पश्चिम बंगाल: नदिया और सैंथिया में सांप्रदायिक सौहार्द की अनोखी मिसाल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 05-10-2026
West Bengal: Unique example of communal harmony seen in Nadia and Sainthia.
West Bengal: Unique example of communal harmony seen in Nadia and Sainthia.

 

जावेद अख्तर | कोलकाता

पश्चिम बंगाल के गांवों से भाईचारे की दो ऐसी कहानियां सामने आई हैं जो इंसानियत का भरोसा मजबूत करती हैं। जहां एक तरफ देश में धर्म के नाम पर दूरियां पैदा करने की बातें होती हैं, वहीं बंगाल के ये गांव सदियों से मिलकर रहने की मिसाल पेश कर रहे हैं। नदिया जिले के चापड़ा स्थित सुटिया गांव में मुस्लिम समुदाय 270सालों से हिंदू परिवार की दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन कर रहा है। दूसरी ओर, बीरभूम के सैंथिया स्थित बलाइचंडी गांव में एक भी हिंदू परिवार नहीं रहता, फिर भी वहां के मुस्लिम ग्रामीण पीढ़ियों से देवी की प्राचीन प्रतिमा की देखभाल और पूजा की व्यवस्था संभाल रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में चापड़ा इलाके का सुटिया गांव अपनी खास दुर्गा पूजा के लिए जाना जाता है। इस गांव का इतिहास नवाब मुर्शिद कुली खान के दौर से जुड़ा है। उस समय ब्रह्म परिवार के जमींदार लक्ष्मीकांत ब्रह्म ने यहां दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी।

लक्ष्मीकांत ब्रह्म का मुख्य व्यापार धागे यानी सूत का था। इसी वजह से इस गांव का नाम पहले सूतिया पड़ा और बाद में यह सुटिया नाम से मशहूर हो गया। करीब ढाई सौ साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी यहां पूजा से जुड़ी पुरानी रीति-रिवाज बिल्कुल नहीं बदले हैं।

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सपने से शुरू हुई दो भुजाओं वाली दुर्गा प्रतिमा की कहानी

सुटिया गांव की इस दुर्गा पूजा की शुरुआत की कहानी काफी दिलचस्प है। बात करीब 270  साल पुरानी है। षष्ठी के दिन जमींदार लक्ष्मीकांत ब्रह्म जलांगी नदी के रास्ते नाव से लगान जमा करने कृष्णनगर जा रहे थे। रास्ते में बड़े आंदोलिया घाट से नाव पर सवार होने के बाद उन्हें नींद आ गई।

जब नाव नकाशीपाड़ा के मोटा बहिरगाछी घाट पहुंची, तो उन्हें सपने में एक आवाज सुनाई दी। आवाज में उनसे कहा गया कि पास के काश के जंगल में देवी पड़ी हैं, उन्हें अपने घर ले जाकर स्थापित करो।

लक्ष्मीकांत ब्रह्म की आंख खुली तो उन्होंने तुरंत नाविक को नाव रोकने को कहा। घाट पर उतरकर उन्होंने काश के जंगल में छानबीन शुरू की। वहां उन्हें सचमुच दुर्गा मां की एक प्रतिमा मिली।

पूछताछ करने पर पता चला कि एक परिवार ने पूजा के लिए यह मूर्ति बनवाई थी। लेकिन उसी दिन उनके बेटे की सांप के काटने से मौत हो गई। इस दुखद घटना के कारण परिवार ने षष्ठी के दिन मूर्ति का विसर्जन नहीं किया और उसे नदी घाट के किनारे छोड़ दिया।

जमींदार लक्ष्मीकांत ब्रह्म उस मूर्ति को सम्मान के साथ अपनी नाव में रखकर अपने घर सुटिया ले आए। चूंकि प्रतिमा षष्ठी का दिन बीत जाने के बाद घर पहुंची थी, इसलिए तभी से इस पूजा में षष्ठी के दिन कोई अनुष्ठान नहीं होता। यहां धार्मिक कार्यक्रम सीधे महासप्तमी से शुरू होते हैं।

इसके अलावा, सामान्य दुर्गा प्रतिमाओं की तरह इस मूर्ति की दस भुजाएं नहीं होतीं। यहां देवी की दो भुजाओं यानी द्विभुजा रूप की पूजा की जाती है।

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मुस्लिम पड़ोसी 270सालों से करते हैं मूर्ति विसर्जन

सुटिया गांव की इस ब्रह्मबाड़ी दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी पहचान इसका सामाजिक ताना-बाना है। पूजा के दिन खत्म होने के बाद जब प्रतिमा विसर्जन यानी निरंजन का समय आता है, तो इसकी पूरी मुख्य जिम्मेदारी गांव का मुस्लिम समुदाय संभालता है। गांव के मुस्लिम युवक और बड़े-बुजुर्ग प्रतिमा को सुरक्षित नदी तक ले जाने और जल विसर्जन कराने में पूरी सक्रियता से भाग लेते हैं।

यह परंपरा किसी एक साल या दो साल से नहीं, बल्कि लगभग 270सालों से लगातार चली आ रही है। स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि गांव का सबसे बड़ा सामाजिक मिलन समारोह है।

दुर्गा पूजा के दिनों में देश-विदेश में रहने वाले ब्रह्म परिवार के सदस्य अपने पुश्तैनी घर पहुंचते हैं। गांव के हिंदू और मुस्लिम परिवार मिलकर इस त्योहार की खुशियां बांटते हैं।

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बलाइचंडी गांव जहां एक भी हिंदू नहीं, फिर भी सुरक्षित हैं 'ठाकुरुन मां'

सांप्रदायिक सौहार्द की ऐसी ही दूसरी दिल छू लेने वाली कहानी बीरभूम जिले के सैंथिया इलाके में स्थित बलाइचंडी गांव की है। इस गांव में आज की तारीख में एक भी हिंदू परिवार नहीं रहता है। पूरा गांव करीब 110 मुस्लिम परिवारों का है।

इसके बावजूद गांव के बीचों-बीच स्थित देवी की एक प्राचीन शिलामूर्ति आज भी पूरी तरह सुरक्षित और पूजनीय है। स्थानीय लोग इस मूर्ति को 'ठाकुरुन मां' या 'नाककाटी ठाकुरुन' के नाम से पुकारते हैं।

गांव के 68 वर्षीय शेख इमानदार और 65वर्षीय शेख साधु जमाल बताते हैं कि उन्होंने अपने बाप-दादाओं से इस स्थान की महिमा सुनी है। सालों पहले यहां एक जमींदार का राज था। जमींदार ने ही देवी की शिलामूर्ति स्थापित की थी और पूजा के लिए देवोत्तर जमीन दी थी।

समय के साथ जमींदारी खत्म हो गई और पूजा की जमीन भी धीरे-धीरे दूसरों के पास चली गई। गांव से हिंदू परिवार भी समय के साथ दूसरे इलाकों में जाकर बस गए। लेकिन देवी का स्थान वहीं का वहीं रहा।

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गांव की मुस्लिम महिलाएं भी मांगती हैं मन्नत

आज यह प्राचीन प्रतिमा आंगनबाड़ी केंद्र के पास एक खजूर के पेड़ के नीचे रखी है। गांव के मुस्लिम परिवार इस जगह की सफाई और सुरक्षा का ध्यान रखते हैं।पास के नवग्राम के चक्रवर्ती परिवार के सदस्य उज्ज्वल चक्रवर्ती हफ्ते में एक दिन यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं। चक्रवर्ती परिवार पीढ़ियों से इस मंदिर में पुजारी की भूमिका निभाता आ रहा है।

अगर कभी किसी कारण से पुजारी गांव नहीं पहुंच पाते हैं, तो गांव की मजार की देखभाल करने वाले शेख सलाउद्दीन और शेख इब्राहिम श्रद्धालुओं की मदद करते हैं। वे भक्तों द्वारा लाई गई पूजा सामग्री को देवी के स्थान पर पूरी श्रद्धा के साथ अर्पित कर देते हैं।

गांव की आंसमा बेगम और नाजमा बेगम जैसी महिलाएं ठाकुरुन मां के प्रति गहरी आस्था रखती हैं। वे सुबह नहाकर साफ-सुथरे कपड़े पहनती हैं और देवी स्थान पर जाकर अपने परिवार की खुशहाली और बच्चों की सलामती के लिए दुआ मांगती हैं।उनका मानना है कि यह देवी पूरे गांव की रक्षा करती हैं और उनके पूर्वजों की इस अमानत को संभालना उनका नैतिक फर्ज है।

इतिहास, विश्वास और साझा विरासत का प्रतीक

पश्चिम बंगाल के नदिया और बीरभूम जिलों से आई ये खबरें यह साबित करती हैं कि ग्रामीण भारत में आज भी सामाजिक एकता की जड़ें कितनी गहरी हैं। राजनीतिक और सामाजिक बदलावों के बावजूद इन गांवों के लोगों ने अपने पूर्वजों के दिए भाईचारे के सबक को भूलने नहीं दिया है।

सुटिया में मुस्लिम समुदाय द्वारा निभाई जाने वाली विसर्जन की जिम्मेदारी हो या बलाइचंडी में बिना किसी हिंदू आबादी के देवी स्थान की सुरक्षा, ये कहानियां केवल धार्मिक सहिष्णुता की बातें नहीं हैं। ये उस साझी संस्कृति का सबूत हैं जहां आस्था अलग हो सकती है, लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अपनी मिट्टी की विरासत को बचाने का भाव एक ही रहता है।