10 हजार वोल्ट का झटका, दोनों हाथ गंवाए; अब भारत के लिए तैरेंगे अब्दुल कादिर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 05-10-2026
Shocked by 10,000 volts and lost both hands; now Abdulqadir will swim for India.
Shocked by 10,000 volts and lost both hands; now Abdulqadir will swim for India.

 

मंसूरुद्दीन फरीदी 
 
अगर आप मानसिक रूप से मज़बूत हैं, तो कोई भी विकलांगता रुकावट नहीं बन सकती। ये शब्द अब्दुलकादिर इंदौरवाला के हैं। एक तैराक जिनके हाथ नहीं हैं और जो पैरा एशियन गेम्स 2026 में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले हैं। सिर्फ़ सात साल की उम्र में, उन्हें अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े तूफ़ान का सामना करना पड़ा, लेकिन हिम्मत और पक्के इरादे से उन्होंने उस मुश्किल हालात को एक छोटी सी चुनौती में बदल दिया।

अब्दुलकादिर इंदौरवाला। एक युवा तैराक जिनके हाथ नहीं हैं, लेकिन जो पूल में सबसे तेज़ तैराकों में से एक बनकर उभरे हैं। उनकी कहानी वाकई कमाल की है। उन्होंने सिर्फ़ सात साल की उम्र में अपने दोनों हाथ खो दिए थे। आज, वह एक इंटरनेशनल तैराक हैं जिन्होंने नेशनल और इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई है। अब उन्हें जापान में होने वाले पैरा एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है।
 
 
'आवाज़-द वॉयस' से बात करते हुए, दाऊदी बोहरा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अब्दुलकादिर इंदौरवाला गर्व से कहते हैं कि एक मज़बूत सोच ने उन्हें निराशा में डूबने से बचाया। कभी हार न मानने की उनकी आदत ने उन्हें एक नई दिशा दी। नतीजतन, बिना हाथों के जो ज़िंदगी कभी मुश्किल लगती थी, वह अब उनके लिए सामान्य हो गई है।
मध्य प्रदेश के रतलाम के रहने वाले अब्दुलकादिर इंदौरवाला के लिए, स्विमिंग पूल वह मैदान बन गया जहाँ वह ज़िंदगी के साथ रेस लगाते थे। हिम्मत, पक्के इरादे, जुनून और कड़ी मेहनत के ज़रिए, उन्होंने अपनी विकलांगता की सीमाओं से आगे बढ़कर खुद को साबित किया।
 
संघर्ष और कामयाबी के इस सफ़र में उनके पिता, हुसैन इंदौरवाला ने अहम भूमिका निभाई। उस भयानक हादसे के बावजूद, उन्होंने यह पक्का किया कि उनका बेटा निराशा में न डूबे। आज, अब्दुलकादिर पैरा स्विमिंग में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में मेडल जीत रहे हैं।
 
10,000 वोल्ट का बिजली का झटका

अब्दुलकादिर इंदौरवाला की ज़िंदगी एक बिजली के झटके से हिल गई थी। यह कोई आम झटका नहीं था, बल्कि 10,000 वोल्ट का झटका था। उन्होंने 'आवाज़-द वॉयस' को बताया कि यह घटना 2014 में हुई थी, जब वह भोपाल में अपने नाना के घर पर थे। इस हादसे में उनके दोनों हाथ बुरी तरह जल गए थे। इंफेक्शन को फैलने से रोकने के लिए डॉक्टरों को उसके दोनों हाथ काटने पड़े। उस समय वह सिर्फ़ सात साल का था। उसकी ज़िंदगी में अंधेरा छा गया और वह निराशा में डूबने लगा। हालाँकि, उसके परिवार के हौसले और साथ ने उस अंधेरे को रोशनी में बदलने में अहम भूमिका निभाई।
 
 
हादसे के बाद की ज़िंदगी

इस भयानक हादसे के बाद, युवा अब्दुलकादिर के सामने सबसे बड़ी शुरुआती चुनौती थी रोज़मर्रा के कामों को फिर से करना सीखना। उसकी पढ़ाई-लिखाई के लिए लिखना बहुत ज़रूरी था। उसने हाथों की जगह पैरों से लिखने की प्रैक्टिस शुरू की। कड़ी मेहनत और पक्के इरादे से, वह सिर्फ़ छह महीनों में ही पैरों से लिखने में माहिर हो गया।
 
'आवाज़-द वॉइस' से बात करते हुए, उनके पिता हुसैन इंदौरवाला ने कहा कि उन्होंने यह पक्का किया था कि उनका बेटा कभी भी खुद को दूसरों से कमतर या किसी काम को करने में अक्षम न समझे। इसीलिए उन्होंने अब्दुलकादिर के साथ कभी भी ऐसा व्यवहार नहीं किया जैसे वह अपनी विकलांगता के कारण बेबस हो। जब भी कोई उसे तरस भरी नज़रों से देखता, तो वे उन्हें ऐसा करने से रोक देते थे। यही सकारात्मक सोच अब्दुलकादिर की सबसे बड़ी ताकत बनी। अब्दुलकादिर खुद कहते हैं कि उन्हें कभी डर नहीं लगा। उनके माता-पिता का यह भरोसा कि वह ज़िंदगी में कुछ भी हासिल कर सकते हैं, उन्हें बहुत हिम्मत देता था।
 
 
"निराशा कोई विकल्प नहीं"

जिस हादसे ने अब्दुलकादिर इंदौरवाला की ज़िंदगी बदल दी, वह उनके पिता हुसैन इंदौरवाला के लिए किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं था। हुसैन पिछले 35 सालों से रतलाम में रह रहे हैं और पेंट और हार्डवेयर का कारोबार करते हैं। 'आवाज़-द वॉइस' से बात करते हुए उन्होंने कहा कि हादसे के बाद उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके बेटे की ज़िंदगी खत्म हो गई हो। लेकिन उस मुश्किल दौर में परिवार अकेला नहीं था। दोस्तों, पड़ोसियों और स्कूल प्रशासन ने हुसैन और उनके परिवार का हौसला बढ़ाया और भरोसा दिलाया कि वे अब्दुलकादिर की पढ़ाई और भविष्य के सफर में उसका साथ देंगे।
 
अब्दुलकादिर के स्कूल के प्रिंसिपल भी उनके घर आए और माता-पिता को भरोसा दिलाया कि स्कूल उनकी पढ़ाई की पूरी ज़िम्मेदारी लेगा और उन्हें 12वीं कक्षा तक पढ़ाई जारी रखने में मदद करेगा। इस दौरान, परिवार को सोशल मीडिया पर पैरा-स्पोर्ट्स की तस्वीरें दिखीं। उन्होंने विकलांग बच्चों को मेडल जीतते देखा। हुसैन को लगा कि शायद उनके बेटे के लिए भी एक नया रास्ता बन सकता है। तभी अब्दुलकादिर को तैराकी (स्विमिंग) से जोड़ने का फैसला किया गया। जल्द ही उसने अपनी काबिलियत साबित करना शुरू कर दिया।
 
 
कोच राजा राठौर ने उन्हें एक नया रास्ता दिखाया

अब्दुलकादिर के मुताबिक, इस नई शुरुआत में एक और व्यक्ति ने अहम भूमिका निभाई। वह व्यक्ति उनके कोच राजा राठौर थे, जिन्होंने उन्हें तैराकी सिखाने की पेशकश की। शुरू में, तैराकी का मकसद रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) और शारीरिक सुधार था। लेकिन जल्द ही कोच और उनके माता-पिता को एहसास हुआ कि अब्दुलकादिर में असाधारण प्रतिभा है। राजा राठौर ने अब्दुलकादिर को ट्रेनिंग देना शुरू किया और आज तक उनसे फीस के तौर पर एक भी रुपया नहीं लिया। अब्दुलकादिर ने भी अपनी पूरी ऊर्जा तैराकी में लगा दी। बिना हाथों के पानी में शरीर का संतुलन बनाए रखना, सांस पर नियंत्रण रखना और ज़रूरी रफ़्तार से तैरना उनके लिए बड़ी चुनौतियां थीं। लेकिन लगातार अभ्यास से धीरे-धीरे ये मुश्किलें उनकी ताकत बन गईं। ज़रा सोचिए, सात साल की उम्र में दोनों हाथ गंवाने के बाद, सिर्फ़ एक साल के भीतर ही उन्होंने बेलगाम पैरा नेशनल गेम्स में कई मेडल जीतना शुरू कर दिया।
 
नेशनल से इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं तक

'आवाज़-द वॉयस' से बात करते हुए अब्दुलकादिर ने बताया कि उन्होंने नेशनल लेवल पर 23 गोल्ड और 3 सिल्वर मेडल जीते हैं और कई नेशनल रिकॉर्ड भी बनाए हैं। नेशनल लेवल पर उनके शानदार प्रदर्शन ने इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं के दरवाज़े खोल दिए। भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने 2024 में मिस्र में आयोजित 'सिटी पैरा स्विमिंग वर्ल्ड सीरीज़' में हिस्सा लिया और बेहतरीन प्रदर्शन किया। उन्होंने 50-मीटर बैकस्ट्रोक में गोल्ड और 50-मीटर बटरफ्लाई में सिल्वर मेडल जीता।
 
अब्दुलकादिर ने दुबई में हुए एशियन यूथ पैरा गेम्स 2025 में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहाँ उन्होंने 3 गोल्ड और 1 ब्रॉन्ज़ मेडल जीता और इंटरनेशनल स्टेज पर अपना हुनर ​​दिखाया। उन्होंने वर्ल्ड पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप 2025 में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहाँ उन्होंने दुनिया के कुछ बेहतरीन पैरा स्विमर्स के साथ मुकाबला किया और अपनी काबिलियत साबित की।
 
 
अगला पड़ाव: पैरा एशियन गेम्स

अब्दुलकादिर का सफ़र अभी खत्म नहीं हुआ है। अब उनकी नज़रें ग्लोबल लेवल पर होने वाले बड़े मुकाबलों पर हैं। उन्हें जापान में 15 अक्टूबर से शुरू होने वाले पैरा एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है। 'आवाज़-द वॉयस' से बात करते हुए उन्होंने बताया कि वे अभी गांधीनगर में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया कॉम्प्लेक्स में ट्रेनिंग ले रहे हैं। उनका लक्ष्य एशियन गेम्स में मेडल जीतना है और इसके लिए वे ज़ोरदार ट्रेनिंग कर रहे हैं। वे हर सुबह और शाम स्विमिंग पूल में कई घंटे ट्रेनिंग करते हैं।
 
उनका कहना है कि उनका सफ़र तो अभी शुरू हुआ है। अब उनकी नज़रें पैरालंपिक गेम्स पर हैं। एक दशक पहले, 10,000 वोल्ट के बिजली के झटके ने उनके दोनों हाथ छीन लिए थे। लेकिन यह हादसा उनका हौसला नहीं तोड़ सका। अपने माता-पिता के भरोसे, कोच की निस्वार्थ कोशिशों और अपनी लगातार मेहनत के दम पर अब्दुलकादिर ने साबित कर दिया है कि शारीरिक कमियाँ किसी व्यक्ति और उसके सपनों के बीच आखिरी रुकावट नहीं होतीं।
 
 
उनके पिता हुसैन इंदौरवाला का कहना है कि अब्दुलकादिर की कामयाबी बेशक उनकी अपनी मेहनत का नतीजा है, लेकिन वे इसके लिए कई लोगों की दुआओं और समर्थन को भी श्रेय देते हैं। अब्दुलकादिर कई बार दाऊदी बोहरा समुदाय के धर्मगुरु सैयदना मुफ़द्दल सैफुद्दीन से मिल चुके हैं। सैयदना मुफ़द्दल सैफुद्दीन ने उन्हें आशीर्वाद दिया और समुदाय ने उनकी स्विमिंग ट्रेनिंग का सारा खर्च उठाने की ज़िम्मेदारी ली।
 
 
एक ऐसा संदेश जो हर किसी तक पहुँचना चाहिए

BBS के दूसरे साल के स्टूडेंट अब्दुलकादिर ने 'आवाज़-द वॉयस' को विस्तार से बताया कि अगर आप मानसिक रूप से मज़बूत हैं... कोई भी विकलांगता रुकावट नहीं बन सकती। उनका कहना है कि ऐसी स्थितियों में कभी हार नहीं माननी चाहिए। लगातार कड़ी मेहनत को प्राथमिकता देनी चाहिए। अनुशासन भी जीवन का एक अहम हिस्सा है और इसके बिना जीवन अधूरा रहता है।
 
वे गर्व से कहते हैं कि मज़बूत सोच ने उनकी बहुत मदद की है। कभी हार न मानने की उनकी आदत ने उन्हें नई ताकत दी है और बिना हाथों के जो जीवन कभी मुश्किल लगता था, वह अब सामान्य हो गया है। युवाओं के लिए उनका संदेश सरल है: कभी उम्मीद न छोड़ें। निराशा को कभी भी खुद पर हावी न होने दें। जब आप कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ काम करते हैं, तो सबसे मुश्किल काम भी आसान हो सकते हैं।