जयपुर से अमरनाथ तक: नफरत के दौर में इंसानियत जोड़ता 'वर्क' का कारवां

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 29-04-2026
From Jaipur to Amarnath: The 'Work' Caravan Uniting Humanity in an Era of Hatred
From Jaipur to Amarnath: The 'Work' Caravan Uniting Humanity in an Era of Hatred

 

फरहान इसराइली/जयपुर

आज के समय में जब चारों तरफ बहस और टकराव का शोर है, जयपुर की गलियों से एक ऐसी खामोश लहर उठी है जो दिलों को जोड़ने का काम कर रही है। कभी रामनवमी के जुलूस पर फूलों की बारिश होती है, तो कभी गुरुद्वारे में लंगर की सेवा। कभी अमरनाथ की दुर्गम पहाड़ियों पर शून्य से नीचे के तापमान में श्रद्धालुओं का इलाज किया जाता है, तो कभी दीपावली पर बाजारों में जाकर खुशियां बांटी जाती हैं।

यह सब किसी फिल्मी पटकथा का हिस्सा नहीं, बल्कि 'वर्क' (World Organization of Religious and Knowledge) संस्था के कार्यकर्ताओं की रोजमर्रा की जिंदगी का सच है। राजस्थान में इस संस्था ने पिछले कुछ वर्षों में सेवा और सद्भाव की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने यह साबित कर दिया कि इंसानियत का रिश्ता हर मजहब से ऊपर है।

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संवाद की नई शुरुआत: बहसों को जीतना नहीं, दिल जीतना है

राजस्थान में वर्क संस्था के प्रवक्ता सैय्यद असगर अली की बातें बहुत गहरी हैं। वे कहते हैं कि हमारा मकसद किसी बहस को जीतकर खुद को सही साबित करना नहीं है। हम तो बस सामने वाले के दिल तक पहुंचना चाहते हैं। संस्था की फिलॉसफी बहुत सरल है कि अगर हम किसी को यह यकीन दिला दें कि हम उसके खिलाफ नहीं बल्कि उसके साथ खड़े हैं, तो नफरत की आधी दीवार वहीं गिर जाती है। यही वजह है कि दीपावली, होली, रामनवमी, गुरुनानक जयंती और क्रिसमस जैसे हर खास मौके पर संस्था के लोग एक नए उत्साह के साथ सड़कों पर नजर आते हैं।

दीपावली और होली के समय संस्था के कार्यकर्ता खुद डिजाइन किए गए ग्रीटिंग कार्ड लेकर बाजारों में निकलते हैं। वे दुकानदारों से मिलते हैं और रिश्तों की एक नई गांठ बांधते हैं। कई बार दुकानदार हैरान रह जाते हैं कि इस दौर में कोई सिर्फ दुआएं देने आया है।

वे खुश होकर मिठाई और सूखे मेवों से इनका स्वागत करते हैं। यहीं से वह बातचीत शुरू होती है जो अक्सर बंद कमरों में मुमकिन नहीं हो पाती। रामनवमी पर जब शोभायात्रा निकलती है, तो ये लोग किनारे खड़े होकर श्रद्धालुओं पर फूल बरसाते हैं। क्रिसमस पर चर्च पहुंचकर ईसा मसीह के जीवन पर आधारित किताबें बांटते हैं।

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अमरनाथ यात्रा में सेवा का अनुशासित जज्बा

साल 2018से वर्क संस्था अमरनाथ यात्रा में सेवा दे रही है। यह कोई साधारण भागीदारी नहीं है। यह बेहद अनुशासित और व्यवस्थित मॉडल है। हर साल पांच सदस्यों की एक टीम अमरनाथ भेजी जाती है। इसमें डॉक्टर और नर्स शामिल होते हैं। गृह मंत्रालय की अनुमति से चलने वाला यह मेडिकल कैंप बालटाल और रामबन जैसे सबसे कठिन रास्तों पर लगाया जाता है। यहां ऑक्सीजन की कमी और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच यात्रियों को प्राथमिक उपचार दिया जाता है।

अमरनाथ सेवा के दौरान एक यादगार वाकया 2022का है। सुरक्षा कारणों से पूरे इलाके में ब्लैकआउट कर दिया गया था और यात्रा रुकी हुई थी। माहौल में तनाव था। ऐसे में संस्था के सदस्यों ने पहल की और 15अगस्त को ध्वजारोहण कार्यक्रम आयोजित किया।

राष्ट्रभक्ति के इस जज्बे की गूंज सेना तक पहुंची। इसके बाद सेना ने खुद इन कार्यकर्ताओं को अपने आधिकारिक कार्यक्रम में आमंत्रित किया। सीमित संसाधनों में की गई इस पहल ने न केवल वहां के माहौल को सकारात्मक बनाया बल्कि राष्ट्रीय एकता का एक मजबूत संदेश भी दिया।

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इतिहास और नेतृत्व: वेदों के अध्ययन से उपजी सोच

वर्क संस्था की नींव 1988 में उत्तर प्रदेश के रामपुर में आचार्य शम्स नवेद उस्मानी ने रखी थी। आचार्य उस्मानी का व्यक्तित्व बेहद अनूठा था। वे सिर्फ इस्लामी विद्वान नहीं थे, बल्कि उन्होंने चारों वेदों का भी गहराई से अध्ययन किया था। उनकी नजर में धर्म का असली काम लोगों को बांटना नहीं बल्कि एक धागे में पिरोना था। आज इस विरासत को अल्लामा सैय्यद अब्दुल्ला तारिक आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्हें संस्था में लोग प्यार से 'गुरुजी' कहते हैं।

राजस्थान में इसकी शुरुआत 2018 में हुई। लईक हसन और एच.आर. खान के नेतृत्व में आज यह संगठन पूरे राज्य में फैला हुआ है। जयपुर में जियाउर रहमान और महिलाओं की विंग में डॉ. शहनाज, रेहाना और आलिया जैसी सक्रिय महिलाएं इस मिशन को आगे बढ़ा रही हैं। अजमेर में संस्था की 'जनता रसोई' हर हफ्ते सैकड़ों लोगों का पेट भरती है। यह सिर्फ खाना खिलाना नहीं बल्कि एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का तरीका है।

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जेल की सलाखों के पीछे उम्मीद का नाटक

संस्था का प्रभाव सिर्फ बाहरी समाज तक सीमित नहीं है। 2023में टोंक की सेंट्रल जेल में आयोजित कार्यक्रम इसकी संवेदनशीलता की गवाही देता है। जेल अधीक्षक वैभव भारद्वाज के सहयोग से करीब 500कैदियों के बीच एक कार्यक्रम रखा गया। संस्था के सदस्यों ने कैदियों से सीधा संवाद किया। उन्हें बताया गया कि त्योहार सिर्फ आजाद लोगों के लिए नहीं होते।

वहां एक नाटक का मंचन भी किया गया जिसकी पूरी तैयारी कार्यकर्ताओं ने खुद की थी। सैय्यद असगर अली ने 'गॉड' की भूमिका निभाई। नाटक का संदेश इतना मर्मस्पर्शी था कि कई सख्त कैदियों की आंखों से आंसू छलक पड़े। कैदियों ने अपराध छोड़ने की शपथ ली और अपने हाथों से फल बांटे। बाद में जेल प्रशासन को एक प्रोजेक्टर भी भेंट किया गया ताकि कैदी भजन और सकारात्मक कार्यक्रम देख सकें।

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अंगदान का क्रांतिकारी फैसला: रूहानी और इंसानी फर्ज

8अगस्त 2024को जयपुर में संस्था के स्थापना दिवस पर एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया। मुस्लिम समुदाय के 40लोगों ने सामूहिक रूप से अंगदान (Organ Donation) का संकल्प लिया। इसमें किडनी और हार्ट के साथ-साथ स्किन और बोन डोनेशन जैसे मुश्किल फैसले भी शामिल थे। लईक हसन ने खुद इस मुहिम का नेतृत्व किया। हालांकि समाज में कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए लेकिन संस्था ने धार्मिक आधार पर इसका जवाब दिया। उन्होंने कुरान की उस आयत का जिक्र किया जिसमें कहा गया है कि जिसने एक जान बचाई, उसने पूरी इंसानियत को बचाया। इस पहल ने साबित किया कि मरने के बाद भी इंसान किसी के काम आ सकता है।

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सड़क, पर्यावरण और जीव सेवा: हर जगह सक्रिय

वर्क संस्था के कार्यकर्ता सिर्फ मंचों पर नहीं दिखते, वे सड़कों पर ट्रैफिक नियंत्रित करते हुए भी नजर आते हैं। 'सुरक्षित घर पहुंचें, आपका कोई इंतजार कर रहा है' जैसे संदेशों के साथ वे ट्रैफिक पुलिस का सहयोग करते हैं। दुर्घटनाएं कम करने के लिए वे आवारा गायों के गले में रेडियम पट्टियां बांधते हैं ताकि रात के अंधेरे में वे साफ नजर आ सकें।

पर्यावरण के लिए उन्होंने हजारों 'सीड बॉल' तैयार कर जंगलों में फेंकी हैं। नाहरगढ़ और आमेर जैसे क्षेत्रों में सफाई अभियान चलाए हैं। लंपी बीमारी के दौरान जब गायें दम तोड़ रही थीं, तब संस्था ने एक लाख आयुर्वेदिक लड्डू तैयार कर उन्हें खिलाए। यह निस्वार्थ सेवा ही है जो उन्हें भीड़ में अलग पहचान दिलाती है।

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संवाद का मंच और नवजात का स्वागत

संस्था के कार्यक्रमों में अक्सर विरोधी विचारधारा के लोग भी साथ बैठे नजर आते हैं। आरएसएस के प्रतिनिधि, पत्रकार और डॉक्टर एक ही मेज पर बैठकर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते हैं। इसके अलावा 12रबी-उल-अव्वल के मौके पर संस्था एक बेहद प्यारा काम करती है। कार्यकर्ता अस्पतालों में जाकर उस दिन जन्मे बच्चों का डेटा लेते हैं। इसमें धर्म नहीं देखा जाता। उन परिवारों को उपहार दिए जाते हैं और बाद में उन्हें सम्मानित किया जाता है।

वर्क संस्था की कहानी संसाधनों की नहीं, बल्कि छोटे-छोटे प्रयासों की कहानी है। यह उन लोगों की कहानी है जो अंधेरे को कोसने के बजाय खुद दीया बनने में यकीन रखते हैं। चाहे वो जेल हो, सड़क हो या मंदिर का जुलूस, हर जगह यह संस्था एक ही संदेश दे रही है कि इंसानियत का रिश्ता सबसे पुराना और सबसे बड़ा है।