शतानंद भट्टाचार्य / सिलचर
असम की मिट्टी में कुछ तो खास है। यहाँ की बराक घाटी, जिसे अक्सर लोग पिछड़ा मान लेते हैं, उसी जमीन ने दुनिया को एक ऐसा हीरा दिया है जिसकी चमक आज सात समंदर पार ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दिखाई दे रही है। यह कहानी डॉ. फजलुर रहमान तालुकदार की है। वे आज सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की एक किरण बन गए हैं जो छोटे शहरों के सरकारी स्कूलों में पढ़कर बड़े सपने देखते हैं।

डॉ. फजलुर रहमान का जन्म श्रीभूमि जिले (पुराना नाम करीमगंज) के बदरपुर में हुआ। आज वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में जीनोमिक्स पढ़ा रहे हैं और कैंसर जैसे जानलेवा रोग पर शोध कर रहे हैं। लेकिन यहाँ तक पहुँचने का रास्ता फूलों की सेज नहीं था।
डॉ. रहमान के पिता महमूदुर रहमान, जो खुद हिंदुस्तान पेपर कॉर्पोरेशन में महाप्रबंधक के पद पर रहे, बताते हैं कि फजलुर में बचपन से ही एक अलग तरह की बेचैनी थी। वह बेचैनी कुछ नया सीखने और दुनिया को करीब से समझने की थी।
जब फजलुर ग्यारहवीं कक्षा में थे, तभी उन्होंने अपने पिता से कह दिया था कि उन्हें वैज्ञानिक बनना है। उस समय बदरपुर जैसे इलाके में बैठकर ग्लोबल साइंटिस्ट बनने की बात करना कई लोगों को किसी परीकथा जैसा लगता था। संसाधनों की कमी थी और सुविधाएं बेहद सीमित थीं।
लेकिन फजलुर ने कभी मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद असम विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री ली। यही वह समय था जब उनके भीतर कैंसर रिसर्च को लेकर एक गहरी समझ विकसित होने लगी थी।
डॉ. फजलुर ने अपने शोध में उस सवाल का जवाब ढूंढना शुरू किया जो आज पूरी दुनिया को डराता है। आखिर कैंसर क्यों होता है। क्या हमारे खान-पान और बिगड़ती जीवनशैली का इससे सीधा संबंध है।
उन्होंने असम की स्थानीय परिस्थितियों और वहाँ के लोगों में होने वाले कैंसर के मामलों पर बारीकी से गौर किया। उनकी इसी लगन का नतीजा था कि उन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ की 'अंतर्राष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी' में काम करने का न्यौता मिला।
वहाँ जाकर डॉ. रहमान ने दुनिया भर के चोटी के वैज्ञानिकों के साथ हाथ मिलाया। उन्होंने आधुनिक तकनीक और डेटा के जरिए यह समझने की कोशिश की कि पर्यावरण में हो रहे बदलाव इंसानी कोशिकाओं को कैसे प्रभावित कर रहे हैं।
उनके शोध के नतीजे आज दुनिया की बड़ी-बड़ी मेडिकल जर्नल में छप रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस बात का कायल है कि एक छोटे से कस्बे से निकलकर आया यह वैज्ञानिक कैंसर की रोकथाम के लिए कितनी सटीक नीतियां बनाने में मदद कर रहा है।
डॉ. रहमान का काम मुख्य रूप से जीनोमिक्स पर आधारित है। सरल शब्दों में कहें तो वे यह पता लगाते हैं कि हमारे जीन और आसपास का प्रदूषण मिलकर शरीर के भीतर कैंसर की जड़ें कैसे जमाते हैं। उनके पिता महमूदुर रहमान आज गर्व से भर जाते हैं जब वे अपने बेटे की उपलब्धियों को देखते हैं। उनका कहना है कि फजलुर ने साबित कर दिया कि अगर आपके पास प्रतिभा है और आप कड़ी मेहनत करने से नहीं डरते, तो दुनिया का कोई भी मुकाम आपसे दूर नहीं है।
असम और खासकर बराक घाटी के लिए यह गौरव का क्षण है। अक्सर यहाँ के युवा रोजगार के लिए दिल्ली या मुंबई की ओर देखते हैं, लेकिन फजलुर ने अपनी मेधा से वैश्विक मानचित्र पर अपनी जगह बनाई है।
उनकी सफलता उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो मानते हैं कि असम के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभा की कमी है। डॉ. फजलुर ने यह दिखाया है कि शोध केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की भलाई और मानवता को बचाने का एक जरिया है।
कैम्ब्रिज में पढ़ाते हुए भी वे अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं। वे आज भी असम की उसी माटी को अपनी सफलता का आधार मानते हैं। डॉ. फजलुर के शोध का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि वे कैंसर को केवल एक बीमारी नहीं बल्कि एक सामाजिक समस्या के रूप में देखते हैं। वे अपनी रिसर्च के जरिए ऐसी नीतियां बनाने पर जोर देते हैं जिससे आम आदमी को इस बीमारी के चंगुल से बचाया जा सके।

यह सफर अभी थमा नहीं है। डॉ. फजलुर रहमान तालुकदार का मिशन अभी जारी है। कैंसर के क्षेत्र में वे रोज नई खोज कर रहे हैं। उनकी इस कामयाबी ने न केवल उनके परिवार का नाम रोशन किया है, बल्कि पूरे भारत का सर गर्व से ऊंचा कर दिया है। बदरपुर की उन गलियों से लेकर कैम्ब्रिज के भव्य कमरों तक का यह सफर साहस, लगन और अटूट विश्वास की एक जिंदा मिसाल है। आने वाली पीढ़ियां जब भी कैंसर विज्ञान का जिक्र करेंगी, डॉ. फजलुर का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाएगा।