मुस्लिम राजनीति का इस्लामीकरण: खिलाफत आंदोलन का पसमांदा विश्लेषण

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 15-08-2026
The Islamization of Muslim Politics: A Pasmanda Analysis of the Khilafat Movement
The Islamization of Muslim Politics: A Pasmanda Analysis of the Khilafat Movement

 

अब्दुल्लाह मंसूर

दक्षिण एशियाई मुस्लिम राजनीति के इतिहास में 'आइडिया ऑफ पाकिस्तान' (पाकिस्तान का विचार) को अक्सर एक स्वाभाविक, ऐतिहासिक या अनिवार्य परिघटना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परंतु एक पसमांदा चिंतक और बहुसंख्यक शोषित मुस्लिम जातियों के दृष्टिकोण से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान का निर्माण किसी व्यापक जन-आंदोलन का परिणाम नहीं था।

इसके विपरीत, यह मुस्लिम उच्च जाति यानी अशराफ़ एलीट (जैसे सैयद, शेख, मुग़ल, पठान) के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए निर्मित किया गया एक सुव्यवस्थित उपक्रम था।

इस संपूर्ण प्रक्रिया का सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि अशराफ़ नेतृत्व ने अपने वर्ग-हितों जैसे सरकारी नौकरियों में एकाधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के कोटे और ज़मींदारी अधिकारों की सुरक्षा को छिपाने के लिए धर्म का सहारा लिया।

बहुसंख्यक पसमांदा (पिछड़े, दलित व शोषित मुस्लिम) समाज के भीतर 'धर्म और पहचान के ख़तरे में होने' का एक काल्पनिक भय निर्मित किया गया, ताकि उन्हें अशराफ़-संचालित राजनीति का ईंधन बनाया जा सके। इस वैचारिक व सामाजिक भटकाव की ऐतिहासिक नींव कहाँ रखी गई, इसे समझने के लिए हमें उस मोड़ का विश्लेषण करना होगा जहाँ से भारतीय मुस्लिम राजनीति का स्वरूप बदला।

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'आइडिया ऑफ पाकिस्तान' की ऐतिहासिक वैचारिक नींव

ऐतिहासिक घटनाक्रमों का निष्पक्ष विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि खिलाफत आंदोलन (1919-1924) वह पहला केंद्रीय ऐतिहासिक मोड़ था जिसने 'आइडिया ऑफ पाकिस्तान' के लिए आवश्यक वैचारिक और मनोवैज्ञानिक ज़मीन तैयार की।

खिलाफत आंदोलन से पूर्व भारतीय मुसलमानों की राजनीति मुख्य रूप से संयुक्त प्रांत (UP), बिहार और शहरी पंजाब के पढ़े-लिखे अशराफ़ वर्ग की धर्मनिरपेक्ष और वर्ग-आधारित राजनीति थी। 1916के 'लखनऊ समझौते' (Lucknow Pact) तक ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के तहत काम कर रहा यह वर्ग केवल सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी और पृथक निर्वाचन जैसी संवैधानिक मांगों तक सीमित था।

जाने-माने इतिहासकार प्रो. इश्तियाक़ अहमद अपनी पुस्तक 'Jinnah: His Successes, Failures and Role in History' में इस बात को रेखांकित करते हैं कि इस दौर में मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेता एक उदारवादी और संवैधानिक राजनीति का प्रतिनिधित्व कर रहे थे तथा 1915के बंबई अधिवेशन में जिन्ना के प्रयास से ही मुस्लिम लीग और कांग्रेस के सत्र एक साथ आयोजित किए गए थे। इस चरण तक पारंपरिक धार्मिक गुरुओं यानी उलेमा का मुख्यधारा की राजनीति में कोई प्रभाव या सीधा हस्तक्षेप नहीं था।

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के समाप्त होने के बाद जब ब्रिटेन और उसकी सहयोगी शक्तियों ने उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य का विघटन करना शुरू किया, तब भारतीय मुसलमानों के बीच असंतोष फैला।

उस्मानी सुल्तान को सुन्नी परंपरा में प्रतीकात्मक रूप से 'खलीफा' माना जाता था, हालांकि 19वीं सदी में बाल्कन युद्धों में लगातार हार के कारण उस्मानी साम्राज्य एक पतनशील सत्ता बन चुका था।

खिलाफत आंदोलन के माध्यम से अली बंधुओं (मोहम्मद अली और शौकत अली) तथा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे पश्चिमी-शिक्षित अशराफ़ नेताओं ने इस मुद्दे को भारतीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।

खिलाफत समर्थकों ने यह दावा फैलाया कि उस्मानी सुल्तान दुनिया के सभी मुसलमानों का एकमात्र सर्वमान्य खलीफा है, यह लड़ाई 'दुनिया-ए-इस्लाम' और 'दुनिया-ए-ईसाइयत' के बीच का संघर्ष है, और ब्रिटेन ने खलीफा को इस्तांबुल में अपना बंदी बना रखा है।

ऐतिहासिक तथ्यों की गहराई में जाने पर यह उजागर होता है कि उस्मानी शासकों का वैश्विक खिलाफत का यह दावा स्वयं एक मनगढंत कहानी पर आधारित था। प्रसिद्ध समाजशास्त्री और इतिहासकार हमज़ा अलवी अपने सुप्रसिद्ध निबंध 'Ironies of History: Contradictions of the Khilafat Movement' में यह स्पष्ट करते हैं कि उस्मानी शासकों ने 19 वीं सदी में यह प्रचारित किया था कि 1517ई. में अंतिम अब्बासी खलीफा मुतवक्किल ने सुल्तान सलीम प्रथम को खिलाफत सौंपी थी।

परंतु आधुनिक इतिहासकार इस दावे को खारिज करते हैं क्योंकि मुतवक्किल स्वयं मिस्र के ममलुक सुल्तानों का एक असहाय बंदी मात्र था, जिसके पास खिलाफत हस्तांतरित करने का कोई अधिकार नहीं था। 1517के बाद लगभग ढाई सौ वर्षों तक किसी भी उस्मानी सुल्तान ने आधिकारिक रूप से 'खलीफा' उपाधि का प्रयोग नहीं किया था।

पहली बार 1774ई. में रूस के साथ हुई 'कुचुक कैनार्जी की संधि' में कूटनीतिक पैंतरे के रूप में इसका इस्तेमाल हुआ था। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश साम्राज्य ने भी इस विचार को बढ़ावा दिया क्योंकि उसे लगता था कि उस्मानी सुल्तान को खलीफा मान लेने से ब्रिटिश भारत की विशाल मुस्लिम प्रजा को आसानी से नियंत्रित किया जा सकेगा।

1850के बाद उभरी सस्ती उर्दू लीथोग्राफिक प्रेस ने इस काल्पनिक आख्यान को भारतीय मुसलमानों के मानस में गहराई से बिठाने में उत्प्रेरक का काम किया। 'खलीफा' शब्द की मूल भाषाई और ऐतिहासिक अवधारणा भी इस आंदोलन के दौरान पूरी तरह विरूपित की गई।

अरबी भाषा के अनुसार 'ख-ल-फ' का मूल अर्थ केवल 'पीछे आने वाला' या 'उत्तराधिकारी' होता है। पैगंबर मुहम्मद के बाद प्रथम चार ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन तक खलीफा केवल एक चुना हुआ प्रशासनिक प्रमुख होता था, जिसके पास कोई आध्यात्मिक या 'पोप' जैसी सत्ता नहीं थी।

उमय्यद और अब्बासी राजवंशों के दौरान जब राजतंत्र स्थापित हुआ, तो शासकों ने अपनी निरंकुश सत्ता को धार्मिक पवित्रता देने के लिए 'खलीफतउल्लाह' (ईश्वर का प्रतिनिधि) जैसी अवधारणाएँ गढ़ीं।

सर सैयद अहमद ख़ान ने कहा कि खलीफा की सत्ता केवल उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित होती है जहाँ उसका व्यावहारिक शासन हो; भारत के मुसलमान ब्रिटिश प्रजा हैं, इसलिए उस्मानी सुल्तान उनका खलीफा नहीं हो सकता।

इसके विपरीत, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अब्बासी काल की इसी विकृत अवधारणा को अपनाते हुए 'खलीफा' और 'इमाम' को मिलाकर एक अत्यधिक धार्मिक ढांचा तैयार किया। मौलाना आज़ाद का अपना तर्क विरोधाभासी था, क्योंकि वे एक तरफ खलीफा के लिए स्वतंत्र और शक्तिशाली होने की शर्त रखते थे, और दूसरी तरफ उसी मुतवक्किल की परंपरा को मानते थे जो स्वयं शक्तिहीन बंदी था।

खिलाफत आंदोलन के भीतर कई गहरे अंतर्विरोध और दोहरे मापदंड मौजूद थे। सूफी/बरेली परंपरा से जुड़े उलेमा ने शास्त्रीय इस्लामी सिद्धांतों का हवाला देते हुए उस्मानी दावे को खारिज कर दिया था, क्योंकि एक हदीस के अनुसार खलीफा का 'कुरैश' कबीले से होना अनिवार्य था, जबकि उस्मानी शासक तुर्क थे।

प्रो. इश्तियाक़ अहमद के ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मौलाना अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी के फतवे ने स्पष्ट किया कि उस्मानी शासक कुरैशी न होने के कारण खलीफा नहीं हो सकते, जिससे पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में अंग्रेजों की सैन्य भर्ती का रास्ता साफ हुआ।

1919में मौलाना अब्दुल बारी ने फतवा दिया कि खलीफा के लिए कुरैशी होना ज़रूरी नहीं है, परंतु देवबंदी धारा के कई वरिष्ठ उलेमा ने भी इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद खिलाफत नेताओं ने बहुसंख्यक सूफी/बरेली परंपरा की पूरी तरह उपेक्षा की।

इसी तरह का दोहरा रवैया अरब राष्ट्रवाद के प्रति भी अपनाया गया। उस्मानी साम्राज्य ने अरब क्षेत्रों को सदियों से अपनी औपनिवेशिक प्रजा बना रखा था। जब अरब मुसलमानों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए 'अरब विद्रोह' शुरू किया, तो भारतीय खिलाफत नेताओं ने उनके आत्मनिर्णय का समर्थन करने के बजाय मांग की कि अरबों पर तुर्की का औपनिवेशिक शासन बहाल किया जाए।

भारत में अंग्रेजों से आजादी मांगना और अरब मुसलमानों पर तुर्की के औपनिवेशिक शासन की वकालत करना खिलाफत आंदोलन के छद्म 'साम्राज्यवाद-विरोधी' स्वरूप को उजागर करता है। इसके अलावा, भारतीय नेता तुर्की के जमीनी यथार्थ से बेखबर थे।

असली संघर्ष खलीफा और मुस्तफा कमाल पाशा (अतातुर्क) के नेतृत्व में उभर रहे तुर्की रिपब्लिकन राष्ट्रवादियों के बीच था। अंततः मार्च 1924में तुर्की के नए नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने मदरसे बंद किए, अरबी भाषा व शरीयत कानून हटाए, खिलाफत को समाप्त कर तुर्की को एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया।

हमज़ा अलवी के शोध यह भी साबित करते हैं कि खिलाफत आंदोलन की शुरुआत में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार इसके प्रति अत्यंत सहयोगी थी। जनवरी 1920में जब डॉ. अंसारी के नेतृत्व में खिलाफत प्रतिनिधिमंडल वायसराय से मिला, तो उन्हें सहायता दी गई।

शौकत अली के अनुरोध पर ब्रिटिश सरकार ने इस प्रतिनिधिमंडल को यूरोप जाने के लिए सरकारी खर्चे पर प्रथम श्रेणी की यात्रा सुविधा प्रदान की। अंग्रेजों के लिए यह आंदोलन उपयोगी था क्योंकि यह भारतीय मुसलमानों का ध्यान उनके स्थानीय अधिकारों से हटाकर एक विदेशी मुद्दे पर केंद्रित रखता था।

प्रसिद्ध पाकिस्तानी इतिहासकार डॉ. मुबारक अली अपने लेख 'खिलाफत आंदोलन: राजनीति का इस्लामीकरण' में इस परिघटना का सटीक विश्लेषण करते हैं। उनके अनुसार, इस आंदोलन ने भारतीय मुसलमानों में राजनीतिक समझ विकसित करने के बजाय राजनीति का पूर्ण इस्लामीकरण कर दिया।

1920में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने चेतावनी दी थी कि राजनीति में उलेमा और धार्मिक मुहावरों को लाने से मुस्लिम समाज का अपूरणीय नुकसान होगा, जो आगे चलकर सच साबित हुई।

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धर्म का इस्तेमाल और हिजरत की त्रासदी

जब ब्रिटिश हुकूमत ने तुर्की के उस्मानी खलीफा के अधिकारों पर शिकंजा कसा, तो भारत के अशराफ़ और उलेमा नेतृत्व ने एक अत्यधिक गैर-जिम्मेदाराना और भावुक कदम उठाया। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अब्दुल बारी और अली बंधुओं के वैचारिक प्रभाव में भारत को 'दारुल हरब' (अधर्म की भूमि) घोषित कर दिया गया और फतवा जारी किया गया कि मुसलमानों को किसी इस्लामिक देश यानी 'दारुल इस्लाम' (विशेषकर अफगानिस्तान) में हिजरत (पलायन) कर जाना चाहिए।

खिलाफत आंदोलन के दौरान घटित 'हिजरत आंदोलन' (1920) ने इस पूरे घटनाक्रम को त्रासदी में बदल दिया। प्रसिद्ध शोधकर्ता डीट्रिच रीट्ज़ अपनी पुस्तक 'Hijrat: The Flight of the Faithful' में इस पूरे घटनाक्रम का दस्तावेजीकरण करते हैं।

रीट्ज़ के दस्तावेजों के अनुसार, इस फतवे से लगभग 50,000से 1,00,000मुसलमान अपना सब कुछ छोड़कर अफगानिस्तान की ओर निकल पड़े। परंतु इस पलायन में तबाही झेलने वाले लोग कोई नवाब, रईस या ऊंची जाति के अशराफ़ नहीं थे; वे मुख्य रूप से सिंध, पंजाब और सीमांत प्रांत के गरीब किसान, बुनकर, दस्तकार, मजदूर और पसमांदा मुसलमान थे।

नेताओं के आह्वान पर इन सीधे-सादे गरीब मुसलमानों ने अपने घर, मवेशी, औजार और पुश्तैनी ज़मीनें कौड़ियों के दाम बेच दीं और काबुल की ओर पैदल तथा बैलगाड़ियों से निकल पड़े। वहीं दूसरी ओर, फतवा जारी करने वाले मौलाना आज़ाद, अली बंधु या अन्य समृद्ध उलेमा में से किसी ने स्वयं हिजरत नहीं की, न ही अपने परिवारों को वहां भेजा।

वे भारत में ही अपनी सुरक्षित राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का लुत्फ उठाते रहे, जबकि अनपढ़ और गरीब पसमांदा जनता को चारे की तरह इस्तेमाल किया गया। जब हजारों थके-हारे मुहाजिर खैबर दर्रे को पार करके अफगानिस्तान पहुंचे, तो वहां के अमीर अमानुल्लाह खान ने सीमाएं बंद कर दीं और उन्हें खदेड़ दिया।

भुखमरी, कड़कड़ाती धूप, हैजा और कबीलाइयों की लूटपाट के कारण रास्ते में ही हजारों बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे मर गए। जो कुछ हज़ार लोग किसी तरह जिंदा वापस भारत लौटे, उनकी ज़मीनें और घर पहले ही बिक चुके थे; वे अपने ही देश में बेघर और कंगाल बन गए।

ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि हिजरत आंदोलन अशराफ़ नेतृत्व की एक घोर बौद्धिक व नैतिक विफलता थी, जिसने धार्मिक कर्तव्य के नाम पर निर्दोष पसमांदा जनता को तबाही के मुंह में धकेल दिया।

इसी तरह, धार्मिक कट्टरता को उभारने का दुखद नतीजा केरल के मालाबार में मोपला विद्रोह के रूप में सामने आया। प्रसिद्ध विद्वान डॉ. बी.आर. अम्बेडकर अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया' में लिखते हैं कि मालाबार में होने वाला मोपला विद्रोह दो मुस्लिम संगठनों खुद्दम-ए-काबा और सेंट्रल खिलाफत कमेटी के आंदोलनों के कारण शुरू हुआ।

आंदोलनकारियों ने इस सिद्धांत का प्रचार किया कि ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत हिंदुस्तान 'दारुल हरब' था और मुसलमानों को इसके विरुद्ध अवश्य लड़ाई लड़नी चाहिए। यह मूल रूप से ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एक विद्रोह था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य का तख्ता उलटकर उसकी जगह इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना करना था।

परंतु खिलाफत के धार्मिक प्रतीकों के प्रभाव में आकर इस विद्रोह ने भयानक सांप्रदायिक रूप ले लिया, जहाँ हजारों लोगों का कत्लेआम हुआ और जबरन धर्मांतरण कराए गए। मोपलाओं द्वारा किए गए व्यापक नरसंहार और अत्याचारों के बावजूद गांधी जी ने उनकी सीधी निंदा करने से परहेज किया।

उन्होंने मोपलाओं को "God-fearing people" (ईश्वर से डरने वाले धर्मनिष्ठ लोग) कहा और कहा कि वे उस बात के लिए लड़ रहे हैं जिसे वे अपना धर्म समझते हैं। हिन्दू अशराफ मुस्लिम एकता के लिए इस हद तक जाना देश के लिए बहुत खतरनाक साबित हुआ।

राजनीति में धार्मिक भावना के इस विनाशकारी प्रयोग का पाठ केवल खिलाफत तक ही सीमित नहीं रहा। आगे चलकर, खुद को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले अशराफ़ नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने भी धर्म की इस अपार शक्ति को भली-भांति समझा। 1930और 1940के दशकों में जब जिन्ना ने देखा कि लोकतांत्रिक भारत में बहुसंख्यक आबादी के सामने अशराफ़ एलीट के ऐतिहासिक विशेषाधिकार खतरे में हैं, तो उन्होंने भी उसी धार्मिक भावुकता का सहारा लिया।

जिन्ना और मुस्लिम लीग ने पसमांदा मुसलमानों (अंसारी, कुरैशी, सलमानी, सैफी, राईन आदि) के वास्तविक सामाजिक-आर्थिक, जातिगत और शैक्षणिक मुद्दों को दबाने के लिए 'इस्लाम खतरे में है' का नारा दिया। जिन उलेमा के ख़िलाफ़ थे जिन्ना उन्हीं उलेमा से पाकिस्तान के पक्ष में धार्मिक वैधता हासिल करने में लग गए।

पसमांदा समाज की वास्तविक समस्याएँ  जैसे जातिगत उत्पीड़न, पेशागत बेदखली, भूमिहीनता, अशिक्षा और संस्थागत संसाधनों से वंचित रखा जाना - को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। खिलाफत आंदोलन ने उन्हें एक काल्पनिक वैश्विक इस्लामी पहचान में उलझाकर उनके स्थानीय सामाजिक-आर्थिक और अधिकारों के विमर्श से दूर कर दिया।

1940के दशक में जब अशराफ़ एलीट ने देखा कि स्वतंत्र व लोकतांत्रिक भारत में वयस्क मताधिकार के तहत बहुसंख्यक पसमांदा आबादी के सामने उनके ऐतिहासिक विशेषाधिकार समाप्त हो जाएंगे, तो उन्होंने विभाजन की राह चुनी।

खिलाफत आंदोलन से लेकर पाकिस्तान के निर्माण तक की संपूर्ण प्रक्रिया अशराफ़ राजनीति की वह सोची-समझी रणनीति थी, जिसने बहुसंख्यक पसमांदा समाज को धार्मिक भावुकता के चक्रव्यूह में उलझाकर उनके वास्तविक अधिकारों से बेदखल कर दिया और अपने वर्गीय हितों को सुरक्षित किया।

आज के समय में भी यदि भारतीय मुसलमानों के वास्तविक विकास की बात करनी है, तो खिलाफत और पाकिस्तान के इस 'अशराफ़ आख्यान' का पुनर्मूल्यांकन करते हुए पसमांदा समाज के आंतरिक सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सवालों को मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में लाना आवश्यक है।

( अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।)