से. लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन होंगे बिहार के 34वें राज्यपाल, बदलेगी प्रदेश की सियासी और प्रशासनिक तस्वीर

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 06-03-2026
Will Ata Hasnain change the political and administrative picture of Bihar?
Will Ata Hasnain change the political and administrative picture of Bihar?

 

मलिक असगर हाशमी, नई दिल्ली

बिहार की राजनीति में इन दिनों बड़े बदलावों की सुगबुगाहट तेज है। मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रही अटकलों के बीच केंद्र सरकार ने एक बेहद चौंकाने वाला और महत्वपूर्ण फैसला लिया है। आरिफ मोहम्मद खान की जगह अब भारतीय सेना के दिग्गज और सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन बिहार के 34वें राज्यपाल के रूप में कमान संभालेंगे। साल 2026 की यह नियुक्ति न केवल प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय है, बल्कि इसे बिहार की भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़े 'मास्टरस्ट्रोक' के तौर पर देखा जा रहा है।

f

जनरल अता हसनैन का व्यक्तित्व अनुशासन, रणनीतिक सूझबूझ और सैन्य गौरव का अनूठा संगम है। उनके राजभवन पहुंचने से यह साफ संकेत मिल रहा है कि आने वाले समय में बिहार के शासन और प्रशासन में एक नई सख्ती और स्पष्टता देखने को मिल सकती है।

जनरल अता हसनैन भारतीय सेना के उन सबसे सम्मानित अधिकारियों में से हैं, जिन्होंने करीब चार दशकों तक देश की सीमाओं की रक्षा की। उनका जन्म एक ऐसे माहौल में हुआ जहां शिक्षा और सेवा सर्वोपरि थी। उन्होंने नैनीताल के प्रतिष्ठित शेरवुड कॉलेज से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की और फिर उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय का रुख किया।

1972 में सेंट स्टीफन कॉलेज से इतिहास में बीए ऑनर्स करने के बाद, उन्होंने अपनी सैन्य शिक्षा को वैश्विक स्तर पर निखारा। उन्होंने लंदन के 'रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज' और हवाई के 'एशिया-पैसिफिक सेंटर फॉर सिक्योरिटी स्टडीज' से रक्षा और वैश्विक सुरक्षा की बारीकियां सीखीं। यही कारण है कि उन्हें केवल एक फौजी के तौर पर नहीं, बल्कि एक 'स्कॉलर जनरल' यानी विद्वान सेनापति के रूप में पहचाना जाता है।

उनके सैन्य करियर की बात करें तो अता हसनैन ने भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) से स्नातक होने के बाद 'गढ़वाल राइफल्स' की चौथी बटालियन में कमीशन प्राप्त किया। उनके करियर का सबसे यादगार और चुनौतीपूर्ण समय वह था जब उन्होंने कश्मीर घाटी में तैनात 15वीं कोर (चिनार कोर) की कमान संभाली।

ALSO READ ले.जन. सैयद अता हसनैन बोले,भारतीय सेना जैसी, धर्म के प्रति संवेदनशील और कोई संस्था नहीं

वहां उन्होंने अपनी रणनीतिक कुशलता से न केवल उग्रवाद पर लगाम कसी, बल्कि आम जनता का दिल जीतने के लिए 'पीपुल्स कनेक्ट' जैसी मुहिम भी चलाई। इसके अलावा उन्होंने सेना की मुख्य स्ट्राइक फॉर्मेशन '21 कोर' का भी सफल नेतृत्व किया। 2013 में सेना मुख्यालय में मिलिट्री सेक्रेटरी के पद से रिटायर होने तक उनका नाम वीरता और ईमानदारी का पर्याय बन चुका था।

उनके सीने पर चमकते परम विशिष्ट सेवा पदक (PVSM), उत्तम युद्ध सेवा पदक (UYSM) और अति विशिष्ट सेवा पदक (AVSM) जैसे सम्मान उनकी विशिष्ट सेवाओं की गवाही देते हैं।

रिटायरमेंट के बाद भी जनरल हसनैन कभी खाली नहीं बैठे। वे लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और भू-राजनीति जैसे गंभीर विषयों पर अपनी बेबाक राय रखते रहे। 2018 में उन्हें कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय का चांसलर नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने शैक्षणिक सुधारों पर जोर दिया। एक रक्षा विश्लेषक और लेखक के रूप में वे देशभर में लोकप्रिय हैं।

उनकी पत्नी सबीहा हसनैन एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर एग्जीक्यूटिव हैं और उनकी दो बेटियां हैं। निजी जीवन में बेहद सादगी पसंद जनरल हसनैन सार्वजनिक मंचों पर अपने सख्त अनुशासन के लिए जाने जाते हैं।

अब जब वे बिहार के राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका में आ रहे हैं, तो उनकी प्राथमिकताएं बिल्कुल अलग होंगी। बिहार जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से सक्रिय प्रदेश में राज्यपाल केवल एक रबर स्टैंप नहीं होता, बल्कि वह केंद्र और राज्य के बीच एक मजबूत कड़ी और संविधान का रक्षक होता है।

d

जनरल हसनैन की छवि को देखते हुए यह माना जा रहा है कि वे बिहार के विश्वविद्यालयों की बदहाल स्थिति को सुधारने और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। वे एक ऐसे रणनीतिकार हैं जो संकट के समय शांत रहकर सही फैसला लेना जानते हैं।

बिहार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच, एक पूर्व सैन्य अधिकारी का राज्यपाल होना राज्य में कानून व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं को बनाए रखने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

ALSO READ ले.जन. सैयद अता हसनैन बोले,भारतीय सेना जैसी, धर्म के प्रति संवेदनशील और कोई संस्था नहीं