अमेरिकी चुनाव में भारतीय मूल की दो मुस्लिम महिलाओं का दिखा जलवा

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 05-11-2026
Two Indian-origin Muslim women shine in US elections
Two Indian-origin Muslim women shine in US elections

 

आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव 2026 में मुस्लिम प्रतिनिधित्व और भारतीय मूल के परिवारों की भूमिका चर्चा का विषय बन गई है। मिशिगन में डेमोक्रेट अब्दुल अल-सईद ने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स को हराकर अमेरिकी सीनेट की सीट जीत ली है। वह अमेरिकी इतिहास में सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम नेता बन गए हैं। उनकी जीत के साथ उनकी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू की भारतीय जड़ों ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। सारा का परिवार कर्नाटक के भटकल से जुड़ा है।

इसी चुनाव में भारतीय मूल की एक अन्य मुस्लिम महिला नबीला सैयद ने भी राजनीतिक सफलता हासिल की है। उन्होंने इलिनोइस में रिपब्लिकन उम्मीदवार को हराकर राज्य की सीनेट में अपनी जगह बनाई। दोनों महिलाओं की कहानियां अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम समुदाय की बढ़ती भागीदारी और भारतीय मूल के परिवारों की नई पहचान को सामने लाती हैं।

अमेरिकी चुनाव 2026 में इन दोनों महिलाओं की भूमिका केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं है। इनके परिवारों की प्रवासी पृष्ठभूमि, शिक्षा और राजनीतिक अनुभव अमेरिका में मुस्लिम समुदाय की बदलती स्थिति को भी समझने का अवसर देते हैं।

अब्दुल अल-सईद की जीत और सारा जुकाकू की भारतीय जड़ें

मिशिगन के डेमोक्रेट अब्दुल अल-सईद ने 3 नवंबर 2026 को हुए चुनाव में रिपब्लिकन माइक रोजर्स को हराया। इस जीत के बाद वह अमेरिकी सीनेट में पहुंचने वाले पहले मुस्लिम निर्वाचित सदस्य बन गए। उनकी जीत को मुस्लिम अमेरिकी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से ऐतिहासिक माना जा रहा है।

अल-सईद मिशिगन में जन्मे हैं। उनके माता-पिता मिस्र से अमेरिका आए थे। वह पेशे से डॉक्टर और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। राजनीति में आने से पहले उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक प्रशासन के क्षेत्र में काम किया। चुनाव के दौरान उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं, आर्थिक असमानता और आम लोगों की समस्याओं को प्रमुख मुद्दा बनाया।

उनकी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू भी डॉक्टर हैं। उनका जन्म मिशिगन में भारतीय मूल के परिवार में हुआ था। उनके पिता तैयब जुकाकू नेफ्रोलॉजिस्ट हैं। परिवार की जड़ें कर्नाटक के तटीय शहर भटकल से जुड़ी हैं। भटकल दक्षिण भारत का एक प्रमुख मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। यहां से बड़ी संख्या में लोग शिक्षा, कारोबार और रोजगार के लिए विदेश गए हैं।

सारा के दादा जे.एच. शमसुद्दीन जुकाकू भटकल के प्रसिद्ध वकीलों में शामिल थे। इस तरह उनके परिवार का भारत से संबंध केवल पुरानी यादों तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी पारिवारिक विरासत है, जो कई पीढ़ियों से अमेरिका और भारत के बीच जुड़ी रही है।

सारा जुकाकू कौन हैं?

डॉ. सारा जुकाकू पेशे से मनोचिकित्सक हैं। उन्होंने मिशिगन विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने चिकित्सा शिक्षा के लिए कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैगेलोस कॉलेज ऑफ फिजिशियन एंड सर्जन्स में प्रवेश लिया। वर्ष 2015 में उन्होंने मेडिकल की डिग्री हासिल की।

इसके बाद उन्होंने मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपना करियर आगे बढ़ाया। वह निजी चिकित्सा अभ्यास से जुड़ी रही हैं। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन हेल्थ में भी मनोचिकित्सा से संबंधित जिम्मेदारियां निभाईं। उनकी पेशेवर पहचान राजनीति से अलग रही है।

सारा और अब्दुल अल-सईद की मुलाकात मिशिगन विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हुई थी। दोनों ने मई 2006 में शादी की। उस समय सारा 19 वर्ष और अब्दुल 21 वर्ष के थे। उनके दो बच्चे हैं।

सारा ने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि उनके पति ने शादी के समय उन्हें भरोसा दिलाया था कि दोनों अपने जीवन में आगे बढ़ने के साथ एक-दूसरे का साथ भी बनाए रखेंगे। उन्होंने अपने रिश्ते को साथ मिलकर आगे बढ़ने का अनुभव बताया था।

अब्दुल अल-सईद ने भी अपनी पत्नी के भारतीय परिवार और संस्कृति से अपने जुड़ाव की चर्चा की है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वह दक्षिण भारतीय परिवार में लंबे समय से जुड़े हुए हैं और खुद को उस संस्कृति के करीब महसूस करते हैं। उनके इस बयान से दोनों परिवारों के सांस्कृतिक संबंधों की झलक मिलती है।

चुनाव अभियान में सारा जुकाकू की चर्चा क्यों हुई?

सारा जुकाकू आम तौर पर राजनीतिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक चर्चाओं से दूर रहती हैं। वह अपने चिकित्सा पेशे और परिवार को प्राथमिकता देती हैं। उनके पति के चुनाव अभियान में भी उनकी भूमिका अधिकतर निजी समर्थन तक सीमित रही।

हालांकि, 2026 के चुनाव के दौरान उनकी चर्चा बढ़ गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अल-सईद की मुस्लिम पहचान को लेकर कई बार टिप्पणी की। चुनाव अभियान के दौरान अल-सईद को निशाना बनाया गया और उनके खिलाफ धार्मिक पहचान से जुड़े आरोप लगाए गए।

अगस्त में ट्रंप ने सोशल मीडिया पर अल-सईद और उनकी पत्नी की तस्वीर की तुलना अपनी पत्नी मेलानिया ट्रंप के साथ साझा तस्वीर से की। पोस्ट के साथ उन्होंने दोनों को अलग-अलग अमेरिका की तस्वीर के रूप में पेश किया। इस टिप्पणी के बाद सारा जुकाकू भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गईं।

यह मामला केवल एक चुनावी उम्मीदवार तक सीमित नहीं रहा। इससे अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम पहचान, प्रवासी परिवारों और धार्मिक विविधता को लेकर चल रही बहस भी सामने आई।

सारा ने अपने पति के अभियान में सीमित सार्वजनिक भूमिका निभाई, लेकिन चुनाव के अंतिम दौर में वह उनके साथ मंच पर दिखाई दीं। उन्होंने अपने पति की मेहनत और मतदाताओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की सराहना की।

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नबीला सैयद की जीत और मुस्लिम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी

अमेरिका में भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का दूसरा उदाहरण नबीला सैयद हैं। उन्होंने इलिनोइस में राज्य की सीनेट के चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार डार्बी हिल्स को हराया। वह 27 वर्ष की हैं और राज्य के 26वें सीनेट जिले का प्रतिनिधित्व करेंगी।

नबीला का जन्म हैदराबाद के भारतीय मूल के माता-पिता के परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता 1980 के दशक में अमेरिका आए थे। उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद 2022 में इलिनोइस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का चुनाव जीता। वर्ष 2024 में वह दोबारा निर्वाचित हुईं। अब राज्य की सीनेट में उनकी जीत ने उनके राजनीतिक सफर को एक नई दिशा दी है।

नबीला ने अपने राजनीतिक जीवन में समुदाय की भागीदारी और लोगों की समस्याओं को प्रमुखता दी है। उनका कहना है कि राजनीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने समुदाय का हिस्सा महसूस करे।

उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन्हें यह चिंता हुई थी कि अमेरिका में उनके जैसे लोगों के लिए जगह है या नहीं। उन्होंने कहा कि यह देश उनका घर है और वह चाहती हैं कि हर व्यक्ति यहां अपनेपन का अनुभव करे।

नबीला की यह टिप्पणी अमेरिकी समाज में प्रवासी परिवारों के अनुभव को सामने लाती है। उनके लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल चुनाव जीतने का विषय नहीं है। यह उन लोगों की आवाज बनने का अवसर भी है, जो खुद को कई बार मुख्यधारा से अलग महसूस करते हैं।

अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम समुदाय की बढ़ती भूमिका

अब्दुल अल-सईद और नबीला सैयद की जीत अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी के नए दौर को दिखाती है। दोनों नेताओं की पृष्ठभूमि अलग है, लेकिन उनकी राजनीतिक सफलता में समुदाय, शिक्षा और सार्वजनिक सेवा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

अल-सईद की जीत खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी सीनेट में मुस्लिम प्रतिनिधित्व लंबे समय तक सीमित रहा है। उनकी सफलता मुस्लिम अमेरिकी समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। चुनाव अभियान के दौरान उन्हें धार्मिक पहचान को लेकर आलोचना और हमलों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने मिशिगन में मतदाताओं का समर्थन हासिल किया।

डेमोक्रेटिक पार्टी ने इस चुनाव में कई महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज की। चुनाव परिणामों ने रिपब्लिकन पार्टी और राष्ट्रपति ट्रंप की राजनीतिक रणनीति को भी चुनौती दी। अल-सईद की जीत को प्रगतिशील राजनीति और मुस्लिम प्रतिनिधित्व के संदर्भ में देखा जा रहा है।

नबीला सैयद की सफलता भी इसी बदलाव का हिस्सा है। वह कम उम्र में राज्य की राजनीति में आगे बढ़ी हैं। उनकी जीत यह बताती है कि भारतीय मूल के मुस्लिम परिवारों से आने वाली महिलाएं अब अमेरिकी राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

भटकल से अमेरिका तक भारतीय परिवारों का संबंध

सारा जुकाकू की कहानी भारत के कर्नाटक राज्य के भटकल शहर से जुड़ती है। यह शहर अरब सागर के तट पर स्थित है और ऐतिहासिक रूप से व्यापार, शिक्षा तथा विदेशों से संपर्क के लिए जाना जाता है। यहां के कई परिवार पीढ़ियों से विदेशों में रहते हैं, लेकिन अपने मूल स्थान से संबंध बनाए रखते हैं।

सारा के परिवार की पहचान भी इसी परंपरा से जुड़ी है। उनके पिता और दादा का भटकल से संबंध रहा है। परिवार की शिक्षा और पेशेवर उपलब्धियों ने अमेरिका में नई पहचान बनाई। अब उनके पति की ऐतिहासिक राजनीतिक जीत के बाद यह भारतीय संबंध अंतरराष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन गया है।

यह कहानी उन भारतीय परिवारों के अनुभव को भी दर्शाती है, जो अमेरिका में बसने के बाद अपनी सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखते हैं। उनके बच्चे अमेरिकी समाज में शिक्षा और रोजगार के अवसर हासिल करते हैं। साथ ही परिवार की भाषा, संस्कृति और मूल स्थान से जुड़े रिश्ते भी कायम रहते हैं।

प्रतिनिधित्व और पहचान का नया दौर

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव 2026 में अब्दुल अल-सईद और नबीला सैयद की जीत ने मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नई चर्चा दी है। सारा जुकाकू की भारतीय जड़ें और नबीला सैयद का प्रवासी परिवार इस बदलाव के दो अलग लेकिन जुड़े हुए उदाहरण हैं।

इनकी कहानियां बताती हैं कि अमेरिकी राजनीति में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ आगे बढ़ना संभव है। हालांकि, चुनाव अभियान के दौरान मुस्लिम नेताओं को अपनी पहचान को लेकर आलोचना और विवादों का सामना भी करना पड़ता है।

अब्दुल अल-सईद की जीत अमेरिकी सीनेट में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिए एक ऐतिहासिक कदम है। वहीं नबीला सैयद की सफलता राज्य की राजनीति में युवा मुस्लिम महिलाओं की बढ़ती भूमिका को दिखाती है।

भारत के भटकल से जुड़ी सारा जुकाकू की पारिवारिक कहानी इस चुनाव को एक अतिरिक्त भारतीय संदर्भ देती है। यह अमेरिका में बसे भारतीय परिवारों की यात्रा, उनकी सांस्कृतिक पहचान और नई पीढ़ी की राजनीतिक भागीदारी को सामने लाती है।

अमेरिकी चुनाव 2026 का यह परिणाम केवल राजनीतिक जीत की कहानी नहीं है। यह मुस्लिम प्रतिनिधित्व, भारतीय मूल के परिवारों और अमेरिकी समाज में विविधता की बदलती तस्वीर भी है।