ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
आज के डिजिटल शोर-शराबे में अगर कोई एक आवाज़ है जो आपको सुकून की छांव दे सकती है, तो वो है आरजे सायमा। रेडियो की दुनिया में सायमा रहमान सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक एहसास बन चुकी हैं। उनकी शैली में वो ठहराव और तहजीब है, जो आज के भागदौड़ भरे दौर में कम ही देखने को मिलती है। चाहे वो 'पुरानी जींस' की यादें हों या 'उर्दू की पाठशाला' का जादू, सायमा ने हर दिल में अपनी एक खास जगह बनाई है। उनकी आवाज़ सुनकर ऐसा लगता है मानो कोई अपना बहुत करीब बैठकर पुरानी कहानियाँ सुना रहा हो।
नाइजीरिया से दिल्ली तक का सफर
सायमा रहमान का जन्म 25 दिसंबर 1985 को नाइजीरिया में हुआ था। उस वक्त उनके पिता ओज़ैर ए रहमान वहां एक टीचिंग असाइनमेंट पर तैनात थे। जब सायमा महज डेढ़ साल की थीं, तब उनका परिवार वापस भारत लौट आया। सायमा की परवरिश दिल्ली के दिलकश माहौल में हुई। उनकी शुरुआती शिक्षा दिल्ली के 'गुरु हरकिशन पब्लिक स्कूल' में हुई। यह एक सिख स्कूल था और दिलचस्प बात यह है कि सायमा और उनके भाई-बहन वहां अकेले मुस्लिम छात्र थे।
इसी स्कूल के माहौल ने सायमा को बहुभाषी और उदार बनाया। उन्होंने वहां गुरुमुखी पढ़ना और लिखना सीखा। संगीत से उन्हें बचपन से ही बेहद लगाव था। स्कूल की प्रार्थनाओं में वह मुख्य गायिका होती थीं। उन्होंने गुरुद्वारों में जाकर शबद और कीर्तन भी गाए और कई प्रतियोगिताओं में इनाम जीते।
हालांकि, बचपन हमेशा आसान नहीं रहा। स्कूल में कुछ ऐसे लोग भी थे जो उनकी पहचान को लेकर तंज कसते थे। कुछ शिक्षकों ने औरंगजेब या बकरीद जैसे विषयों पर उन्हें शर्मिंदा करने की कोशिश की। लेकिन सायमा कहती हैं कि उन्हें मिलने वाला प्यार इन नफरती बातों से कहीं ज्यादा बड़ा था।

जब आवाज़ बनी पहचान
सायमा के भीतर एक वक्ता (Speaker) हमेशा से छुपा हुआ था। 10वीं कक्षा में उन्होंने 'सेक्स एजुकेशन' जैसे गंभीर विषय पर एक डिबेट में हिस्सा लिया और दिल्ली के नामी स्कूलों को हराकर जीत हासिल की। तब उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उनके बोलने के अंदाज में कुछ खास है। शब्दों पर उनकी पकड़ और भाषा की समझ ने उन्हें दूसरों से अलग खड़ा कर दिया।
सायमा के घर में रेडियो सुनने का माहौल पहले से ही था। वह रेडियो पर समाचार पढ़ने वाले लोगों की आवाज़ से मंत्रमुग्ध हो जाती थीं। उन्हें यह बात बहुत जादुई लगती थी कि एक ही खबर को अलग-अलग लोग अपने खास अंदाज में पढ़ते थे।
वह अक्सर घर के ड्राइंग रूम में बैठकर अखबार की हेडलाइंस पढ़ती थीं और अभ्यास करती थीं। वह कल्पना करती थीं कि वह ऑल इंडिया रेडियो पर खबरें पढ़ रही हैं। शब्दों की स्पष्टता और सही उच्चारण (Diction) के प्रति उनका जुनून बचपन में ही परवान चढ़ने लगा था।
ऑल इंडिया रेडियो से 'पुरानी जींस' तक
उनके सपनों को पहली बड़ी उड़ान 12वीं कक्षा में मिली। उन्हें ऑल इंडिया रेडियो के 'युववाणी' कार्यक्रम में काम करने का मौका मिला। यह उनके करियर की शुरुआत थी। कुछ ही समय में वह अंग्रेजी की न्यूज़ प्रेजेंटर बन गईं। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ वह रेडियो को भी समय देती रहीं। सायमा ने दिल्ली के मशहूर मिरांडा हाउस से समाजशास्त्र में ग्रेजुएशन किया और फिर मास्टर्स और एमफिल की डिग्री भी हासिल की।
रेडियो के साथ-साथ सायमा ने करीब छह महीने तक कॉलेज में पढ़ाया भी। वह एक साथ दो नावों पर सवार थीं। एक तरफ अकादमिक दुनिया थी और दूसरी तरफ रेडियो की चमक। लेकिन तभी उनके जीवन में 'पुरानी जींस' शो आया।
यह शो बॉलीवुड के गोल्डन एरा के गानों और किस्सों पर आधारित था। मजेदार बात यह है कि जब उन्हें यह शो ऑफर हुआ, तब उन्हें पुराने गानों की ज्यादा जानकारी नहीं थी। वह तो ऑल इंडिया रेडियो में माइकल जैक्सन और फ्रैंक सिनात्रा जैसे हॉलीवुड सिंगर्स के गानों की शौकीन थीं। लेकिन जब उन्होंने इस शो को शुरू किया, तो इसने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसी शो की वजह से उन्होंने टीचिंग छोड़कर रेडियो को अपना मुकाम बना लिया।

उर्दू और साहित्य से गहरा लगाव
सायमा सिर्फ गाने नहीं सुनातीं, वह शब्दों की रूह को समझती हैं। भाषा की खूबसूरती को आम लोगों तक पहुँचाने के लिए उन्होंने 'उर्दू की पाठशाला' शुरू की। इसके जरिए वह लोगों को मुश्किल उर्दू शब्दों के मायने बहुत सादगी से समझाती हैं।
साहित्य में उनकी रुचि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सआदत हसन मंटो जैसे लेखकों की कहानियों को अपनी आवाज़ देकर जीवित कर दिया। उनकी आवाज़ में मंटो की कहानियाँ सुनकर ऐसा लगता है जैसे किरदार साक्षात सामने खड़े हों।
सायमा का मानना है कि महिलाओं को खुद शिक्षित होना चाहिए ताकि वे सही और गलत के बीच फर्क कर सकें। वह सामाजिक मुद्दों पर भी बेबाकी से अपनी राय रखती हैं। उनकी लोकप्रियता सिर्फ रेडियो जॉकी के तौर पर नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक के तौर पर भी है।
उपलब्धियां और सम्मान
सायमा रहमान के योगदान को समय-समय पर सराहा गया है। साल 2004 में उन्हें 'RAPA अवार्ड' से सम्मानित किया गया। वहीं, साल 2020में उन्हें 'गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार' मिला। यह सम्मान उन्हें मूल्य-आधारित पत्रकारिता और समाज में सद्भाव बढ़ाने के लिए दिया गया। उनके शो 'पुरानी जींस' और 'हर मर्ज की दवा' आज भी रेडियो प्रेमियों के बीच कल्ट (Cult) का दर्जा रखते हैं।
आज भी जब सायमा माइक्रोफोन के सामने बैठकर कहती हैं, "वेलकम टू द शो, जिसे हम कहते हैं पुरानी जींस", तो लाखों लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। उनकी आवाज़ में वो जादू है जो वक्त के पहिये को पीछे घुमा देता है।
सायमा रहमान ने साबित कर दिया है कि अगर आपके पास अपनी भाषा और अपनी जड़ों के लिए प्यार है, तो आपकी आवाज़ पूरी दुनिया में गूंज सकती है। वह आज भी रेडियो की वो सबसे चमकदार आवाज़ हैं, जो हमें याद दिलाती है कि सादगी में ही सबसे बड़ा सौंदर्य है।