डिजिटल युग में ईमान की परीक्षा: सोशल मीडिया पर इस्लामी दृष्टिकोण

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 06-02-2026
Testing faith in the digital age: Islamic perspectives on social media
Testing faith in the digital age: Islamic perspectives on social media

 

— ईमान सकीना

हर दौर में इंसान की परीक्षा उन साधनों के ज़रिये होती रही है, जिन्हें उसने खुद ईजाद किया। आज के ज़माने में सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक ऐसे ही शक्तिशाली साधन बन चुके हैं, जो न सिर्फ़ हमारे सोचने और बोलने के तरीकों को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि हमारे रिश्तों, आदतों और यहां तक कि हमारे ईमान पर भी गहरा असर डाल रहे हैं। ये प्लेटफ़ॉर्म विचारों के आदान–प्रदान को आसान बनाते हैं, लेकिन साथ ही कई नैतिक और आत्मिक चुनौतियाँ भी पेश करते हैं। मुसलमानों के सामने असली सवाल यह नहीं है कि तकनीक को अपनाया जाए या छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि इसका इस्तेमाल इस्लामी मूल्यों, नैतिकता और उद्देश्य के अनुरूप कैसे किया जाए।

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एक मोमिन के लिए ज़रूरी है कि उसकी ऑनलाइन मौजूदगी भी उसके ईमान का आईना हो। अगर सोशल मीडिया का उपयोग तक़वा यानी अल्लाह की चेतना के साथ किया जाए, तो वही प्लेटफ़ॉर्म जो आज ग़फ़लत और नुकसान का कारण बनता है, क़यामत के दिन सवाब और भलाई का ज़रिया भी बन सकता है।

इस्लाम एक कालातीत जीवन व्यवस्था है, जिसके उसूल किसी एक सदी या संस्कृति तक सीमित नहीं हैं। भले ही नबी ﷺ के दौर में सोशल मीडिया मौजूद नहीं था, लेकिन क़ुरआन और सुन्नत की शिक्षाएँ आज की डिजिटल दुनिया के लिए भी साफ़ और मुकम्मल मार्गदर्शन देती हैं।

इस्लाम की नज़र में इंसान को दी गई हर चीज़ अमानत है। हमारा समय, हमारी अक़्ल, हमारी ज़बान और हमारे संसाधन—all अल्लाह की तरफ़ से सौंपी गई ज़िम्मेदारियाँ हैं, जिनका हिसाब लिया जाएगा। इसी तरह तकनीक भी एक अमानत है। हमारे हाथ में मौजूद स्मार्टफोन सिर्फ़ एक उपकरण नहीं, बल्कि अनगिनत जानकारियों, संवादों, तस्वीरों और प्रभावों का दरवाज़ा है। इसका इस्तेमाल हम किस तरह करते हैं, यही हमारे तक़वा को बयान करता है। जब कोई मुसलमान सोशल मीडिया पर सक्रिय होता है, तो वह उतनी ही नैतिक ज़िम्मेदारी के तहत होता है, जितनी आमने–सामने बातचीत करते समय।

क़ुरआन हमें याद दिलाता है कि इंसान जो भी शब्द बोलता है, उसके लिए निगरानी करने वाला मौजूद होता है। यह हिदायत सिर्फ़ ज़बानी बातों तक सीमित नहीं, बल्कि लिखे गए शब्दों पर भी लागू होती है। आज कमेंट्स, पोस्ट, ट्वीट्स और मैसेज भी हमारे आमाल का हिस्सा हैं।

डिजिटल दौर में ज़बान की हिफ़ाज़त पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गई है। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जो अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखता है, उसे भली बात कहनी चाहिए या चुप रहना चाहिए। आज “बोलना” सिर्फ़ बोलने तक सीमित नहीं, बल्कि शेयर करने, फ़ॉरवर्ड करने और प्रतिक्रिया देने तक फैल चुका है। सोशल मीडिया जल्दबाज़ी, बहस, अफ़वाह और नकारात्मकता को बढ़ावा देता है, जबकि इस्लाम संवाद में संयम, समझदारी और गरिमा सिखाता है। ग़ीबत, बुहतान, शक और जासूसी जैसे गुनाह ऑनलाइन दुनिया में एक क्लिक की दूरी पर हैं, जबकि क़ुरआन इन्हें साफ़ तौर पर हराम ठहराता है।

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इसी तरह इस्लाम हया और निजता की हिफ़ाज़त पर बहुत ज़ोर देता है। हया इस्लामी पहचान का अहम हिस्सा है, जबकि सोशल मीडिया अकसर दिखावे, ज़रूरत से ज़्यादा निजी ज़िंदगी साझा करने और बाहरी मान्यता पाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। तस्वीरें, निजी पल और पारिवारिक बातें बिना सोचे–समझे साझा करना धीरे–धीरे हया को कमज़ोर कर सकता है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह ऑनलाइन भी वही शालीनता और गरिमा बनाए रखे, जो वह सार्वजनिक जीवन में रखता है।

सोशल मीडिया का एक बड़ा नुकसान यह भी है कि यह इंसान को समय का एहसास दिलाए बिना घंटों अपने अंदर उलझाए रखता है। बिना मक़सद स्क्रॉल करना, लगातार वीडियो देखना और बेकार की गतिविधियों में लगे रहना समय की बर्बादी है। नबी ﷺ ने सेहत और खाली समय को ऐसी नेमतें बताया है, जिनके बारे में लोग अक्सर धोखे में रहते हैं। इस्लाम एक उद्देश्यपूर्ण जीवन सिखाता है, जिसमें समय को इबादत, ज्ञान, परिवार, काम और आराम जैसे संतुलित और लाभकारी कार्यों में लगाया जाए। तकनीक का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल नमाज़, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों और आत्मिक तरक़्क़ी में रुकावट बन सकता है।

हालाँकि चुनौतियों के बावजूद, सोशल मीडिया भलाई के बड़े अवसर भी देता है। कुछ ही पलों में क़ुरआन की तिलावत, इस्लामी ज्ञान, नसीहतें और दान से जुड़ी पहलें लाखों लोगों तक पहुँच सकती हैं। नबी ﷺ ने एक आयत ही सही, लेकिन भलाई पहुँचाने की तरगीब दी है। सही नीयत और समझदारी के साथ इस्तेमाल की जाए तो तकनीक सदक़ा–ए–जारिया बन सकती है।

इसके साथ ही सोशल मीडिया पर तुलना और दिखावे की संस्कृति से बचना भी ज़रूरी है। दूसरों की ज़िंदगी देखकर जलन, असंतोष और रिया पैदा हो सकती है, जबकि इस्लाम संतोष और ख़ालिस नीयत सिखाता है। एक मोमिन अपनी क़ीमत लाइक्स और फ़ॉलोअर्स से नहीं, बल्कि अल्लाह से अपने रिश्ते से तय करता है।

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डिजिटल दौर में जानकारी साझा करने से पहले उसकी पुष्टि करना भी एक अहम इस्लामी उसूल है। झूठी ख़बरें और अफ़वाहें समाज में डर और नफ़रत फैलाती हैं। क़ुरआन हमें सिखाता है कि किसी भी ख़बर को आगे बढ़ाने से पहले उसकी जाँच की जाए, ताकि अनजाने में किसी को नुकसान न पहुँचे।

आख़िरकार, तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत हो जाए, वह वास्तविक रिश्तों की जगह नहीं ले सकती। इस्लाम रिश्तों को जोड़ने, परिवार के साथ वक्त बिताने और समाज से जुड़े रहने पर ज़ोर देता है। इसलिए मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वे सोशल मीडिया और तकनीक का इस्तेमाल नीयत, संतुलन और इस्लामी मूल्यों के साथ करें, ताकि यह ग़फ़लत का नहीं, बल्कि हिदायत और भलाई का ज़रिया बन सके।