चीन ने दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ाया सैन्य नेटवर्क, लाओस में नया एयरबेस

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 05-10-2026
China expands military network in Southeast Asia; new airbase in Laos.
China expands military network in Southeast Asia; new airbase in Laos.

 

नई दिल्ली।

चीन ने दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी का विस्तार करते हुए पड़ोसी देश लाओस में एक नया हवाई सैन्य अड्डा शुरू किया है। इससे पहले चीन कंबोडिया में भी एक नौसैनिक सुविधा तक पहुंच बना चुका है। इस घटनाक्रम को क्षेत्र में चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव और सैन्य पहुंच के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।

समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने 29 सितंबर 2026 को लाओस में नए सैन्य केंद्र के संचालन की घोषणा की। मंत्रालय ने बताया कि लाओस के बान केउन हवाई अड्डे पर चीन-लाओस संयुक्त सहायता एवं प्रशिक्षण केंद्र और चीन-लाओस मैत्री विमानन अकादमी ने आधिकारिक रूप से काम करना शुरू कर दिया है।

उद्घाटन समारोह में लाओस के रक्षा मंत्री खामलिएंग ओउथाकायसोन भी शामिल हुए। यह घटनाक्रम लाओस के राष्ट्रपति थोंगलौन सिसौलिथ की जून में बीजिंग यात्रा के कुछ महीने बाद सामने आया है। उस दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रक्षा सहित विभिन्न मुद्दों पर रणनीतिक संवाद बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया था।

वियतनाम की सीमा के करीब चीन की नई सैन्य मौजूदगी

लाओस की राजधानी वियनतियाने से लगभग 50 किलोमीटर उत्तर में स्थित बान केउन हवाई अड्डा चीन की सैन्य रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह स्थान इंडोचीन प्रायद्वीप में चीन की मौजूदा दक्षिण-पश्चिमी सीमा से लगभग 400 किलोमीटर आगे है और वियतनाम के पश्चिम में स्थित है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस हवाई अड्डे का निर्माण पहले कृषि भूमि पर किया गया। इसके निर्माण का काम पिछले साल के अंत में शुरू हुआ प्रतीत होता है। यहां लगभग 2,000 मीटर लंबा पक्का रनवे, टैक्सीवे, विमानों की पार्किंग के लिए जगह, एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर और पांच हैंगर बनाए गए हैं। हालांकि, कुछ निर्माण कार्य अभी भी जारी हैं।

इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व भी है। वियतनाम युद्ध के दौरान यहां अमेरिकी सेना और सीआईए के हवाई अड्डों के नेटवर्क का हिस्सा रहे लीमा साइट 44 का इस्तेमाल किया जाता था।

चीन का कहना है कि नया केंद्र किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है। उसके मुताबिक, इसका उद्देश्य लाओस की वायुसेना के पायलटों को प्रशिक्षण देने, दोनों देशों के सैन्य सहयोग को मजबूत करने और क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने में योगदान देना है।

लाओस की वायुसेना को प्रशिक्षण देगा चीन

लाओस की वायुसेना आकार में छोटी है। उसके पास रूसी और चीनी निर्मित विमान तथा हेलीकॉप्टर हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उसके बेड़े में एमए60 और एमए600 परिवहन विमान, चार जेड-9 हेलीकॉप्टर, पांच एलई500 टर्बोप्रॉप प्रशिक्षण विमान और चार के-8डब्ल्यू जेट प्रशिक्षण एवं हल्के हमले वाले विमान शामिल हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि लाओस में नया प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने से चीन को वहां की वायुसेना के प्रशिक्षण और भविष्य में उसके सैन्य उपकरणों की आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिल सकता है।

चीन के सैन्य मामलों पर टिप्पणी करने वाले जुनवू सिवेइमियान के अनुसार, बान केउन का चयन मुख्य रूप से दो कारणों से किया गया है। पहला, यह चीन-लाओस रेलवे गलियारे के पास है, जिससे सैनिकों और सैन्य उपकरणों को पहुंचाना आसान हो सकता है। दूसरा, यह लाओस की राजधानी के करीब है और आसपास का अपेक्षाकृत समतल भूभाग हवाई अड्डे तथा उड़ान प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त है।

उनके अनुसार, यह केंद्र लाओस की वायुसेना को प्रशिक्षित करने के साथ-साथ उसे भविष्य में चीनी निर्मित सैन्य उपकरणों पर अधिक निर्भर बना सकता है।

चीन के सैन्य विमानों को भी मिल सकता है इस्तेमाल का अवसर

रिपोर्ट में संभावना जताई गई है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स नए बान केउन केंद्र पर अपने जेएल-8 प्रशिक्षण विमानों को तैनात कर सकती है। इसके साथ लाओस के के-8डब्ल्यू विमानों को भी यहां स्थानांतरित किया जा सकता है। हालांकि, चीन ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस केंद्र पर कितने विमान, सैनिक या अन्य सैन्य संसाधन तैनात किए जाएंगे।

चीन पहले से ही क्षेत्र में विभिन्न देशों के साथ हवाई सैन्य अभ्यास करता रहा है। थाईलैंड के साथ उसके वार्षिक संयुक्त अभ्यास भी होते हैं। विश्लेषकों के अनुसार, बान केउन केंद्र चीन को सैन्य अभ्यास के लिए एक अतिरिक्त स्थान उपलब्ध करा सकता है। इससे वह अपने विमानों को अलग-अलग ठिकानों से संचालित कर अभ्यास को अधिक वास्तविक परिस्थितियों के करीब ले जा सकता है।

चीन के लिए इस केंद्र का एक अन्य संभावित लाभ क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाना है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई महत्वपूर्ण शहर इस सैन्य सुविधा से लगभग 500 से 700 किलोमीटर की दूरी पर हैं, जबकि कुछ अन्य शहरों की दूरी 1,000 किलोमीटर से कुछ अधिक है।

कंबोडिया में भी चीन की सैन्य पहुंच

लाओस में नए हवाई सैन्य केंद्र से पहले चीन ने कंबोडिया के रीम नौसैनिक अड्डे पर अपनी मौजूदगी मजबूत की थी। थाईलैंड की खाड़ी में स्थित इस अड्डे पर चीन और कंबोडिया ने 5 अप्रैल 2025 को संयुक्त सहायता एवं प्रशिक्षण केंद्र का उद्घाटन किया था।

रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने इस नौसैनिक अड्डे के विस्तार के लिए आर्थिक सहायता दी और वहां नई इमारतों तथा जहाजों के ठहरने के लिए अतिरिक्त सुविधाओं का निर्माण किया। चीनी युद्धपोत इस अड्डे पर रुकते रहे हैं।

हालांकि, कंबोडिया का कहना है कि यह सुविधा केवल चीन के लिए आरक्षित नहीं है और मित्र देशों की नौसेनाएं भी इसका इस्तेमाल कर सकती हैं। जनवरी 2026 में अमेरिकी नौसेना का युद्धपोत यूएसएस सिनसिनाटी भी इस अड्डे पर पहुंचा था। नवीनीकरण के बाद किसी अमेरिकी युद्धपोत की यह पहली यात्रा थी।

कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेट ने अड्डे के उद्घाटन के दौरान कहा था कि उनका देश अपने संविधान का उल्लंघन करते हुए किसी अन्य देश को अपने क्षेत्र में विशेष सैन्य अड्डा स्थापित करने की अनुमति नहीं देगा।

कंबोडिया ने अमेरिका के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास भी फिर शुरू किए हैं। इससे संकेत मिलता है कि वह चीन के साथ करीबी संबंध बनाए रखने के बावजूद दूसरे देशों के साथ सुरक्षा संबंधों में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

अफ्रीका में चीन का पहला विदेशी सैन्य अड्डा

चीन ने अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा 2017 में अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में स्थित जिबूती में स्थापित किया था। यह अड्डा अदन की खाड़ी में समुद्री डकैती विरोधी अभियानों में शामिल चीनी नौसैनिक बलों को सहायता प्रदान करता है।

हालांकि, इस सुविधा की भूमिका केवल नौसैनिक सहायता तक सीमित नहीं है। यहां चीनी नौसेना के मरीन सैनिकों और बख्तरबंद वाहनों की मौजूदगी भी बताई गई है। यह अड्डा अफ्रीका और आसपास के मध्य पूर्वी क्षेत्र में संकट की स्थिति में चीनी सेना को तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद कर सकता है। यहां अफ्रीका में तैनाती के लिए जाने वाले चीनी शांति सैनिकों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

पेंटागन की रिपोर्ट के मुताबिक, जिबूती स्थित अड्डे ने समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और क्षेत्रीय सैन्य कूटनीति में चीन की मौजूदगी को मजबूत किया है। हालांकि, अमेरिकी आकलन में कहा गया था कि चीनी नागरिकों और निवेशों की सुरक्षा के घोषित उद्देश्य के तहत इस अड्डे की भूमिका सीमित रही है।

लाओस की सुविधा इससे अलग है, क्योंकि यह चीन के बाहर उसकी वायुसेना के लिए विशेष रूप से स्थापित पहला सैन्य अड्डा बताया जा रहा है। यहां चीनी सैन्य कर्मियों की नियमित तैनाती और विमानों को सहायता देने की व्यवस्था विकसित होने की संभावना है।

अमेरिका की नजर चीन के बढ़ते सैन्य नेटवर्क पर

अमेरिका के रक्षा विभाग ने दिसंबर 2025 में चीन की सैन्य क्षमता पर जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि चीन विदेशों में सैन्य सुविधाओं का नेटवर्क विकसित करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है। इस नेटवर्क का उद्देश्य लंबी दूरी तक सैन्य शक्ति पहुंचाने और उसे बनाए रखने की क्षमता बढ़ाना है।

रिपोर्ट में अंगोला, बांग्लादेश, म्यांमार, क्यूबा, इक्वेटोरियल गिनी, इंडोनेशिया, केन्या, मोजाम्बिक, नामीबिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान, पापुआ न्यू गिनी, सेशेल्स, सोलोमन द्वीप, श्रीलंका, ताजिकिस्तान, थाईलैंड, तंजानिया, संयुक्त अरब अमीरात और वानुअतु जैसे देशों में संभावित सैन्य सुविधाओं को लेकर चीन की रुचि का उल्लेख किया गया था। हालांकि, उस रिपोर्ट में लाओस का नाम शामिल नहीं था।

विश्लेषकों के अनुसार, विदेशों में सैन्य सुविधाएं स्थापित करने की चीन की योजना को मेकांग क्षेत्र, मलक्का जलडमरूमध्य, होर्मुज जलडमरूमध्य और अफ्रीका तथा मध्य पूर्व के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में अपनी पहुंच बढ़ाने की व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है।

चीन का विदेशी सैन्य नेटवर्क अभी अमेरिका के वैश्विक सैन्य अड्डों के नेटवर्क की तुलना में काफी छोटा है। फिर भी, लाओस में नया हवाई सैन्य केंद्र और कंबोडिया में नौसैनिक सुविधा तक उसकी पहुंच दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव को दर्शाती है।

स्रोत: एएनआई की रिपोर्ट।