पाकिस्तान में शिक्षा संकट: 2.5 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 07-07-2026
Pakistan's education emergency falters as more than 25 million children remain out of school
Pakistan's education emergency falters as more than 25 million children remain out of school

 

लाहौर [पाकिस्तान]
 
जियो न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में स्कूल जाने की उम्र वाले 2.5 करोड़ (25 मिलियन) से ज़्यादा बच्चे शिक्षा प्रणाली से बाहर हैं। सरकार द्वारा दो साल से भी पहले 'राष्ट्रीय शिक्षा आपातकाल' घोषित किए जाने के बावजूद ऐसा है, जो नीति को लागू करने और शासन-प्रशासन में गंभीर विफलताओं को उजागर करता है। जियो न्यूज़ के मुताबिक, सिविल सर्विसेज एकेडमी (CSA) द्वारा तैयार की गई एक नीति समीक्षा में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि पाकिस्तान का शिक्षा संकट अब योजना की कमी के कारण नहीं, बल्कि खराब क्रियान्वयन, कमजोर संस्थानों, अपर्याप्त फंडिंग, बिखरे हुए प्रशासन और संघीय व प्रांतीय अधिकारियों के बीच अप्रभावी समन्वय के कारण है।
 
रिपोर्ट का अनुमान है कि वर्तमान में 2.51 करोड़ से 2.6 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जिससे पाकिस्तान दुनिया में स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन गया है। हालांकि प्रांतों ने 'राष्ट्रीय शिक्षा कार्य योजना 2026' के तहत शिक्षा के लिए रोडमैप तैयार किए हैं, लेकिन समीक्षा में कहा गया है कि शासन की विफलताओं और क्रियान्वयन में बढ़ती कमियों के कारण ये वादे काफी हद तक सार्थक प्रगति में नहीं बदल पाए हैं।
 
पंजाब में स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है, जहाँ 90 लाख (9 मिलियन) से ज़्यादा बच्चे प्रभावित हैं, जबकि सिंध में मिडिल और सेकेंडरी स्कूलों की कमी के कारण ड्रॉपआउट (स्कूल छोड़ने) की दर बहुत ज़्यादा है। खैबर पख्तूनख्वा सुरक्षा चुनौतियों, दुर्गम इलाकों और महिला शिक्षकों की कमी (खासकर दूरदराज के जिलों में) से जूझ रहा है। बलूचिस्तान सबसे बुरी तरह प्रभावित प्रांत बना हुआ है, जहाँ हजारों स्कूल काम नहीं कर रहे हैं और बिजली, स्वच्छता व बुनियादी ढांचे की भारी कमी है।
 
CSA रिपोर्ट का तर्क है कि दशकों से कम निवेश, तेजी से बढ़ती आबादी, गरीबी और बाल श्रम ने धीरे-धीरे लाखों बच्चों को कक्षाओं से बाहर धकेल दिया है। जियो न्यूज़ के अनुसार, रिपोर्ट में कमजोर डेटा सिस्टम पर भी प्रकाश डाला गया है और कहा गया है कि एक एकीकृत राष्ट्रीय छात्र डेटाबेस की कमी के कारण अधिकारी नामांकन और ड्रॉपआउट को सही ढंग से ट्रैक नहीं कर पाए हैं।
 
समीक्षा में नादरा (NADRA) रिकॉर्ड से जुड़े देशव्यापी छात्र रजिस्टर बनाने, डबल-शिफ्ट स्कूलों का विस्तार करने, गैर-औपचारिक शिक्षा में सुधार करने, कम सुविधा वाले क्षेत्रों में महिला शिक्षकों के लिए प्रोत्साहन बढ़ाने और प्रदर्शन-आधारित शिक्षा फंडिंग शुरू करने की सिफारिश की गई है। जियो न्यूज़ की रिपोर्ट में उल्लिखित शिक्षा विशेषज्ञों ने लगातार सरकारों को दोषी ठहराया है कि वे पर्याप्त संसाधनों के बिना बार-बार शिक्षा आपातकाल की घोषणा करती रही हैं।