केरल की असली कहानी: जब पोंगाला में मंदिर, मस्जिद और चर्च ने खोले अपने दरवाज़े

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 06-03-2026
Mosque, temple and church together: Kerala shows humanity and brotherhood amid Attukal Pongala
Mosque, temple and church together: Kerala shows humanity and brotherhood amid Attukal Pongala

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

केरल लंबे समय से भारत में सामाजिक और धार्मिक सौहार्द की एक अनोखी मिसाल के रूप में जाना जाता रहा है। यहां अलग-अलग धर्मों के लोग न केवल साथ रहते हैं बल्कि एक-दूसरे की आस्थाओं, त्योहारों और परंपराओं का सम्मान करते हुए सहयोग भी करते हैं। हाल ही में तिरुवनंतपुरम में आयोजित अट्टुकल पोंगाला उत्सव के दौरान सामने आई घटनाओं ने इस परंपरा को एक बार फिर पूरे देश के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत कर दिया। इन घटनाओं ने यह दिखाया कि केरल में धार्मिक विविधता केवल एक सामाजिक वास्तविकता नहीं बल्कि साझा संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी जीवन शैली है।

तिरुवनंतपुरम के पलायम इलाके में, जो राज्य सचिवालय से मुश्किल से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, एक ऐसा दृश्य दिखाई देता है जो भारत की बहुलतावादी परंपरा का सशक्त प्रतीक माना जाता है। यहां एक मंदिर और एक मस्जिद एक ही दीवार साझा करते हैं और उनके ठीक सामने एक चर्च खड़ा है, जिसके ऊपर फैले हाथों के साथ यीशु मसीह की प्रतिमा शहर को मानो शांति और सौहार्द का आशीर्वाद देती दिखाई देती है। यह दृश्य किसी विशेष अवसर के लिए बनाया गया प्रतीक नहीं बल्कि एक सामान्य रोजमर्रा की वास्तविकता है जिसे वहां से गुजरने वाले लोग स्वाभाविक रूप से देखते हैं। यही वह जीवन शैली है जिसने केरल को लंबे समय से धार्मिक सहअस्तित्व और सामाजिक सौहार्द का उदाहरण बना रखा है।

केरल में ऐसे कई स्थान हैं जहां मंदिर, मस्जिद और चर्च एक-दूसरे के पास स्थित हैं और यह बात वहां के सामाजिक ढांचे की गहराई को दर्शाती है। कोच्चि के मट्टनचेरी इलाके की एक प्रसिद्ध गली में सिनेगॉग, मस्जिद, मंदिर और चर्च एक ही इलाके में स्थित हैं और यह क्षेत्र लंबे समय से विभिन्न समुदायों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का उदाहरण रहा है।

तिरुवनंतपुरम के कुछ चौराहों पर भी मंदिर, मस्जिद और चर्च एक साथ दिखाई देते हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि यहां धार्मिक पहचान के बावजूद सामाजिक संबंध मजबूत बने हुए हैं। उत्तरी केरल में कोडुंगल्लूर के पास स्थित चेरामन जुम्मा मस्जिद, जिसे भारत की पहली मस्जिद माना जाता है, उसके आसपास प्राचीन मंदिरों की मौजूदगी भी इतिहास में मौजूद धार्मिक सौहार्द की गवाही देती है।

इसी तरह कोच्चि के एडप्पल्ली इलाके में प्रसिद्ध सेंट जॉर्ज फोराने चर्च के आसपास भी मंदिर और मस्जिद मौजूद हैं, जो एक व्यस्त शहरी क्षेत्र में भी धार्मिक विविधता और सहअस्तित्व की झलक पेश करते हैं।

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इसी सामाजिक पृष्ठभूमि के बीच इस वर्ष तिरुवनंतपुरम में आयोजित अट्टुकल पोंगाला उत्सव ने पूरे राज्य को श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में डुबो दिया। अट्टुकल भगवती मंदिर में आयोजित होने वाला यह उत्सव देवी अट्टुकल अम्मा को समर्पित है जिन्हें एक दयालु मातृ देवी के रूप में पूजा जाता है।

इस अवसर पर हजारों नहीं बल्कि लाखों हिंदू महिलाएं राज्य के विभिन्न हिस्सों से तिरुवनंतपुरम पहुंचती हैं और यह आयोजन दुनिया में महिलाओं का सबसे बड़ा धार्मिक समागम माना जाता है। इस अनुष्ठान में महिलाएं शहर की सड़कों, गलियों, आंगनों और खुले मैदानों में ईंटों से अस्थायी चूल्हे बनाकर पोंगाला नामक प्रसाद तैयार करती हैं। पोंगाला एक मीठा व्यंजन होता है जो चावल, गुड़ और नारियल से बनाया जाता है और इसे देवी को अर्पित किया जाता है।

सुबह के शुरुआती घंटों से ही सड़कों पर अस्थायी रसोई बन जाती हैं और शहर का वातावरण गुड़ और धुएं की खुशबू से भर जाता है। महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर अपने चूल्हों के पास बैठ जाती हैं और मंदिर के पुजारियों द्वारा मुख्य चूल्हा जलाए जाने का इंतजार करती हैं। जैसे ही मंदिर में मुख्य अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी के संकेत पर पूरे शहर में पोंगाला पकाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस दौरान तिरुवनंतपुरम की सड़कों पर कई किलोमीटर तक महिलाओं की पंक्तियां दिखाई देती हैं और पूरा शहर मानो एक विशाल रसोईघर में बदल जाता है।

इस विशाल आयोजन के कारण शहर की सामान्य गतिविधियों में भी बदलाव किया जाता है। सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को बंद रखा जाता है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

चूंकि यह अनुष्ठान केवल महिलाओं के लिए होता है, इसलिए पुरुष इस आयोजन में सहायक की भूमिका निभाते हैं। वे पानी, लकड़ी और अन्य व्यवस्थाएं करते हैं, यातायात को नियंत्रित करते हैं और सुरक्षा व्यवस्था में सहयोग करते हैं ताकि महिलाएं बिना किसी परेशानी के अपना अनुष्ठान पूरा कर सकें।

इस वर्ष अट्टुकल पोंगाला का आयोजन 3 मार्च को हुआ और संयोग से यह रमजान के पवित्र महीने के साथ पड़ गया। ऐसे में तिरुवनंतपुरम की पलायम जुम्मा मस्जिद के इमाम पी. वी. सुहैब मौलवी ने मुस्लिम समुदाय से एक भावुक अपील की।

उन्होंने कहा कि भले ही मुसलमान रमजान के रोजे रख रहे हों, लेकिन उन्हें पोंगाला में शामिल होने आई हिंदू महिलाओं की हर संभव सहायता करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि रोजे के बावजूद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि महिलाओं को पानी और अन्य आवश्यक सुविधाएं मिलती रहें ताकि वे शांति से अपना अनुष्ठान कर सकें। उन्होंने यह भी कहा कि रमजान का असली संदेश प्रेम, भाईचारा और करुणा को साझा करना है और इसी भावना के साथ मुस्लिम समुदाय को पोंगाला में आई महिलाओं की मदद करनी चाहिए।

इमाम का यह संदेश तेजी से सोशल मीडिया पर फैल गया और कई लोगों ने इसे “असली केरल की कहानी” बताते हुए सराहा। पोंगाला के दिन मस्जिद के प्रबंधन और आसपास रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों ने बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिलाओं की सहायता की।

खुद रोजा रखते हुए भी वे सड़कों पर खड़ी महिलाओं को पानी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में जुटे रहे। मस्जिद की ओर से पीने के पानी और हल्के नाश्ते की व्यवस्था की गई। स्थानीय लोगों ने अपने घरों और दुकानों के दरवाजे भी श्रद्धालु महिलाओं के लिए खोल दिए ताकि उन्हें आराम करने और अन्य जरूरतों के लिए जगह मिल सके। लंबे समय तक खुले में रहने वाली महिलाओं की सुविधा के लिए अस्थायी शौचालय भी बनाए गए।

कायमकुलम से लगभग 100 किलोमीटर दूर से आई 63 वर्षीय श्रद्धालु शारदा ने बताया कि मस्जिद के लोगों की मदद उनके लिए बहुत राहत भरी रही। उन्होंने कहा कि तेज धूप में कई घंटों तक पूजा करने के दौरान मस्जिद द्वारा उपलब्ध कराए गए पानी और अस्थायी आश्रय से उन्हें काफी सहारा मिला। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले वर्ष भी इसी तरह की मदद मिली थी और इस वर्ष भी मुस्लिम समुदाय ने वही सहयोग की भावना दिखाई।

पलायम जुम्मा मस्जिद के ठीक सामने स्थित सेंट जोसेफ मेट्रोपॉलिटन कैथेड्रल चर्च ने भी इस अवसर पर भक्तों की सहायता के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। इस तरह मंदिर, मस्जिद और चर्च तीनों ने मिलकर इस विशाल धार्मिक आयोजन को सहज और शांतिपूर्ण बनाने में योगदान दिया। इस घटना ने सोशल मीडिया पर भी व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की और कई लोगों ने इसे केरल की सामाजिक संस्कृति का जीवंत उदाहरण बताया।

यह घटना उस समय और अधिक चर्चा में आई जब हाल ही में रिलीज हुई फिल्म “द केरल स्टोरी” और उसके सीक्वल को लेकर विवाद चल रहा था। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि फिल्म में दिखाए गए दावे केरल की वास्तविक सामाजिक स्थिति से मेल नहीं खाते।

इमाम सुहैब मौलवी ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मलयाली समाज इस तरह की कहानियों से सहमत नहीं है जो राज्य को विभाजित और असहिष्णु दिखाने की कोशिश करती हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति केरल की असली कहानी देखना चाहता है तो उसे यहां आकर देखना चाहिए जहां एक मस्जिद के बगल में मंदिर और सामने चर्च खड़ा है।

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दिलचस्प बात यह है कि जहां तिरुवनंतपुरम में मस्जिदों ने पोंगाला में आई महिलाओं की सेवा की, वहीं उत्तर केरल में एक मंदिर ने मुस्लिम समुदाय के लिए इफ्तार का आयोजन किया। कासरगोड जिले के थाचनगड इलाके में स्थित सदियों पुराने श्री पूबनम कुजी मंदिर में रमजान के रोजेदारों के लिए सामूहिक इफ्तार का आयोजन किया गया। मंदिर परिसर में सैकड़ों मुसलमान एकत्र हुए और सूर्यास्त के बाद वहीं रोजा खोला। इस आयोजन में अन्य समुदायों के लोग भी शामिल हुए और यह एक साझा सामाजिक कार्यक्रम बन गया।

मंदिर प्रशासन ने बताया कि कुछ समय पहले मंदिर में एक सामुदायिक भोज आयोजित किया गया था, लेकिन रमजान की वजह से कई मुस्लिम लोग उसमें शामिल नहीं हो सके थे। इसी कारण मंदिर प्रबंधन ने उनके लिए विशेष इफ्तार आयोजित करने का फैसला किया ताकि वे भी सामुदायिक सहभागिता का हिस्सा बन सकें। जैसे ही सूर्यास्त हुआ, मुसलमान मंदिर परिसर में एकत्र हुए और वहीं रोजा खोला, जो अपने आप में एक दुर्लभ और प्रतीकात्मक दृश्य था।

तिरुवनंतपुरम में पोंगाला के दौरान मस्जिदों द्वारा की गई सेवा और कासरगोड में मंदिर द्वारा आयोजित इफ्तार—ये दोनों घटनाएं केरल की उस परंपरा को उजागर करती हैं जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोग एक दूसरे के साथ मिलकर जीवन जीते हैं। केरल की जनसंख्या में मुसलमान और ईसाई मिलकर लगभग 48 प्रतिशत हैं और इस विविधता के बावजूद यहां सदियों से सांस्कृतिक मेलजोल और सामाजिक सहअस्तित्व की परंपरा मजबूत रही है।

आज जब दुनिया के कई हिस्सों में धर्म के नाम पर तनाव और अविश्वास की खबरें सामने आती हैं, ऐसे समय में केरल से सामने आई ये घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि प्रेम, सहयोग और मानवीय संवेदना ही समाज को जोड़ने की सबसे बड़ी ताकत हैं। अट्टुकल पोंगाला के दौरान सड़कों पर जलते लाखों चूल्हे केवल प्रसाद नहीं पका रहे थे, बल्कि वे एक ऐसे समाज की तस्वीर भी बना रहे थे जहां धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत एक ही रहती है।