Oil market in turmoil amid attacks on Iran, raising concerns over energy security
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
ईरान पर इजराइल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के बाद वैश्विक तेल बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
तेल आपूर्ति में वास्तविक बाधा आने से पहले ही दाम चढ़ने लगे हैं, क्योंकि बाजार को आशंका है कि रणनीतिक रूप से अहम होरमुज़ जलडमरूमध्य प्रभावित हो सकता है।
दुनिया में तेल का जितना व्यापार होता है उसके लगभग 20 प्रतिशत तेल का आवागमन ईरान, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच स्थित इस संकरे समुद्री मार्ग से होता है। एक तेल टैंकर पर हमले और समुद्री यातायात में बाधा की खबरों ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा बाजारों में केवल व्यवधान की आशंका भी कीमतों को ऊपर ले जाने के लिए पर्याप्त होती है।
तेल सामान्य वस्तु नहीं है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति को प्रभावित करने वाला प्रमुख संसाधन है। दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी ऐसे देशों में रहती है जो परिवहन और अन्य जरूरतों के लिए तेल आयात पर निर्भर हैं। 1970 के दशक के तेल प्रतिबंध से लेकर 2022 में रूस द्वारा यूरोप को गैस आपूर्ति घटाने तक, ऊर्जा आपूर्ति को लंबे समय से दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है।
ईरान पर हमलों के बाद वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 76 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो कुछ सप्ताह पहले करीब 68 डॉलर थी। तेल की कीमतें वैश्विक होती हैं, इसलिए किसी भी क्षेत्र की अस्थिरता का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। ऑस्ट्रेलिया में संभावित मूल्यवृद्धि से पहले पेट्रोल भरवाने के लिए लंबी कतारों की खबरें भी सामने आई हैं।
बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच कई देश तेल पर निर्भरता घटाने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहे हैं। 2015 में भारत द्वारा नेपाल की तेल आपूर्ति रोके जाने के बाद नेपाल ने इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया, जिससे उसके तेल आयात में गिरावट आई। रूस-यूक्रेन युद्ध और वेनेजुएला व ईरान पर प्रतिबंधों के बाद ऊर्जा सुरक्षा पर नया जोर देखा गया है।