दुबई
ईरान इस युद्ध को केवल सैन्य ताकत से नहीं बल्कि लंबी और थकाने वाली लड़ाई में बदलकर अमेरिका और इज़राइल को पीछे हटने पर मजबूर करने की रणनीति पर काम कर रहा है। उसका लक्ष्य ड्रोन और मिसाइल हमलों के साथ-साथ ऊर्जा आपूर्ति मार्गों को बाधित कर वैश्विक बाज़ारों में झटका देना है, ताकि आर्थिक दबाव बढ़े और अंततः वॉशिंगटन को झुकना पड़े।
अमेरिका-इज़राइल के शुरुआती हमलों में कई प्रमुख नेताओं की मौत के बावजूद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) अभी भी पूरी तरह नियंत्रण में है। वही युद्ध की रणनीति तय कर रहा है, पहले से तैयार सैन्य योजनाओं को लागू कर रहा है और हमलों के लक्ष्य निर्धारित कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक शुरुआती हमलों में आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद IRGC ने मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता बनाने में भी निर्णायक भूमिका निभाई।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस संघर्ष को अस्तित्व की लड़ाई मान रहा है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के फवाज गेरगेस के अनुसार ईरानी नेतृत्व को लगता है कि उनका अस्तित्व दांव पर है और वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ विश्लेषक एलेक्स वतानका का कहना है कि घायल जानवर की तरह ईरान इस समय पहले से ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
इसी सोच के तहत ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अपने हमले तेज कर दिए हैं। कतर, सऊदी अरब समेत ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाकर वह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बनाना चाहता है ताकि यूरोप, अमेरिका और क्षेत्रीय देशों पर आर्थिक असर पड़े और राजनीतिक दबाव बढ़े।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रिपब्लिकन सांसदों से कहा कि युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान को पूरी तरह और निर्णायक रूप से पराजित नहीं कर दिया जाता। उन्होंने दावा किया कि सैन्य अभियान खत्म होने के बाद लंबे समय तक ईरान अमेरिका, इज़राइल और उनके सहयोगियों के खिलाफ हथियार इस्तेमाल करने की स्थिति में नहीं रहेगा।
हालांकि ईरानी सूत्रों का कहना है कि यह टकराव लंबे समय से अनुमानित था और तेहरान ने पहले ही एक बहु-स्तरीय रणनीति तैयार कर ली थी। अब जब खोने के लिए बहुत कम बचा है, तो ईरान उसी योजना को लागू कर रहा है और युद्ध को थकाने वाली लड़ाई में बदलने की कोशिश कर रहा है।
युद्ध का असर ईरान के अंदर भी दिखने लगा है। प्रशासनिक व्यवस्था को युद्ध अर्थव्यवस्था की तरह ढाला जा रहा है ताकि आपूर्ति शृंखला लगातार चलती रहे। बंदरगाहों पर सामान की निकासी तेज कर दी गई है और कई औपचारिकताएँ बाद में पूरी की जा रही हैं।
फिलहाल देश के भीतर बड़े विरोध प्रदर्शन या सत्ता में दरार के संकेत नहीं दिख रहे हैं। तेहरान में रहने वाले लोगों के मुताबिक शहर पर हमलों के बावजूद रोजमर्रा की जिंदगी जारी है। दुकानें और बैंक खुले हैं, जरूरी सामान उपलब्ध है और अधिकांश लोग शहर छोड़कर नहीं गए हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि बाहरी हमलों ने कई ईरानियों में राष्ट्रीय एकजुटता की भावना भी बढ़ा दी है। सरकार से असंतोष के बावजूद बहुत से लोग देश के टूटने की संभावना स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
अब इस युद्ध का सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि पहले कौन झुकेगा। क्या ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को लंबे समय तक बनाए रख पाएगा या अमेरिका और इज़राइल आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक दबाव को लगातार झेल पाएंगे।
ऊर्जा कीमतों में उछाल और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता के शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं। तेल और गैस की कीमतें बढ़ रही हैं और अमेरिका में भी आर्थिक असर को लेकर राजनीतिक चिंता बढ़ रही है, खासकर आगामी चुनावों को देखते हुए।
विश्लेषकों के अनुसार यदि दबाव बढ़ता है तो अमेरिका किसी चरण पर जीत का दावा करते हुए पीछे हटने का रास्ता तलाश सकता है। दूसरी ओर ईरान के लिए केवल अस्तित्व बचा लेना भी एक बड़ी जीत के रूप में पेश किया जा सकता है।संभावना यह भी है कि युद्ध के बाद ईरान कमजोर और घायल अवस्था में बचे, लेकिन ऐसा ईरान पहले से ज्यादा अनिश्चित और खतरनाक साबित हो सकता है।