दिव्यांग बच्चों के लिए कश्मीर का अनोखा मॉडल

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 29-04-2026
Kashmir's Unique Model for Children with Disabilities
Kashmir's Unique Model for Children with Disabilities

 

आवाज़ द वाॅयस / श्रीनगर / बडगाम

जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियों से इस बार एक ऐसी प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जो केवल शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की कहानी नहीं, बल्कि हजारों दिव्यांग बच्चों के सपनों को नई दिशा देने वाली मिसाल बन चुकी है। कश्मीर के सरकारी स्कूलों में समावेशी शिक्षा को लेकर शुरू हुई नई पहल अब असर दिखाने लगी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के विजन को जमीनी स्तर पर उतारते हुए स्कूलों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है, जहां वे खुद को अलग नहीं, बल्कि मुख्यधारा का हिस्सा महसूस कर सकें।

इस बदलाव की चर्चा अब पूरे देश में हो रही है और इसकी सराहना लगातार बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि इस अनोखी पहल को Aligarh Muslim University ने भी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच पर साझा कर प्रशंसा की है।

कश्मीर के बडगाम जिले के गवर्नमेंट मिडिल स्कूल डांगेरपोरा में इस परिवर्तन की सबसे खूबसूरत तस्वीर दिखाई देती है। यहां स्थापित रिसोर्स सेंटर अब सिर्फ एक कमरा नहीं रहा, बल्कि उन बच्चों के लिए उम्मीदों की नई दुनिया बन चुका है, जिन्हें अब तक सामान्य शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते थे।

इस सेंटर में दिव्यांग बच्चों को उनकी जरूरतों के अनुसार विशेष प्रशिक्षण, गतिविधियां और सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि वे अपनी क्षमताओं को पहचान सकें और आत्मनिर्भर बन सकें।

इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि बच्चों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा गया है। उन्हें वैज्ञानिक रूप से तैयार की गई गतिविधियों के जरिए सीखने का अवसर दिया जा रहा है। यहां मोटर स्किल्स विकसित करने के लिए हाथों और आंखों के समन्वय पर आधारित अभ्यास कराए जाते हैं। छोटे-छोटे कार्यों के माध्यम से बच्चों की पकड़, संतुलन और शारीरिक नियंत्रण को बेहतर बनाया जा रहा है। वहीं सेंसरी स्किल्स को मजबूत करने के लिए ध्वनि, रंग, स्पर्श और दृश्य माध्यमों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे उनकी सीखने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार हो रहा है।

इतना ही नहीं, इस केंद्र में कम्युनिकेशन स्किल्स यानी संचार क्षमता पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बच्चों को अपनी बात आत्मविश्वास से रखने, दूसरों से जुड़ने और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। पहले जो बच्चे चुपचाप एक कोने में बैठे रहते थे, वे अब समूह गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं और खुलकर अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं।

शिक्षकों का कहना है कि इस बदलाव ने बच्चों के व्यवहार और सोच दोनों में सकारात्मक असर डाला है। जो बच्चे पहले स्कूल आने में झिझकते थे, वे अब उत्साह के साथ कक्षा में पहुंचते हैं। उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है, सीखने की इच्छा जागी है और वे अब खुद को दूसरों से कम नहीं मानते। यही समावेशी शिक्षा की सबसे बड़ी सफलता है, जहां बच्चा अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर अपनी पहचान बनाना शुरू करता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मूल उद्देश्य भी यही है कि देश का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। शिक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में जम्मू-कश्मीर का स्कूल शिक्षा विभाग इस दिशा में गंभीरता से काम कर रहा है। डांगेरपोरा का यह मॉडल अब दूसरे स्कूलों के लिए प्रेरणा बन रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे रिसोर्स सेंटर हर जिले और हर ब्लॉक स्तर पर स्थापित किए जाएं, तो हजारों विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का भविष्य संवारा जा सकता है।

यह पहल केवल शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में परिवर्तन का संकेत भी है। लंबे समय तक दिव्यांग बच्चों को दया या सहानुभूति की नजर से देखा जाता रहा, लेकिन अब उन्हें अवसर, सम्मान और अधिकार के साथ देखा जा रहा है। यही बदलाव किसी भी आधुनिक समाज की पहचान होता है।

कश्मीर, जो अक्सर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और राजनीतिक घटनाओं के कारण सुर्खियों में रहता है, अब शिक्षा के क्षेत्र में भी नई पहचान बना रहा है। बडगाम के इस छोटे से स्कूल से उठी समावेशी शिक्षा की यह रोशनी दूर तक फैल सकती है।

यहां बच्चों की मुस्कान, उनकी भागीदारी और उनका बढ़ता आत्मविश्वास इस बात का सबूत है कि सही दिशा, संवेदनशील सोच और बेहतर संसाधनों से हर बच्चा नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।

आज कश्मीर के स्कूलों से निकलती यह सकारात्मक कहानी पूरे देश को संदेश दे रही है कि शिक्षा तभी सफल है, जब उसमें हर बच्चे के लिए जगह हो। समावेशी शिक्षा ही वह रास्ता है, जो भारत के भविष्य को मजबूत, संवेदनशील और बराबरी पर आधारित बना सकता है।