शापड़े से चंडू ख़ाने तक, ऐसे बने दिल्ली के मुहावरे

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 16-08-2026
Why exactly do people in Old Delhi use the phrase
Why exactly do people in Old Delhi use the phrase "Shapde ki chhodna"?

 

मलिक असगर हाशमी

मुंबई की सड़कों पर कोई शेखी बघारे तो सुनने वाला हंसकर कह देता है,क्या छपरी बात कर रहा है!” हरियाणा के खेतों में गपबाज़ी को उरले-परले की” कह दिया जाता है, कोलकाता की गलियों में जा बेटा” से बात टलती है, तो बिहार में मारम न” की धमकी में ही एक अपनापन छुपा होता है। हर शहर की अपनी ज़बान है, अपने मुहावरे हैं।

लेकिन अगर आप पुरानी दिल्ली की तंग और पेचीदा गलियों में कदम रखें, जहाँ हवा में आज भी निहारी की महक और मुग़लई इतिहास की सोंध फैली रहती है, तो वहाँ आपको दो अनोखे जुमले गूँजते हुए सुनाई देंगे: अबे क्यों छोड़ रिया शापड़े की!” और दूसरा-- चंडू ख़ाने की गप!”

आज की नई पीढ़ी इन जुमलों को हंसते-खेलते बोल तो देती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इन चार शब्दों के पीछे पुरानी दिल्ली की गुमनाम तारीख़ और एक भूला-बिसरा ज़माना छिपा हुआ है।

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एआई के जरिया पुरानी तस्वीर उकेरने की कोशिश

कहानी शुरू होती है जामा मस्जिद के पिछवाड़े, चावड़ी बाज़ार से अजमेरी गेट को जोड़ने वाली पुरानी सड़क से।

दशकों पहले, इस सड़क के मोड़ पर बरगद का एक विशालकाय, घना पेड़ हुआ करता था। पेड़ की छाँव में एक पुराना चबूतरा था, जिससे लगी हुई 'बड़शाह मुल्ला' की एक छोटी-सी मज़ार थी। दिन ढलते ही इस चबूतरे की रंगत बदलने लगती। यह जगह शहर भर के सुल्फ़ा और अफ़ीम पीने वालों का अड्डा बन जाती थी।

जैसे-जैसे अफ़ीम का नशा सर चढ़कर बोलने लगता, चबूतरे पर बैठे इन 'दानिशमंदों' के दिमागी घोड़े दौड़ने लगते। नशे की धुंध में डूबे ये हुज़ूर भारत की आज़ादी के ख़ाके खींचते, तो कभी एक ही झटके में देश का सारा कर्ज़ा माफ़ करने की तरकीबें निकाल लेते। कोई कहता कि वायसराय उनसे मशविरा लिए बिना चाय तक नहीं पीता, तो कोई दावा करता कि मुग़ल सल्तनत का असली ख़ज़ाना उसी को मालूम है!

इन बेसिर-पैर की लंबी-लंबी फेंकने वालों की बातें सुनकर राहगीर मुस्कुराते और कहते—"अबे क्यों छोड़ रिया है शापड़े (चावड़ी) के चबूतरे की!"

ज़माना बदला। बरगद का वह बूढ़ा पेड़ कट गया, चबूतरा ढह गया और बड़शाह मुल्ला की मज़ार भी वक़्त की धूल में कहीं खो गई। 'चावड़ी' शब्द दिल्ली वालों की ज़बान पर घिसकर 'शापड़े' बन गया, लेकिन यह मुहावरा आज भी दिल्ली के कूचों में ज़िंदा है—जब भी कोई हवा में तीर चलाता है, तो पुरानी दिल्ली का कोई बुज़ुर्ग या युवा मुस्कुराकर टोक देता है—अबे क्यों छोड़ रिया शापड़े की!”

लेकिन कहानी सिर्फ़ शापड़े पर ख़त्म नहीं होती। इससे भी बड़ा और मशहूर एक और अड्डा था—'चंडू ख़ाना'

जामा मस्जिद की सीढ़ियों के ठीक नीचे, भोर की पहली किरण के साथ ही चाय का एक खोखा खुला करता था। यह सिर्फ़ चाय की दुकान नहीं थी, बल्कि ज़माने भर के मुफ़्तख़ोरों, मटरगश्तों और राजनीतिक विश्लेषकों की संसद थी!

सुबह-सुबह जब उर्दू के ताज़ा अख़बार आते, तो उनका एक-एक पन्ना अलग-अलग हाथों में बँट जाता। एक हाथ में चाय की सिसकी होती और दूसरे हाथ में अख़बार का पन्ना। इसके बाद शुरू होती घंटों लंबी 'ग्लोबल पॉलिटिक्स' पर चर्चा।

चाय की चुस्कियों के साथ वे रूस, अमरीका और देश की हुकूमत का 'नास मारा' करते थे। उनकी बातें सुनकर लगता कि दुनिया के तमाम बड़े मुल्कों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इन्हीं चंडू ख़ाने के नवाबों की सलाह पर अपनी नीतियाँ बना रहे हैं!

यह बैठक इतनी मक़बूल हुई कि दिल्ली वालों ने इसे 'चंडू ख़ाना' कहना शुरू कर दिया, और यहाँ हांकी जाने वाली शेखी को—'चंडू ख़ाने की गप'

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जामा मस्जिद से चावड़ी बाजार की ओर जाते रास्ते का दृश्य

आज शाहिद सिद्दीकी जैसे उर्दू के नामचीन पत्रकार जब पुरानी दिल्ली के इन अनाम पन्नों को समेटते हैं, तो इतिहास मुस्कुरा उठता है।

'शापड़े की छोड़ना' तो शायद आज भी पुरानी दिल्ली की चारदीवारी तक ही सीमित रह गया, लेकिन 'चंडू ख़ाने की गप' अपनी सरहदों को लाँघकर पूरे हिंदुस्तान के साहित्य और मुहावरों का हिस्सा बन गया।

आज न वह बरगद का पेड़ है, न अफ़ीमचियों का वह चबूतरा, और न ही जामा मस्जिद की सीढ़ियों वाला वह पुराना चाय का खोखा। लेकिन जब भी कोई शख्स बेतुकी और बढ़ा-चढ़ाकर बातें करता है, तो पुरानी दिल्ली की गलियों से गुज़रा यह इतिहास अचानक ज़िंदा हो उठता है!