जयपुर की मदीना मस्जिद: जहाँ दुबई की भव्यता और तुर्की की कला का संगम दिखता है

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 06-04-2026
Jaipur's Madina Mosque: Where the Grandeur of Dubai Meets the Artistry of Türkiye
Jaipur's Madina Mosque: Where the Grandeur of Dubai Meets the Artistry of Türkiye

 

फरहान इसराइली/ जयपुर

राजस्थान की गुलाबी नगरी अपनी ऐतिहासिक विरासतों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन इसी शहर के एक कोने में आधुनिक वास्तुकला की एक नई इबारत लिखी गई है। जयपुर के शास्त्री नगर इलाके में नाहरी का नाका की तंग गलियों के बीच से गुजरते हुए अचानक एक ऊँचा और चमकता हुआ गुंबद दिखाई देता है। यह मदीना मस्जिद है। यह मस्जिद आज केवल इबादत की जगह नहीं है। यह आधुनिक सोच और तालीम का एक चमकता हुआ केंद्र बन चुकी है। पिछले 53 सालों में इस मस्जिद ने एक बहुत लंबा सफर तय किया है। एक छोटी सी कच्ची कोठरी से शुरू हुई यह यात्रा आज पाँच मंज़िला आलीशान इमारत तक पहुँच गई है।

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मदीना मस्जिद की कहानी दरअसल उस मोहल्ले के आम लोगों के जज्बे की कहानी है। करीब पांच दशक पहले यहाँ की आबादी बहुत कम थी। यह इलाका ज्यादातर कच्ची बस्ती के रूप में जाना जाता था। उस समय यहाँ रहने वाले लोगों ने अपनी छोटी सी जमापूंजी से एक इबादतगाह की नींव रखी थी।

fउस दौर में मस्जिद इतनी छोटी थी कि एक साथ सिर्फ पचास लोग ही नमाज़ पढ़ पाते थे। जैसे-जैसे वक्त बीता और आबादी बढ़ी वैसे-वैसे मस्जिद की ज़रूरत भी बढ़ती गई। मोहल्ले के लोगों ने धीरे-धीरे आसपास की जमीन खरीदी। सबकी मेहनत का ही नतीजा था कि मस्जिद का दायरा बढ़कर करीब 480 गज तक पहुँच गया।

मस्जिद के नायब सदर हाजी सईद अहमद खान बताते हैं कि साल 2020 का दौर इस मस्जिद के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। पूरी दुनिया कोरोना महामारी और लॉकडाउन की मार झेल रही थी। मस्जिद करीब तीन महीने तक बंद रही। इसी शांति के दौरान जब इमारत की बारीकी से जांच की गई तो चौंकाने वाली बात सामने आई।

fमस्जिद के पुराने पिलरों और नीचे के बीम में गहरी दरारें आ चुकी थीं। इमारत अंदर से कमज़ोर हो रही थी।

मस्जिद कमेटी ने एक बड़ा और साहसी फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि पुरानी इमारत को पूरी तरह हटाकर नए सिरे से तामीर की जाए। मकसद सिर्फ एक था कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मज़बूत और सुरक्षित जगह तैयार हो।

इसके बाद आधुनिक वास्तुकला और तकनीक का सहारा लिया गया। आर्किटेक्ट से एक ऐसा नक्शा तैयार कराया गया जो न केवल मज़बूत हो बल्कि दिखने में भी बेमिसाल हो।

करीब पांच साल की कड़ी मेहनत और मोहल्ले के लोगों के सहयोग के बाद आज यह मस्जिद पूरी तरह तैयार है। मस्जिद की नई इमारत को देखकर ऐसा लगता है जैसे आप जयपुर में नहीं बल्कि दुबई या तुर्की की किसी गलियारे में खड़े हों।

इस मस्जिद की बनावट में अंतरराष्ट्रीय स्तर की झलक मिलती है। स्थानीय निवासी कारी मोहम्मद इस्हाक बताते हैं कि मस्जिद के अंदरूनी हिस्से यानी इंटीरियर के लिए दुबई की मशहूर जुमेराह मस्जिद से प्रेरणा ली गई है। वहीं इसका मुख्य गुंबद तुर्की की ऐतिहासिक ब्लू मस्जिद की याद दिलाता है।

मस्जिद की ऊँचाई करीब 95 फुट है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यहाँ कुदरती रोशनी और हवा का भरपूर इंतजाम रहे। दिन के वक्त यहाँ बिजली जलाने की ज़रूरत लगभग न के बराबर पड़ती है। वेंटिलेशन इतना शानदार है कि बड़ी भीड़ होने के बावजूद नमाज़ियों को घुटन महसूस नहीं होती।

gआज मदीना मस्जिद में एक साथ करीब 2500 नमाज़ी इबादत कर सकते हैं। मस्जिद के बेसमेंट में ही 600 लोगों के बैठने का इंतजाम है।

यहाँ सुविधाओं का भी पूरा ख्याल रखा गया है। वुज़ूखाना और नमाज़ की जगह को बहुत व्यवस्थित तरीके से अलग किया गया है।

पानी के इंतजाम के लिए यहाँ 16 हजार लीटर का बड़ा टैंक बनाया गया है।

सुरक्षा के लिहाज से पूरी इमारत सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में है। बुज़ुर्गों की सहूलियत के लिए यहाँ लिफ्ट भी लगाई गई है। आने वाले वक्त में यहाँ सोलर प्लांट और वॉटर हार्वेस्टिंग जैसी आधुनिक तकनीकें भी जोड़ी जा रही हैं।

मदीना मस्जिद सिर्फ नमाज़ पढ़ने तक सीमित नहीं है। इसके परिसर में 'मदरसा मोईन-उल-इस्लाम' संचालित होता है। यह मदरसा राजस्थान मदरसा बोर्ड से रजिस्टर्ड है। साल 2004 से यहाँ व्यवस्थित पढ़ाई शुरू हुई थी। आज यहाँ करीब 700 से 800 बच्चे तालीम ले रहे हैं।

सबसे सुखद बात यह है कि यहाँ लड़कों से ज्यादा लड़कियों की संख्या है। हर साल यहाँ से 30 से 40 लड़कियां आलिमा का कोर्स पूरा करती हैं। अब तक यहाँ से दर्जनों बच्चे हाफ़िज़ और आलिमा बनकर निकल चुके हैं। मदरसे में 21 शिक्षक बच्चों को दीनी और दुनियावी दोनों तरह की शिक्षा देते हैं।

मदरसे के मैनेजमेंट की एक और बड़ी खूबी है। इसका पूरा सिस्टम आत्मनिर्भर है। यहाँ के खर्चों के लिए ज़कात या खैरात की राशि का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

बच्चों की फीस और कमेटी के प्रबंधन से ही शिक्षकों का वेतन और अन्य खर्चे पूरे होते हैं। मस्जिद की देखरेख के लिए 11 सदस्यों की एक सक्रिय कमेटी है। हाजी रमज़ान कुरैशी इसके सदर हैं और उनकी टीम दिन-रात इसकी बेहतरी के लिए काम करती है।

आधे दशक का यह सफर दिखाता है कि अगर नियत साफ हो और समाज साथ खड़ा हो तो कोई भी सपना साकार हो सकता है। मदीना मस्जिद आज नाहरी का नाका इलाके की धार्मिक और शैक्षिक पहचान बन चुकी है।

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यह उन लोगों के लिए एक मिसाल है जो कहते हैं कि पुरानी परंपराएं आधुनिकता के साथ नहीं चल सकतीं। यहाँ इबादत के साथ-साथ आने वाली नस्लों को बेहतर इंसान बनाने की तालीम दी जा रही है। यह मस्जिद जयपुर के सीने पर एक ऐसा नगीना है जो आने वाले कई दशकों तक रोशनी देता रहेगा।