रघु राय के साथ जो मैंने सीखा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 28-04-2026
What I Learned with Raghu Rai. AI photo Hashmi
What I Learned with Raghu Rai. AI photo Hashmi

 

s सई़द नक़वी

रघु और मैं, दोनों ने एक ही साल 1964-65में दिल्ली के 'द स्टेट्समैन' अखबार में कदम रखा था। रघु अपने बड़े भाई पॉल का बहुत सम्मान करते थे। पॉल एक गंभीर फोटोग्राफर थे। लेकिन राघू के इस आदर में एक तरह की होड़ भी थी। यह कोई कड़वाहट नहीं,बल्कि आगे निकलने की एक मासूम ज़िद।

जब वे स्टेट्समैन में आए तो उनमें दो बातें अलग ही दिखती थीं। एक तो उनका रौबीला चेहरा और लंबी कद-काठी, और दूसरा उनकी पारखी नज़र जो हर किसी को एक स्नैपशॉट की तरह देखती थी। किसी नए खिलाड़ी जैसी झिझक उनमें नाममात्र को नहीं थी। न्यूज़ एडिटर की मेज के दोनों किनारों पर हाथ टिकाकर जब वे खड़े होते तो उनकी शख्सियत हावी हो जाती थी। फिर भी उनकी गुजारिश में बड़ी नज़ाकत होती थी।

“सर, इसे पांच कॉलम में लगाइए। फोल्ड के ऊपर।” उनके अंदर दो पक्के यकीन थे। एक अपनी खींची हुई तस्वीर पर भरोसा और दूसरा अपने न्यूज़ एडिटर के साथ बेहतरीन तालमेल।

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कभी-कभी उनकी बेपनाह ऊर्जा ऐसे शब्दों में फूटती थी जिनका गलत मतलब निकाला जा सकता था। एक बार हुगली नदी में नाव की सवारी के दौरान काले बादलों ने उन्हें ऐसा दीवाना किया कि वे हमारे कलाकार दोस्त डेसमंड डोइग की तरफ घूमे। डेसमंड अपनी समलैंगिकता को लेकर काफी मशहूर थे। रघु ने जोश में हाथ ऊपर उठाया और चिल्लाए:

“ओह! मेरा तो मन करता है कि मैं तुम्हारा बलात्कार कर लूं।”

डेसमंड ने बड़ी गंभीरता से उनकी तरफ देखा और कहा, “वादा करो।” रघु तुरंत पीछे हट गए। उन्हें मानो पहली बार समझ आया कि उन्होंने क्या कह दिया है।उनमें एक भोलापन था। लेकिन उस कसरती बदन और तलाशती आंखों का जादू ऐसा था कि महिलाएं उनकी तरफ खुद खिंची चली आती थीं।

उनके भीतर दो तरह के पेशेवर लोग बसते थे। एक अखबार का फोटोग्राफर जिसकी नज़र बहुत पैनी थी और दूसरा एक कलाकार जिसने खुद को कार्टियर ब्रेसों जैसे दिग्गजों के बराबर खड़ा कर लिया था। रघु की ज़िद थी कि ब्रेसों जैसा महान फोटोग्राफर उनकी प्रतिभा को पहचाने। और ऐसा हुआ भी। रघु के लिए ब्रेसों की तारीफें किसी मेडल से कम नहीं थीं।

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स्पेन के महान सांड लड़ने वाले (मैटाडोर) एल कोर्डोबेज़ के बारे में कहा जाता था कि उन्हें यह भी नहीं पता कि धरती गोल है। वैसे ही रघु को 'बीटल्स' के बारे में कुछ खास पता नहीं था। मैं ही उन्हें ऋषिकेश की चौरासी कुटिया ले गया था। बीटल्स वहां महर्षि महेश योगी के आश्रम में ध्यान लगाने आए थे। दिल्ली के तमाम विदेशी पत्रकार और दुनिया भर से आए रिपोर्टर आश्रम के बाहर चक्कर काट रहे थे। मैंने पहले ही महर्षि से दीक्षा ले ली थी। इसलिए मेरे पास वह गुप्त कोड था जिससे अंदर एंट्री मिल सकती थी।

गेट पर मौजूद साधुओं ने मुझे एक 'सच्चा ध्यानी' मानकर अंदर जाने दिया। रघु और मैं भीतर पहुंच गए। रघु ने फुर्ती दिखाते हुए मेरे कंधे पर अपना ज़ूम लेंस टिकाया और वह फोटो खींच ली जिसका पूरी दुनिया को इंतज़ार था। महर्षि के साथ बीटल्स की वह तस्वीर एक बहुत बड़ा 'स्कूप' साबित हुई। अगले दिन वह फोटो दुनिया के हर बड़े अखबार के पहले पन्ने पर थी।

रघु की तरक्की बिजली की रफ्तार जैसी रही। उन्होंने न्यूज़ फोटोग्राफी को कला के स्तर तक पहुंचा दिया। चाहे ताजमहल हो, मदर टेरेसा हों, दलाई लामा हों या बड़े संगीतकार, उनकी नज़र सबसे अलग थी। बांग्लादेश युद्ध के दौरान उन्होंने बहादुरी, जीत और त्रासदी को जिस तरह एक साथ कैमरे में कैद किया, वैसा कोई और नहीं कर सका।

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रघु के साथ मेरी यात्राएं जीवन का सबसे समृद्ध अनुभव रहीं। 1978में हम तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ पाकिस्तान गए थे। लाहौर का जादू हर किसी पर चलता है, लेकिन रघु और हमारे एक और साथी कृष्ण कुमार कात्याल के लिए यह शहर उनकी जड़ों से जुड़ा था। उनका जन्मस्थान चिनाब नदी के पास झांग में था। यह हीर-रांझा और सोहनी-महिवाल जैसी प्रेम कहानियों की धरती है। रघु के व्यक्तित्व में झांग की वही रूमानियत बसी हुई थी।

हैरानी की बात यह थी कि कात्याल ने तो अपना पुराना घर और वह स्कूल भी ढूंढ लिया जहां उन्होंने उर्दू सीखी थी। लेकिन बंटवारे के वक्त रघु बहुत छोटे थे। जब कात्याल अपनी पुरानी मिठाई की दुकान के अंदर गए, तो राघू बस बाहर कांच पर नाक टिकाए देखते रह गए।

फिर भी उन्होंने उस यात्रा को एक उत्सव बना दिया। वे वहां के लोगों में ऐसे घुले कि भीड़ ने उन्हें घेर लिया। एक शरारत के तौर पर स्थानीय लोगों ने उन्हें गधे पर बैठा दिया। रघु ने अपना कैमरा मुझे थमा दिया। शुक्र है कि मैंने वह यादगार लम्हा कैमरे में कैद कर लिया।

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एक और वाकया कर्नाटक के आदिवासी इलाके का है। शाम का वक्त था। बंजारन औरतें खाना बना रही थीं और धुएं के बीच उनके गहने चमक रहे थे। उस नजारे ने राघू पर जादू कर दिया।वे चलती कार से कूद पड़े। घुटनों के बल धीरे-धीरे उन औरतों के करीब पहुंचने लगे। वह एक दिव्य फ्रेम बन रहा था। लेकिन तभी खेतों से काम करके उनके मर्द वापस लौट आए।

अचानक माहौल में तनाव फैल गया। लेकिन जो हुआ वह दिल तोड़ने वाला था। वे ग्रामीण हाथ जोड़कर कहने लगे, “हमें पीठ पर मार लो, पर पेट पर लात मत मारो।” वे डर के मारे अपनी औरतों को छोड़कर भागने लगे। उन्हें लगा शायद हम कोई सरकारी अफसर हैं। रघुका चेहरा उतर गया। उस मजबूत इंसान की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्हें यह देखकर बहुत दुख हुआ कि एक खूबसूरत पल कितनी बदसूरती में बदल गया।

(लेखक देश के नामचीन पत्रकार हैं)