धूल भरी गलियों से ग्लोरी तक: सबा अंजुम करीम की प्रेरणादायक हॉकी यात्रा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 07-04-2026
Amid hardships, dreams were born… From dusty lanes and broken sticks, Saba Anjum became the speedy forward of Indian hockey
Amid hardships, dreams were born… From dusty lanes and broken sticks, Saba Anjum became the speedy forward of Indian hockey

 

मंदकिनी मिश्रा/ रायपुर

दुर्ग के ‘केलाबाड़ी’ इलाके की तंग गलियों में, एक 9 साल की लड़की लड़कों के साथ हॉकी खेलती नज़र आती थी। उसके पास न तो महंगे जूते थे और न ही अपनी कोई हॉकी स्टिक। मैदान पर उतरने के लिए वह अपने बड़े भाई की पुरानी, ​​टूटी हुई स्टिक का इस्तेमाल करती थी, जिस पर टेप लिपटा होता था। उसके पिता एक स्थानीय मस्जिद में मुअज़्ज़िन का काम करते थे। परिवार की आमदनी इतनी कम थी कि कभी-कभी दिन में एक वक्त का खाना बनाना भी मुश्किल हो जाता था। जब उसने हॉकी को अपना जुनून बनाने का फैसला किया, तो समाज ने उसका मज़ाक उड़ाया  “एक लड़की शॉर्ट्स पहनकर खेलेगी?” लेकिन उसके पिता पक्के इरादे वाले थे कि उनकी बेटी अपनी किस्मत खुद लिखेगी। यह कहानी है सबा अंजुम करीम की — वह लड़की जो छत्तीसगढ़ की धूल भरी गलियों से निकलकर वैश्विक खेल मैदानों पर तिरंगा फहराने तक का सफर तय किया।
 

‘गुड़ और चने’ के शौक में खेलना शुरू किया, आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली

भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व फॉरवर्ड खिलाड़ी सबा अंजुम बताती हैं कि जब उन्होंने खेलना शुरू किया था, तब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके पिता मस्जिद में मुअज़्ज़िन का काम करते थे, जबकि उनकी माँ घर-खर्च चलाने के लिए काम करती थीं। एक बार, खेल के मैदान में लगे एक समर कैंप के दौरान, बच्चों को खेलने के बाद गुड़ और चने दिए जाते थे। उसने यह सोचकर खेलना शुरू किया कि उसे भी गुड़ और चने मिलेंगे। इसी सोच के साथ उसने अपने खेल के सफर की शुरुआत की। बाद में, एक दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमें उसने हिस्सा लिया और पहला स्थान हासिल किया। इनाम के तौर पर उसे एक हॉकी स्टिक मिली। वह पल उसके लिए हॉकी खेलना जारी रखने की प्रेरणा बन गया।
 
बाद में उसके स्कूल ने नेहरू हॉकी टूर्नामेंट में हिस्सा लिया, जिसके बाद उसका चयन भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए हो गया। उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने 1999 में नेहरू हॉकी कप खेला। 2002 से 2012 तक, वह भारतीय राष्ट्रीय हॉकी टीम की सदस्य रहीं और कई प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान, उसने भारतीय टीम की कप्तानी भी की। उसका बड़ा भाई भी राष्ट्रीय स्तर का हॉकी खिलाड़ी था। जब कोच ने एक बार उन्हें टीम से बाहर कर दिया था। 
 
 
12 जून 1985 को जन्मी सबा अंजुम ने बताया कि 1997 में, एक मैच के दौरान, उनके कोच ने उन्हें खेलने से रोक दिया था और टीम में उन्हें दूसरा मौका नहीं दिया। उस समय वह सिर्फ़ 11 साल की थीं। उनके पिता कोच के पास गए और उनसे गुज़ारिश की कि वे उनकी बेटी को खेलने का एक और मौका दें। वह पल उनकी यादों में आज भी बहुत खास है। उनके पिता कोच से मिन्नतें कर रहे थे कि उन्हें खेलने दिया जाए। इस घटना ने उन्हें खेलना जारी रखने और अपने खेल में सुधार करने के लिए प्रेरित किया। वह दिन उनकी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ बन गया।
 
 
सामाजिक रुकावटें थीं, लेकिन परिवार का साथ मज़बूत रहा

पद्म श्री से सम्मानित सबा अंजुम बताती हैं कि अपने बचपन के दिनों में, जब वह खेलकर घर लौटती थीं, तो उनके पिता मस्जिद में काम कर रहे होते थे। वह मस्जिद के बाहर उनका इंतज़ार करती थीं ताकि वह बाहर आएं और उनके लिए काजू, किशमिश या खाने-पीने की कुछ चीज़ें खरीदकर दें। वह अक्सर मस्जिद के बाहर बैठकर उनका इंतज़ार किया करती थीं। वह याद आज भी उनके दिल के बहुत करीब है। अर्जुन पुरस्कार विजेता इस खिलाड़ी के अनुसार, कुछ सामाजिक रुकावटें भी थीं, क्योंकि वह एक मुस्लिम परिवार से आती थीं। लेकिन उनके माता-पिता ने हमेशा उनका साथ दिया। उन्होंने हर कदम पर उन्हें खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। जब उनका चयन भारतीय टीम के लिए हुआ, तो आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अपना पासपोर्ट बनवाने में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उस समय, उनकी माँ ने तो उनके पासपोर्ट के लिए पैसे जुटाने की खातिर घर के बर्तन तक बेच दिए थे। उनके माता-पिता ने उनके भविष्य के लिए अनगिनत कुर्बानियाँ दीं।
 
खेलों की वजह से DSP के पद पर नियुक्ति; युवाओं के लिए संदेश

एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (ASP) के तौर पर काम कर रहीं सबा अंजुम ने बताया कि जब वह भारतीय टीम में शामिल हुईं, तो उन्हें सीनियर खिलाड़ियों से प्रेरणा मिली। उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने और एक दिन भारतीय हॉकी टीम की कप्तान बनने की प्रेरणा मिली। हॉकी ने उन्हें ज़िंदगी में बहुत कुछ दिया। उन्हें अर्जुन अवॉर्ड और पद्म श्री अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस में DSP के पद पर भी नियुक्त किया गया। उन्होंने युवाओं को एक साफ़ संदेश दिया चाहे वे खिलाड़ी हों या छात्र, उन्हें अपनी क्षमता को पहचानना चाहिए और उसे बेहतर बनाने के लिए लगातार काम करना चाहिए। सफलता केवल कड़ी मेहनत से ही मिलती है। कड़ी मेहनत आपको एक अनोखी पहचान दिलाती है। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता; केवल लगन ही आपको आगे ले जाती है।
 
मैदान पर 'सुनहरी चिड़िया' का उदय: एक तेज़-तर्रार फॉरवर्ड के तौर पर पहचान

रायपुर में पढ़ी-लिखी सबा अंजुम भारतीय महिला हॉकी टीम की एक नियमित सदस्य थीं। विंग्स पर तेज़ी से दौड़ने और गेंद को गोलपोस्ट की ओर ले जाने की उनकी काबिलियत ने उन्हें एक अनोखी पहचान दिलाई। साल 2002 में, पूरी दुनिया मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स देख रही थी। सत्रह साल की सबा भारतीय टीम की सबसे कम उम्र की खिलाड़ी थीं। जब भारत ने फ़ाइनल में गोल्ड मेडल जीता, तो वह रातों-रात स्टार बन गईं। उन्होंने न सिर्फ़ गोल किए, बल्कि अपनी रफ़्तार से विरोधी टीम के डिफेंस को भी भेद दिया। उसके बाद भी सफलता का सिलसिला जारी रहा। चाहे वह 2004 का एशिया कप गोल्ड हो या 2011 में भारतीय टीम की कप्तानी, उन्होंने हर पड़ाव पर खुद को साबित किया। 200 इंटरनेशनल मैचों में 92 गोल करना उनकी काबिलियत और हुनर ​​का सबूत है।
 
 
मैदान से वर्दी तक का सफ़र

हॉकी के मैदान पर अपनी चमक बिखेरने के बाद, भारत सरकार ने उन्हें अर्जुन अवॉर्ड (2013) और पद्म श्री (2015) से सम्मानित किया। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी उनकी उपलब्धियों को सराहा और उन्हें पुलिस विभाग में नियुक्त किया। आज, जब सबा अपनी पुलिस की वर्दी पहनती हैं, तो वह सिर्फ़ एक अफ़सर ही नहीं, बल्कि मुश्किल हालात में जी रही हज़ारों लड़कियों के लिए उम्मीद की एक किरण बन जाती हैं। दुर्ग में उसी खेल के मैदान के पास, जो लोग कभी उनका मज़ाक उड़ाते थे, आज वही लोग गर्व से उन्हें सेल्यूट करते हैं।
 
 
 
 
 
 
मुख्य जानकारी और उपलब्धियाँ

शुरुआती करियर: साल 2000 में 15 साल की उम्र में, हांगकांग में हुए U-18 AHF कप से अपने इंटरनेशनल करियर की शुरुआत की। राष्ट्रमंडल खेल: 2002 के मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे कम उम्र की खिलाड़ी, जहाँ भारत ने स्वर्ण पदक जीता था। 2006 के मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में भी हिस्सा लिया। सबाअंजुम करीम, जन्म 12 जून 1985, छत्तीसगढ़ की रहने वाली, भारतीय महिला हॉकी टीम की प्रमुख खिलाड़ी रही हैं।
 
उन्होंने 2002 से 2012 तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए देश का नाम रोशन किया। उनके करियर की प्रमुख उपलब्धि 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतना रही। इसके अलावा, 2004 के एशिया कप में उन्होंने स्वर्ण और 2006 के दोहा एशियाई खेलों में कांस्य पदक भी जीते। उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2013 में अर्जुन पुरस्कार और 2015 में पद्म श्री से सम्मानित किया। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी उन्हें राज्य का सर्वोच्च खेल सम्मान, गुंडाधुर पुरस्कार, प्रदान किया। खेल के क्षेत्र में अपार सफलता के बाद, आज वह छत्तीसगढ़ पुलिस में पुलिस उपाधीक्षक (ASP) के पद पर कार्यरत हैं और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।