संकट में राजस्थान की बौद्धिक धरोहर, मौलाना आज़ाद शोध संस्थान के भविष्य पर चिंता

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 05-02-2026
Rajasthan's intellectual heritage is in danger, raising concerns about the future of the Maulana Azad Research Institute.
Rajasthan's intellectual heritage is in danger, raising concerns about the future of the Maulana Azad Research Institute.

 

फरहान इसराइली/जयपुर

राजस्थान की बहुआयामी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के संरक्षण में अहम भूमिका निभाने वाला विश्वविख्यात मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फ़ारसी शोध संस्थान आज एक गंभीर दौर से गुजर रहा है। इसी संवेदनशील पृष्ठभूमि में संस्थान की वर्तमान स्थिति, भविष्य की दिशा और उसके सशक्तिकरण के उपायों पर मंथन के लिए झोटवाड़ा स्थित एक होटल में एक महत्वपूर्ण विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।

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इस गोष्ठी में न्यायपालिका से जुड़े वरिष्ठ व्यक्तित्वों, विद्वानों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और शोध से जुड़े लोगों ने एक स्वर में चिंता जताई कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह ऐतिहासिक संस्थान अपनी पहचान और उद्देश्य दोनों खो सकता है।

विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने बताया कि मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फ़ारसी शोध संस्थान इस समय कर्मचारियों की भारी कमी और लगभग तीन दशकों से रिक्त पड़े पदों के कारण गहरे संकट में फंसा हुआ है। इसका सीधा और नकारात्मक असर पांडुलिपियों के संरक्षण, शोध गतिविधियों और डिजिटलीकरण जैसे अत्यंत आवश्यक कार्यों पर पड़ रहा है।

दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां और ऐतिहासिक दस्तावेज, जो समय और वातावरण के प्रभाव से पहले ही संवेदनशील स्थिति में हैं, समुचित देखभाल के अभाव में खतरे में पड़ते जा रहे हैं। वक्ताओं ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि यदि जल्द ही आवश्यक संसाधन और मानवबल उपलब्ध नहीं कराया गया, तो यह अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित नहीं रह पाएगी।

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स्थिति को सुधारने के लिए गोष्ठी में सरकार से संवाद, निरंतर पत्राचार और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी विकल्प अपनाने पर भी सहमति बनी। इसी क्रम में प्रोग्रेसिव कमेटी के संयोजक सरताज अहमद ने जानकारी दी कि बैठक में एक प्रदेश स्तरीय प्रोग्रेसिव कमेटी के गठन का निर्णय लिया गया हैI

इस कमेटी की सरपरस्ती सेवानिवृत्त न्यायाधीश अय्यूब खान करेंगे, जो संस्थान के हित में सरकार और संबंधित विभागों से प्रभावी संवाद स्थापित करने का कार्य करेगी। इस पहल को संस्थान के पुनरुद्धार की दिशा में एक ठोस और संगठित कदम के रूप में देखा जा रहा है।

कार्यक्रम में चार सेवानिवृत्त न्यायाधीशों सहित बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, विद्वान और समाजसेवी उपस्थित रहे। सभी ने संस्थान के सशक्तिकरण के लिए एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद की। विचार गोष्ठी के दौरान संस्थान की ऐतिहासिक विरासत, उसकी समृद्ध शोध परंपरा और वर्तमान चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। इस अवसर पर संस्थान की मौजूदा स्थिति और चुनौतियों पर आधारित एक विशेष फोल्डर का भी विमोचन किया गया, जिसमें समस्याओं के साथ-साथ संभावित समाधानों को भी रेखांकित किया गया है।

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मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बी.एल. शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फ़ारसी शोध संस्थान केवल एक शोध केंद्र नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की साझा संस्कृति, सहअस्तित्व और बौद्धिक परंपरा का सशक्त प्रतीक है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस संस्थान को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाना चाहिए, ताकि यहां शोध और शिक्षा के स्तर को और ऊंचा उठाया जा सके। साथ ही उन्होंने राज्य सरकार से अपील की कि वह इस संस्थान पर विशेष ध्यान दे और इसे पुनः उसकी गरिमा के अनुरूप स्थान दिलाने के लिए ठोस नीति बनाए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सेवानिवृत्त न्यायाधीश मोहम्मद हनीफ ने कहा कि इस संस्थान को केवल जीवित रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे एक उच्च स्तरीय शोध केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, ताकि देश-विदेश के शोधार्थी यहां आकर अध्ययन और अनुसंधान कर सकें।

वहीं सेवानिवृत्त न्यायाधीश अय्यूब खान ने संस्थान को विश्वविद्यालय स्तर का शोध संस्थान बनाने की आवश्यकता पर बल दिया और वर्षों से रिक्त पड़े महत्वपूर्ण पदों पर शीघ्र भर्ती की मांग रखी। उनका कहना था कि जब तक योग्य और समर्पित मानव संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक संस्थान अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं कर पाएगा।

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अन्य वक्ताओं में सेवानिवृत्त न्यायाधीश मोहम्मद शहाबुद्दीन, सरताज अहमद एडवोकेट, सदर मुफ्ती आदिल नदवी, हुसैन कायमखानी, सैयद बदर अहमद और मोहम्मद अजमल देवपुरा ने भी अपने विचार रखे। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि यह संस्थान अरबी-फ़ारसी पांडुलिपियों, दुर्लभ पुस्तकों और ऐतिहासिक दस्तावेजों का अमूल्य भंडार है। इसकी उपेक्षा करना केवल एक संस्था की अनदेखी नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत के साथ अन्याय करने जैसा है।

गौरतलब है कि मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फ़ारसी शोध संस्थान राजस्थान का एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक और शोध केंद्र रहा है। इसकी स्थापना राज्य में अरबी और फ़ारसी भाषा, साहित्य तथा इस्लामी अध्ययन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।

संस्थान का नाम देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम पर रखा गया, जो शिक्षा, ज्ञान और सांस्कृतिक संवाद के प्रबल समर्थक थे। उनके विचारों और दृष्टि के अनुरूप इस संस्थान को ज्ञान, अनुसंधान और सांस्कृतिक संवाद का केंद्र बनाया गया था।

अपने लंबे और गौरवशाली इतिहास के दौरान इस संस्थान में देश-विदेश से अनेक प्रसिद्ध इतिहासकार, भाषा विशेषज्ञ, इस्लामी विद्वान, शोधार्थी और विश्वविद्यालयों से जुड़े शिक्षाविद अध्ययन और शोध के लिए आते रहे हैं। यहां राजस्थान के इतिहास, सूफी परंपरा, मध्यकालीन भारत, इस्लामी संस्कृति, अरबी-फ़ारसी साहित्य और धार्मिक ग्रंथों पर अनेक महत्वपूर्ण शोध कार्य संपन्न हुए हैं।

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संस्थान के संग्रह में अरबी और फ़ारसी की हजारों दुर्लभ पांडुलिपियां, हस्तलिखित कुरआन, ऐतिहासिक दस्तावेज, शाही फरमान, तवारीख, तज़किरा, दीवान, काव्य संग्रह, धार्मिक ग्रंथ और पुरानी मुद्रित पुस्तकें सुरक्षित हैं। यह संग्रह न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे देश की साझा सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

अपने स्वर्णिम दौर में यह संस्थान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान रखता था और यहां का शोध कार्य वैश्विक अकादमिक जगत में सम्मान के साथ देखा जाता था। लेकिन वर्तमान में संसाधनों, कर्मचारियों और सरकारी उपेक्षा के कारण इसकी गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।

विचार गोष्ठी में उपस्थित वक्ताओं ने उम्मीद जताई कि यदि समाज, बुद्धिजीवी वर्ग और सरकार मिलकर प्रयास करें, तो इस ऐतिहासिक संस्थान को पुनः उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा दिलाई जा सकती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह ज्ञान और शोध का प्रकाश स्तंभ बना रह सकता है।