अर्सला खान/नई दिल्ली
खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान, जिन्हें पूरी दुनिया बादशाह ख़ान और सीमांत गांधी के नाम से जानती है, सिर्फ़ सरहदों तक सीमित एक नेता नहीं थे। उनका रिश्ता हिंदुस्तान की मिट्टी, यहाँ के लोगों और आज़ादी की जद्दोजहद से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनकी जयंती के मौके पर जब हम उनके जीवन को याद करते हैं, तो एक दिलचस्प और कम जाना गया पहलू सामने आता है हरियाणा के फरीदाबाद से उनका रिश्ता, पंजाबियों के पलायन की कहानी और बादशाह ख़ान बीके अस्पताल का नाम।
कौन थे खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान
खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान का जन्म 6 फरवरी 1890 को मौजूदा पाकिस्तान के खैबर पख़्तूनख्वा में हुआ था। वह पेशे से समाज सुधारक, आज़ादी के सिपाही और अहिंसा के प्रबल समर्थक थे। महात्मा गांधी से उनकी गहरी दोस्ती थी और इसी वजह से उन्हें सीमांत गांधी कहा गया। पठान समाज में अहिंसा का पैग़ाम देना अपने आप में एक बड़ा और साहसी काम था, जिसे बादशाह ख़ान ने पूरी ज़िंदगी निभाया।
बंटवारे के बाद पंजाबियों का पलायन
1947 के बंटवारे ने पूरे उत्तर भारत की तस्वीर बदल दी। पश्चिमी पंजाब से लाखों लोग जान बचाकर हिंदुस्तान आए। इन शरणार्थियों के लिए नए ठिकानों की तलाश शुरू हुई। दिल्ली के आसपास कई इलाकों को बसाया गया, उन्हीं में से एक था फरीदाबाद।
उस समय फरीदाबाद एक छोटा-सा इलाका था, जहाँ उद्योग और बसावट की संभावनाएँ थीं। सरकार ने यहाँ पंजाब से आए शरणार्थियों को बसाने की योजना बनाई। धीरे-धीरे फरीदाबाद माइग्रेंट पंजाबियों का एक बड़ा केंद्र बन गया।
फरीदाबाद और खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान का रिश्ता
बहुत कम लोग जानते हैं कि खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान का नाम और सोच फरीदाबाद के बसने की कहानी से जुड़ी हुई है। बंटवारे के बाद जब शरणार्थियों को बसाने का काम चल रहा था, तब गांधीवादी विचारधारा से जुड़े नेताओं का बड़ा असर था। बादशाह ख़ान उस दौर में शांति, भाईचारे और इंसानियत की आवाज़ थे।
फरीदाबाद को एक नया, शांतिपूर्ण और आत्मनिर्भर शहर बनाने की सोच में गांधीवादी मूल्यों का असर साफ दिखता है। यही वजह है कि यहाँ कई संस्थानों, सड़कों और इलाकों के नाम आज़ादी के आंदोलन से जुड़े लोगों पर रखे गए।
NIT कैसे बना और उसका कनेक्शन
आज का NIT (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) फरीदाबाद का सबसे जाना-पहचाना इलाका है। लेकिन शुरुआत में यह इलाका शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए बसाया गया था। पंजाब से आए कारीगर, मज़दूर और छोटे कारोबारी यहाँ बसे। धीरे-धीरे उद्योग आए और फरीदाबाद एक औद्योगिक शहर बन गया।
NIT इलाका दरअसल New Industrial Township का संक्षिप्त रूप है। यह नाम अपने आप में उस दौर की सोच को दिखाता है रोज़गार, आत्मनिर्भरता और नई शुरुआत। इस पूरी प्रक्रिया के पीछे वही इंसानी सोच थी, जिसके हिमायती बादशाह ख़ान थे हिंसा नहीं, मेहनत और इंसाफ़ के ज़रिये आगे बढ़ना।
बादशाह ख़ान बीके अस्पताल की कहानी
फरीदाबाद में स्थित बादशाह ख़ान बीके अस्पताल सिर्फ़ एक अस्पताल नहीं, बल्कि एक विचार का प्रतीक है। इस अस्पताल का नाम खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के सम्मान में रखा गया। ‘बीके’ यानी Badshah Khan।
इस नाम के पीछे सोच यह थी कि जो इंसान पूरी ज़िंदगी इंसानियत, सेवा और अमन का पैग़ाम देता रहा, उसके नाम पर एक ऐसा संस्थान हो जो बिना भेदभाव लोगों की सेवा करे। अस्पताल का मक़सद भी यही रखा गया गरीब, शरणार्थी और आम लोगों को सस्ती और बेहतर इलाज की सुविधा।
कुछ अनसुने किस्से
बहुत कम लोग जानते हैं कि बादशाह ख़ान ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा जेलों में बिताया, लेकिन कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने कहा था कि “अहिंसा मेरी तलवार है।” पठान समाज, जिसे आमतौर पर हिंसा से जोड़ा जाता है, वहाँ अहिंसा की तहरीक चलाना आसान नहीं था।
एक और अनसुना पहलू यह है कि बंटवारे के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान छोड़ने से इनकार किया, लेकिन हिंदुस्तान से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। फरीदाबाद जैसे शहरों में उनका नाम आज भी ज़िंदा रहना इसी रिश्ते की गवाही देता है। खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान की जयंती हमें याद दिलाती है कि सरहदें इंसानियत से बड़ी नहीं होतीं। फरीदाबाद का बसना, NIT का बनना और बादशाह ख़ान अस्पताल का नाम ये सब इस बात की मिसाल हैं कि आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ राजनीति नहीं, बल्कि इंसान को इंसान से जोड़ने की कहानी भी थी।