीरता और राष्ट्रवादी संघर्ष में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें प्रतिष्ठित'ताम्र पत्र' से सम्मानित किया था। इसी तरह त्रिपुरा के दो सगे भाइयों उमेश लाल सिंह और सचिंद्र लाल सिंह ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान दिया। आजादी के बाद उमेश लाल सिंह साल 1967 में विधानसभा के लिए चुने गए, जबकि उनके भाई सचिंद्र लाल सिंह स्वतंत्र त्रिपुरा के पहले मुख्यमंत्री बने।

इतिहास के पन्नों को नया आयाम देने की जरूरत
ऊपर बताए गए नाम पूर्वोत्तर के स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी फेहरिस्त का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा हैं। हर साल जब हम स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाते हैं, तो हमें उन सभी देशभक्तों की दूरदर्शिता, नेतृत्व और बलिदान को भी याद करना चाहिए जिन्होंने एक स्वतंत्र भारत का सपना देखा था और ब्रिटिश राज का मुकाबला किया था।
अब यह समय की मांग है कि हम अपने स्कूली पाठ्यक्रम और इतिहास की सीमाओं को थोड़ा और बढ़ाएं। एनसीईआरटी देश की शिक्षा प्रणाली को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए कई बदलाव कर रहा है। इसी दिशा में काम करते हुए पाठ्यक्रम में पूर्वोत्तर भारत के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के अध्यायों को भी शामिल किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी उनके त्याग से वाकिफ हो सके।
इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों को फिल्मों, वेब सीरीज और डॉक्यूमेंट्री जैसी आधुनिक माध्यमों का खुलकर इस्तेमाल करनाचाहिए। असम सरकार ने अपने बजट 2026-27 में शहीद कुशल कोंवर के जीवन पर आधारित एक विशेष फिल्म के निर्माण के लिए वित्तीय प्रस्ताव को मंजूरी दी है। यह एक सराहनीय कदम है।
वर्ष 2026 में जब पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, तब पूर्वोत्तर के इन अनसुने नायकों को याद करना महज एक औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। यह इस बात की भी याद दिलाता है कि भारत की आजादी देश के कोने-कोने से आए अनगिनत महिलाओं और पुरुषों के बलिदान की मजबूत नींव पर टिकी है।
(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले असम के छात्र हैं।)