रेडियो मानू: जब पढ़ाई के साथ गूंजने लगे थियेटर और दास्तानगोई के सुर

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 11-04-2026
Radio Manu: When the tunes of theatre and storytelling resonated with studies
Radio Manu: When the tunes of theatre and storytelling resonated with studies

 

मलिक असगर हाशमी/नई दिल्ली

शिक्षा के क्षेत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालयों का नाम आते ही जेएनयू, डीयू या बीएचयू जैसे संस्थानों का जिक्र होता है। ये संस्थान अपनी पढ़ाई और रिसर्च के लिए पूरी दुनिया में पहचाने जाते हैं। लेकिन दक्षिण भारत के हैदराबाद में स्थित मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी यानी मानू अपनी एक अलग और बेहद दिलचस्प पहचान बना रही है। यह पहचान है उनका अपना कम्युनिटी रेडियो। रेडियो मानू 90.0 एफएम सिर्फ एक फ्रीक्वेंसी नहीं है, बल्कि यह युवाओं के सपनों, उनकी रचनात्मकता और समाज के प्रति उनकी सजगता का एक बड़ा मंच बन गया है।

आमतौर पर यूनिवर्सिटी रेडियो का इस्तेमाल सिर्फ घोषणाओं या लेक्चर्स के लिए किया जाता है। मगर मानू ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। यहाँ का रेडियो स्टेशन किसी मंझे हुए प्रोफेशनल रेडियो स्टेशन की तरह काम करता है।

इसमें थियेटर की दुनिया से लेकर इब्ने सफी की जासूसी कहानियों तक, सब कुछ शामिल है। यह देश की इकलौती ऐसी यूनिवर्सिटी है जहां युवाओं की पसंद को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रमों की इतनी विविधतापूर्ण श्रृंखला चलाई जा रही है। खास बात यह है कि ये कार्यक्रम न केवल रेडियो पर सुने जा सकते हैं, बल्कि अगले दिन इन्हें यूट्यूब पर पॉडकास्ट के तौर पर भी पेश किया जाता है।

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थियेटर की दुनिया और पर्दे के पीछे के कलाकार

यूनिवर्सिटी के रेडियो पर हर मंगलवार सुबह 11बजे एक खास रौनक होती है। इस कार्यक्रम का नाम है 'थियेटर की दुनिया'। हम अक्सर स्टेज पर कलाकारों को अभिनय करते देखते हैं और तालियां बजाकर घर चले जाते हैं। लेकिन उस अभिनय के पीछे कितनी मेहनत है, कलाकार का अपना संघर्ष क्या है और एक नाटक कैसे तैयार होता है, यह हमें अक्सर पता नहीं चलता।

'थियेटर की दुनिया' में रंगमंच के कलाकारों के साथ लंबी और गहरी बातचीत की जाती है। वे अपनी यात्रा साझा करते हैं। वे बताते हैं कि एक खास किरदार को निभाने के लिए उन्होंने खुद को कैसे तैयार किया। पर्दे के पीछे की वे कहानियाँ और रचनात्मक प्रक्रियाएं युवाओं को कला की बारीकियां समझने में मदद करती हैं। जो लोग शाम को बिजी होते हैं, उनके लिए शाम 6बजे इसे दोबारा प्रसारित किया जाता है।

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काबुलीवाला: दास्तानगोई की पुरानी यादें

गुरुवार का दिन मानू के रेडियो पर सांस्कृतिक विरासत के नाम होता है। सुबह साढ़े दस बजे 'काबुलीवाला' कार्यक्रम शुरू होता है। इसका मकसद दास्तानगोई की उस प्राचीन और खूबसूरत कला को फिर से जीवित करना है जो धीरे-धीरे लुप्त हो रही थी। दास्तानगोई यानी किस्सागोई का वह अंदाज जिसमें कहने वाला अपनी आवाज और भावों से पूरा समां बांध देता है।

इस कार्यक्रम के जरिए पुरानी कहानियों, लोक कथाओं और सांस्कृतिक धरोहरों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा रहा है। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का एक जरिया है। जब कोई दास्तानगो अपनी लच्छेदार जुबान में किस्सा शुरू करता है, तो सुनने वाला उस दौर में पहुंच जाता है।

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सलाम सिनेमा और जासूसी की रोमांचक दुनिया

सिनेमा प्रेमियों के लिए गुरुवार की सुबह 11बजे 'सलाम सिनेमा' का वक्त होता है। यहाँ सिर्फ नई फिल्मों की चर्चा नहीं होती, बल्कि सिनेमा के उस जादू को समझा जाता है जिसने समाज पर असर डाला है। पुरानी क्लासिक फिल्मों से लेकर शानदार किरदारों तक, यहाँ हर उस शख्सियत को सलाम किया जाता है जिसने पर्दे पर अपनी छाप छोड़ी है।

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वहीं, बुधवार की सुबह 10 बजे का वक्त उन लोगों के लिए है जो रोमांच और रहस्य पसंद करते हैं। कार्यक्रम का नाम है 'जासूसी दुनिया'। अगर आप इब्ने सफी के नाम से वाकिफ हैं, तो आप जानते होंगे कि उनकी कहानियों में किस कदर का सस्पेंस होता है। रेडियो मानू इस कार्यक्रम के जरिए कर्नल फरीदी और कैप्टन हमीद जैसे किरदारों को फिर से जिंदा कर रहा है। सस्पेंस और थ्रिल से भरी ये कहानियां युवाओं को रेडियो से चिपके रहने पर मजबूर कर देती हैं।

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समाज की चिंता और ज्ञान का विस्तार

रेडियो मानू सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। 'सोसाइटी मैटर्स' जैसे कार्यक्रम समाज की कड़वी सच्चाइयों और उनके समाधान पर बात करते हैं। हर गुरुवार सुबह 10बजे होने वाले इस प्रोग्राम में विशेषज्ञों की राय ली जाती है। आम लोगों की समस्याओं को आवाज दी जाती है। मकसद सिर्फ समस्या बताना नहीं, बल्कि सकारात्मक बदलाव के लिए रास्ता दिखाना है।

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इसी तरह 'द ग्रेट डिस्कवरी' प्रोग्राम हर शुक्रवार सुबह 10बजे ज्ञान की एक नई खिड़की खोलता है। इसमें उन आविष्कारों और खोजों की कहानी सुनाई जाती है जिन्होंने इंसानी सभ्यता को बदल दिया। चाहे वह आग की खोज हो या आधुनिक इंटरनेट की कहानी, यह प्रोग्राम बच्चों और युवाओं में जिज्ञासा पैदा करता है।

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अदबनामा: जुबानों का संगम

यूनिवर्सिटी की रूह उसकी भाषा में बसती है। 'अदबनामा' एक ऐसा ही कार्यक्रम है जो हर मंगलवार सुबह साढ़े ग्यारह बजे प्रसारित होता है। यह सिर्फ उर्दू का कार्यक्रम नहीं है। इसमें हिंदी, अंग्रेजी, फारसी और अरबी जैसी भाषाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहाँ कविताएं पढ़ी जाती हैं, साहित्य पर चर्चा होती है और शब्दों की खूबसूरती को महसूस किया जाता है। यह कार्यक्रम बताता है कि भाषाएं दूरियां नहीं बढ़ातीं, बल्कि दिलों को जोड़ती हैं।

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रेडियो मानू की यह पूरी कवायद दिखाती है कि एक यूनिवर्सिटी सिर्फ डिग्री बांटने का केंद्र नहीं होनी चाहिए। उसे एक ऐसा जीवंत समुदाय होना चाहिए जो कला, साहित्य, विज्ञान और समाज को एक साथ लेकर चले। हैदराबाद की गलियों से गूंजती ये आवाजें अब इंटरनेट के जरिए दुनिया भर में सुनी जा रही हैं। यह आधुनिकता और परंपरा का एक बेहतरीन तालमेल है।

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छात्रों के लिए यह रेडियो स्टेशन एक ट्रेनिंग ग्राउंड की तरह भी है। यहाँ वे बोलना सीखते हैं, कंटेंट लिखना सीखते हैं और तकनीकी बारीकियों को समझते हैं। जब एक छात्र माइक के सामने बैठकर 'आदाब' कहता है, तो वह सिर्फ एक शब्द नहीं बोलता, बल्कि वह एक पूरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।

मानू का यह सोशल रेडियो आज के दौर में एक मिसाल है। जहाँ सोशल मीडिया पर शोर ज्यादा है, वहां रेडियो मानू बहुत शांति और सलीके से ज्ञान और कला की खुशबू बिखेर रहा है। यह एक ऐसी कोशिश है जिसे हर यूनिवर्सिटी को अपनाना चाहिए ताकि शिक्षा किताबों से बाहर निकलकर समाज की धड़कन बन सके।